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पूर्व मुख्यमंत्री के साथ ऐसा बर्ताव क्यों ?

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Faisal Anurag

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लालू प्रसाद के इलाज और देखरेख का विवाद गहराता जा रहा है. ताजा मामला उनके कमरे में तीन दिनों से जलापूर्ति ठप होने का है. इस घटना के बाद लालू प्रसाद के परिजनों ने उनके इलाज और देखभाल की उपेक्षा का जो सवाल उठाये हैं, उसे बल ही मिला है.

लालू प्रसाद सजायाफ्ता जरूर हैं, लेकिन इस समय वे एक मरीज हैं और अस्पताल प्रबंधन और सरकार का यह दायित्व हैं कि उनकी पूरी देखभाल की जाये और उनकी सुविधाओं का ध्यान रखा जाये ताकि वे स्वास्थ्य लाभ कर सकें.

बार-बार शिकायत मिलने के बाद रिम्स निदेशक ने जो सुस्ती और टालमटोल का रूख दिखाया है, उससे यह सवाल उठाना लाजिमी ही है कि वे लालू प्रसाद को लेकर किसी दबाव में हैं.

मरीज के तौर पर उनकी देख-रेख में कमी अस्पताल प्रबंधन का गंभीर मामला है. राज्य सरकार तो लालू प्रसाद को लेकर पहले ही ऐसा रूख दिखा रही है. जिससे वे एक सामान्य कैदी की सुविधााओं से प्रायः वंचित होते रहे हैं.

लालू प्रसाद अनेक बीमारियों की गिरफ्त में हैं. कुछ बीमारियां तो बेहद गंभीर प्रकृति की हैं. अनियमित ब्लड प्रेशर उनके लिए गंभीर बना हुआ है. इस हालत में तनाव बढ़ाने वाले कदमों का उन पर क्या असर हो सकता है इससे रिम्स तो आमलोगों से ज्यादा ही चेतनशील होगा.

बावजूद इसके उनके कमरे में पानी आपूर्ति तीन दिनों से नहीं हैं और रिम्स प्रबंधक कामचलाए तरीके से इसके लिए जलापूर्ति विभाग को दोषी ठहरा रहे हैं.

लेकिन वे यह बता नहीं पा रहे हैं कि जब पेइंग वार्ड के अन्य कमरों ने जलापूर्ति सामान्य है, तो लालू प्रसाद के कमरे में ही ऐसी क्या खराबी आ गयी है, जिसे तीन दिनों में भी ठीक नहीं किया जा सका है. यह किसी रॉकेट साइंस का विषय तो है नहीं.

ऐसे में यदि राजद के नेताओं ने आरोप लगाया है कि उनकी देखरेख में घनघोर उपेक्षा की जा रही है, तो इसकी पुष्टि ही हो रही है. इसके पहले शनिवार को उनसे मिलने वाले उनके परिवार के सदस्यों और नेताओं ने भी कई बार कहा है कि लालू प्रसाद के साथ जिस तरह का व्यवहार हो रहा है, उससे साफ होता है कि उन्हें जानबूझ कर परेशान किया जा रहा है. इस मामले को राजनीतिक बदले की भावना से भी देखा जा रहा है.

इसका कारण यह है कि बिहार में लालू प्रसाद को भारी जनसमर्थन है और वे एक ऐसे नेता हैं, जिसे समाज का वंचित तबका अपनी मुक्ति का रहबर मानता है. हालांकि इस लोकसभा चुनाव में राजद को भारी धक्का लगा है.

बावजूद इसके चुनाव के वोट शेयर बताते हैं कि लालू प्रसाद का असर अब भी जादुई उपस्थिति की तरह है. हालांकि उनकी विरासत संभाल रहे लोगों की राजनीतिे भूलों और महत्वकांक्षाओं पर इस चुनाव परिणाम ने सटीक टिप्पणी की है.

करारी हार के बाद राजनीतिक प्रेक्षक लालू प्रसाद को वह फिनिक्स बता रहे हैं, जो राख से खड़ा होकर चुनौती देने की ताकत रखता है. इस चुनाव में जिन लोगों ने उनके विरोध में वोट किया है, उसमें भी वंचितों के बड़े वर्ग में लालू प्रसाद का गहरा सम्मान है.

बिहार के राजनीतिक जानकारों की राय है कि लालू प्रसाद राजनीतिक दबावों से टूटते नहीं हैं. उन्होंने कई बार यह साबित किया है कि वे विपरीत हालातों में भी अपनी राजनीति को खत्म नहीं होने देते हैं. उनकी राजनीति के दो प्रमुख सूत्र हैं, एक तो सामाजिक न्याय और दूसरा सांप्रदायिकता का सक्रिय प्रतिरोध.

1990 के दशक में वे मंडल मसीहा की तरह उभरे और बिहार की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया. इसके पहले कर्पूरी ठाकुर भी इस तरह का चमत्कार नहीं कर पाए थे. 1990 के बाद का बिहार, राजनीतिक तौर पर नया नरैटिव स्थापित कर चुका है. बिहार में भारतीय जनता पार्टी भी इसी नरैटिव के आधार पर राजनीति करती है.

बिहार में 1990 के बाद जिस तरह मंडलवाद और अंबेडकरवाद का समन्वय हुआ, वह 30 सालों के बाद भी जारी है. यहां तक नरेंद्र मोदी भी बिहार में इसी नरैटिव के सहारे अपनी जमीन पुख्ता करने में कामयाब हुए हैं.

हालांकि भाजपा की रणनीति में इस नरैटिव का समन्वयकारी विस्तार अंतरनिहित है. जाहिर है बिहार में लालू प्रसाद के राजनीतिक खतरे की छाया से भी उनके प्रतिद्वंदी परेशान रहते हैं.

यही नहीं लालू प्रसाद ने देश भर में उन राजनीतिक दलों को गोलबंद करने की कई सफलता हासिल की है, जो सेकुलर की अवधारणा को लेकर सक्रिय है. वामपंथी दलों पर भी उनका प्रभाव है और वामपंथ के नेता राजनीतिक तौर पर उन्हें महत्व को नजरअंदाज नहीं करते हैं.

लालू प्रसाद आर्थिक घोटाले के मामले में सजा काट रहे हैं. यह सजा निचली अदालतों ने दी है. सजायाफ्ता होने के बावजूद इस समय वे एक मरीज हैं और इलाज के नागरिक अधिकार उन्हें हासिल हैं. एक कैदी के दौर पर उन्हें कुछ अधिकार प्राप्त हैं. इस हालत में इस तरह की घटना से सरकार की मंशा पर संदेह तो लाजिमी ही है.

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