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क्या कृषि क्षेत्र का नया बदलाव देश के किसानों को सिर्फ मजदूर व गुलाम बना देगा

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मोदी सरकार द्वारा लाया गया कृषि विधेयक पर विवाद बढ़ गया है. देश के विभिन्न हिस्सों में किसान विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. केंद्र सरकार की सहयोगी दल शिरोमणि अकाली की मंत्री हरसिमरत कौर ने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया है.

हरियाणा में भाजपा सरकार की सहयोगी पार्टी जेजेपी के दुष्यंत चौटाला ने भी विरोध शुरु कर दिया है.विपक्षी पार्टी कांग्रेस भी सरकार को घेर रही है. मीडिया इस मुद्दे को लंबे समय से इग्नोर कर रही है.

न्यूज विंग ने 11 अगस्त को गिरीश मालवीय की एक टिप्पणी प्रकाशित की थी. जिसका शीर्षक थाः  “कृषि क्षेत्र का नया बदलाव देश के किसानों को सिर्फ मजदूर व गुलाम बना देगा”

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पढ़िये, 38 दिन पहले प्रकाशित यह टिप्पणी

Girish Malaviya

आइए बिल गेट्स के असली इरादों के बारे में विस्तार से जानें. स्वास्थ्य के बाद बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन भारत में कृषि क्षेत्र में सक्रिय है. अब आप देखेंगे कि वह भारत के कृषि क्षेत्र में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाने जा रहे हैं. बिल गेट्स नवंबर 2019 मध्य में भारत में ही थे. आप जानते हैं कि वो यहां मुख्य रूप से किसलिए आए थे ?

दरअसल, कृषि सांख्यिकी पर नई दिल्ली में होने वाली ग्लोबल कांफ्रेंस में बिल गेट्स मुख्य वक्ता थे. यह कांफ्रेंस यूएन के फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन (एफएओ), यूएस डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर, वर्ल्ड बैंक, मिलिंडा एंड गेट्स फाउंडेशन और अन्य एजेंसियों के साथ पार्टनरशिप में भारत के कृषि मंत्रालय ने आयोजित की थी.

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अब यदि आप अपने मन में नवंबर 2019 के बाद से 8 महीनों से कृषि क्षेत्र में चल रहे सरकारी बदलाव से इस बैठक के एजेंडे को सही तरह से जोड़ लेंगे, तो समझ में आ जाएगा कि भारत का किसान बिल गेट्स और अमेरिका मल्टीनेशनल कंपनियों की गुलामी करने के कितना नजदीक आ चुके हैं.

इस कांफ्रेंस की थीम थी ‘सतत विकास का लक्ष्य हासिल करने के लिए कृषि में बदलाव की सांख्यिकी’

बिल गेट्स का उद्बोधन कृषि उत्‍पादन के लिए नए डिजिटल उपकरणों के उपयोग और कृषि के सर्वोत्तम आंकड़ों की आवश्यकता के आसपास ही केंद्रित था.

शायद आपने रिलायंस जियो के टीवी पर आने वाले एड ध्यान से देखे होंगे. उसमें ‘जियो किसान’ का भी जिक्र है.

आश्चर्यजनक रूप से इस कोरोना काल में मोदी सरकार ने कृषि से जुड़े तीन अध्यादेश जारी किए. जिसे किसानों के हित में बताया जा रहा है. लेकिन यदि आप इसे गहराई से देखेंगे तो आप पाएंगे कि इन अध्यादेशों के जरिए कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग को आगे बढ़ाया जा रहा है. अब कंपनियां खेती करेंगी और किसान मजदूर बनकर रह जाएगा. दरअसल, आत्मनिर्भर भारत अभियान के चलते कंपनियों के आत्मनिर्भर होने की राह भी खोल दी गयी है. अब संविदा करार की जरिये कंपनियां खुद खेती कर सकेंगी.

आमतौर पर अनुबंध खेती का मतलब है कि बुआई के समय ही बिक्री का सौदा हो जाता है. ताकि किसान को भाव की चिंता न रहे. सरकार द्वारा पारित वर्तमान कानून में अनुबंध की परिभाषा को बिक्री तक सीमित न करके, उसमें सभी किस्म के कृषि कार्यों को शामिल किया गया है. अध्यादेश के अनुसार कंपनी किसान को, किसान द्वारा की गयी सेवाओं के लिए भुगतान करेगी. यानी किसान अपनी उपज की बिक्री न करके अपनी ज़मीन (या अपने श्रम) का भुगतान पायेगा.

ज्यादा जानकारी के लिये आप गूगल कर देख सकते हैं कि यह अध्यादेश भारतीय कृषि की तस्वीर बदलने की ताकत रखते हैं. लेकिन कोरोना काल में इन सब बातों पर चर्चा ही कहां हुई. कोरोना में तो हमारा बुद्धिजीवी वर्ग बस वैज्ञानिक चेतना विकसित करने का काम कर रहा है. इन सब बातों के बारे में उसे सोचने की फुर्सत नहीं है. खैर छोड़िए.

अब आप यह जानिए कि इस सबकी शुरुआत कहां से हुई है? वर्ष 2006 में, बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन और रॉकफेलर फाउंडेशन ने संयुक्त रूप से अफ्रीका में हरित क्रांति (AGRA) के लिए गठबंधन शुरू किया. इस पूरे प्रोग्राम को वह अफ्रीका में बहुत अच्छी तरह से टेस्ट कर चुके हैं. अफ्रीका के बीज और कृषि बाजारों का निजीकरण वह काफी हद तक कर चुके हैं.

इनका विरोध भी अफ्रीका में बड़े पैमाने पर किया जा रहा है. अफ्रीका में सामाजिक कार्यकर्ता अफ्रीका के किसानों को समझा रहे हैं कि बिल एंड मेलिंडा गेट्स की यह “एड” दरअसल “एड” नहीं है – यह उपनिवेशवाद का दूसरा रूप है.” सामाजिक कार्यकर्ता वहां यह समझा रहे हैं कि “हमें यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि बीज और अन्य कृषि संसाधनों का नियंत्रण छोटे किसानों के हाथों में रहे. जो अफ्रीका में आबादी के अधिकांश हिस्से को खिलाने के बजाय बड़े कृषि व्यवसाय को खाद्य प्रणाली के और भी अधिक पहलुओं पर हावी होने की अनुमति देते हैं.

भारत के कृषि क्षेत्र में लागू किये जाने वाला प्रोग्राम जिसका लुभावना वर्णन मोदी सरकार करती है. वह अफ्रीका में कई सालों से जारी है.

9 अगस्त को भी जिस एक लाख करोड़ रुपये के एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर फंड को मोदी जी ने लागू किया है. उसको यदि आप ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि यह सारा पैसा तो कोल्ड स्टोरेज, वेयर हाउस, कलेक्शन सेंटर और प्रोसेसिंग यूनिट, परख केंद्र, ग्रेडिंग, पैकेजिंग यूनिट, ई-प्लेटफॉर्म जैसी इकाइयों की स्थापना में लगाने की बात की जा रही है. मल्टीनेशनल खाद्य कंपनियों की कार्यप्रणाली को सुचारू रूप से चलाने के लिए यह सारी सुविधाएं बहुत जरूरी है. और जरूरी है मंडी प्रणाली को हटाना. जो इस सरकार ने तीन अध्यादेश जारी करके उनका रास्ता साफ कर दिया है. यह अध्यादेश किसानों को उनकी उपज देश में किसी भी व्यक्ति या संस्था (APMC सहित) को बेचने की इजाजत देता है. लेकिन फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की कोई बात नहीं करता.

अभी बिल गेट्स कृषि में किस हद तक इंवाल्व है. उसकी बस एक झलक आपके सामने आयी है. अगली कड़ी हम जीएम फसलों पर चर्चा करेंगे, जो इनका भारत में मुख्य उद्देश्य है.

डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं.

 

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