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सदियों पुरानी परंपरा पत्थलगड़ी पर तनाव और टकराव क्यों?

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Faisal Anurag

दिवासी और पत्थलगड़ी का इतिहास उतना ही पुराना है, जितना की उनका अस्तित्व. खासकर मुंडा आदिवासियों के बीच पत्थलगड़ी न केवल सांस्कृतिक महत्व रखता है, बल्कि उनकी पहचान और रहन-सहन का हिस्सा है. लेकिन यह पहला अवसर है, जब पत्थलगड़ी का सवाल राजनीतिक तौर पर सरकार बनाम मुंडा आदिवासी बनता जा रहा है. सरकार इसे चर्च की साजिश बताकर हमला कर रही है, जबकि आदिवासी इसे अपने अधिकार और पहचान का दस्तावेज बता रहे हैं. पिछले कई महीनों से सरकार और पत्थलगड़ी करनेवाले आदिवासियों का अंतरविरोध गहराते हुए हिंसक हो गया है, जिसमें पुलिस कार्रवाई में एक आदिवासी की मौत हो गयी. इस घटना के बाद पूरा मुंडा दिसुम उबल रहा है.

सवाल उठता है कि आदिवासी बनाम सरकार का यह अंतरविरोध इतना तीखा क्यों और कैसे हो गया. इसके पीछे कौन से सामाजिक-आर्थिक कारक हैं. साथ ही सरकार और आदिवासियों के बीच संवाद का कोई पुल क्यों नहीं बन पाया. क्या जानबूझ कर हालात को इस तरह खराब होने दिया गया कि सरकार को दमन करने का तर्क मिल जाये और वह अपनी कार्रवाई को न्यायसंगत ठहरा सके. सरकार इतिहास के उस पहलू को नजरअंदाज कर रही है, जो आदिवासी अंचलों की विशेषता है और जिसके साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ हमेशा घातक ही साबित हुई है. पत्थलगड़ी का वर्तमान संदर्भ यदि सीधे सरकार के विरोध में और उग्र भाषा में अभिव्यक्त हो रहा है, तो इसके ऐतिहासिक संदर्भ को समृद्ध कर ही इसका निदान किया जा सकता है.

1996 में पेसा कानून बनने के बाद बीडी शर्मा के नेतृत्व में हजारों आदिवासी गांवों में पत्थलगड़ी आंदोलन हुआ था, जिसमें अपने गांव में अपने राज की घोषणा की गयी थी. तब भी सरकार ने इस आंदोलन को सहजता से नहीं लिया था, लेकिन तब बिहार सरकार ने इसको रोकने या दमन करने का कोई प्रयास नहीं किया था. उस आंदोलन में भी गांवों में पत्थलगड़ी के बाद सरकार को उसकी सीमा बतायी गयी थी और आदिवासी विशेषताओं के अनुरूप स्वशासन की आवाज बुलंद की गयी थी. तब का संदर्भ इस अर्थ में आज से भिन्न था कि उसमें बात तो स्वशासन  की की जाती थी, लेकिन सरकार ने उसे नजरअंदाज करने का ही तरीका अपनाया था. इस कारण सरकार के असहज होने के बाद भी टकराव पैदा नहीं हुआ था.

इतिहास के एक और संदर्भ को यहां याद करने की जरूरत है. अग्रजों के जमाने में जमींदारों का जुल्म जब मुंडा इलाके में बढ़ा था और सरकारी आंदोलन की नींव उसके खिलाफ पड़ रही थी, मुंडा आदिवासी ससनदिरी और पत्थलगड़ी को अपने कंधों पर लादकर कलकत्ता के कोर्ट में ले जाते थे और कोर्ट से कहते थे कि यही हमारा खतियान और पहचान है. भूमि विघटन के उस दौर में इस प्रक्रिया के दौर में ही सरकारी आंदोलन ने आकार ग्रहण किया और जिसकी परिणति अंत में बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हुए उलगुलान में हुई. इस संदर्भ का सबक यह है कि आदिवासी सवालों को यदि जल्द हल नहीं किया जायेगा, तो एक नये उलगुलान के रूप में पत्थलगड़ी आंदोलन कोई भी आकार ग्रहण कर सकता है. केवल दमन की भाषा से इसका निदान करने की कोशिश खतरनाक हो सकती है. आदिवासी समाज की संवेदनाओं और सांस्कृतिक चेतना को गहराई से समझते हुए वर्तमान संकट से निकलने का रास्ता बनाया जाना चाहिए.

वर्तमान पत्थलगड़ी का दौर छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम और संताल परगना काश्तकारी अधिनियमों के संशोधन के बाद ही पूरा हुआ. हालांकि, इन संशोधनों को वापस तो लिया गया, लेकिन लैंड बैंक बनाने की प्रक्रिया ने आदिवासियों के मन में संदेह बनाये रखा और भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन के बाद आदिवासियों में यह धारणा प्रबल हो गयी है कि सरकार के इरादे नेक नहीं हैं और देर सवेर इन सबके चलते आदिवासियों को भूमि से बेदखल कर दिया जायेगा. यह धारणा प्रबल होने के कारण हीन पत्थलगड़ी के प्रति लोगों का समर्थन बढ़ता गया और गुजरात से प्रभावित नेतृत्व ने आदिवासियों के बीच अपनी पैठ बना ली. झारखंड में जिस तरह प्राकृतिक संसाधनों की लूट की बात होती है, उससे आदिवासियों में गुस्सा बढ़ता ही जाता है. इस पूरे संदर्भ को चर्च प्रायोजित बताकर सरकार और सत्तारूढ़ दल भले ही दमन का तर्क गढ़ ले, लेकिन आदिवासी इससे प्रभावित नहीं हो रहे हैं. चर्च की भूमिका भी आदिवासी भूमि आंदोलनों में रही है, इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन वर्तमान संदर्भ में जिस व्यापकता में पत्थलगड़ी को जनसमर्थन प्राप्त है, वह केवल चर्च के कारण संभव नहीं दिखता है. सरकार को समीक्षा करने की जरूरत है कि उसकी विकास योजनाओं से आदिवासियों में जमीन की लूट किये जाने की धारणा क्यों मजबूत होती है और आदिवासी सरकारी विकास नजरिये को आदिवासी संस्कृति और समाज के विनाश के कारक के रूप में क्यों देखते हैं. बड़ी योजना, जिसमें विस्थापन अनिवार्य है, आदिवासी समाज को स्वीकार नहीं है. सरकार को भी स्पष्ट करने की जरूरत है कि आदिवासी संस्कृति की रक्षा करते हुए वह विकास का तंत्र किस तरह खड़ा कर सकती है.

आजादी के तुरंत बाद ही आदिवासियों ने विकास योजनाओं के प्रति गहरा आक्रोश व्यक्त किया था और तब के प्रधानमंत्री ने आदिवासी इलाकों के लिए पंचशील की घोषणा की थी. यदि ईमानदारी से पंचशील को लागू किया गया होता, तो आज आदिवासी इलाकों का दृष्य ही अलग होता. विस्थापन की मार ने आदिवासियों के मन में अनेक तरह के संशय को जन्म दिया है, उसको हल करने की दिशा में सरकारी प्रयास नगण्य है.

इस संदर्भ में ही पांचवीं अनुसूची और विशेष क्षेत्र का सवाल है, जो वर्तमान पत्थलगड़ी को ताकत देता है. पांचवीं और छठी अनुसूची का प्रावधान संविधान में आदिवासी इलाकों के लिए किया गया है. इसमें अनेक विशेषाधिकार इन इलाकों को प्रदान किये गये हैं. छठी अनुसूची पूर्वोत्तर राज्यों में लागू है, जबकि पांचवीं अनुसूची झारखंड सहित 10 राज्यों में लागू की गयी है. पांचवीं अनुसूची पर तब के बिहार और झारखंड के कई राज्यपाल कह चुके हैं कि इसे पूरी तरह से लागू नहीं किया गया है. पांचवीं अनुसूची का संदर्भ कई राज्यों में आदिवासियों को आंदोलित कर रहा है और इसके संदर्भ को उन विफलताओं से ही समझा जा सकता है, जिसमें संविधान के इस अहम प्रावधान की उपेक्षा होती रही है.

(लेखक न्यूज विंग के वरिष्ठ संपादक हैं और ये उनके निजी विचार हैं.)

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