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बंद होते उद्योग क्यों न बने चुनावी मुद्दा: मोमेंटम झारखंड के बाद भी राज्य में नहीं सुधरी उद्योगों की स्थिति

Chhaya
Ranchi: पिछले पांच सालों में जितना असंतोष अनुबंध कर्मचारियों और निम्न वर्गीय लोगों में देखा गया है, उतना ही असर औद्योगिक घरानों में भी पाया गया है. राज्य में स्थित कई बड़े और छोटे इंडस्ट्री बंद हुए है. सबसे अधिक असर राज्य के छोटे उद्योगों को झेलनी पड़ी.

राज्य के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों की बात की जायें तो जमशेदपुर इसमें प्रमुख है. एक आंकड़े के अनुसार सिर्फ जमशेदपुर में पिछले दो साल में 700 छोटे उद्योग बंद हुए. जिसमें अधिकांश ऑटोमोबाइल स्पेयर पार्ट के इंडस्ट्री रहे हैं. जबकि क्षेत्र में लगभग तीन हजार से अधिक स्माॅल स्केल उद्योग हैं. जिसमें फूडिंग, प्लास्टिक और ऑटोमोबाइल के इंडस्ट्री शामिल हैं.

सबसे अजीब बात रही कि इस क्षेत्र से टाटा टोयो नामक कंपनी, जो लार्ज स्केल इंडस्ट्री है, भी बंद हो गयी. जो कि अंतराष्ट्रीय कंपनी रही है. सिर्फ टाटा टोयो से लगभग सात सौ लोग बेरोजगार हुए. जानकारों से बात करने से पता चला कि क्षेत्र में लार्ज स्केल के लगभग दस इंडस्ट्री बंद हुए हैं. ऐसे में कुल मिलाकर लगभग 40 हजार लोग बेरोजगार हुए हैं.

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राज्य के अन्य क्षेत्रों में भी पड़ा मंदी का असर

हालांकि सरकार ने पिछले पांच सालों में उद्योग को बढ़ावा देने के लिये कई नीतियां बनायी. लेकिन फिर भी उद्योगों का बंद होना जारी रहा. रांची स्थित तुपुदाना औद्योगिक क्षेत्र में लगभग 150 उद्योग है. यहां सिर्फ जून और जुलाई के माह में लगभग 50 उद्योग बंद हो गये.

इस क्षेत्र में फेब्रिकेशन, इंजीनियरिंग, माइनिंग, स्टील प्लांट सेमत अन्य स्पेयर पार्टस बनाये जाते थे. अन्य 100 उद्योग भी बंदी के कागार पर हैं. खबर आने के बाद उद्योग विभाग ने व्यापारियों से बात की लेकिन इस पर कोई हल नहीं निकाला. वहीं क्षेत्र की स्थिति भी निर्माण के नाम पर पिछले एक साल से बदतर है. फिलहाल इन उद्योगों की स्थिति ये है कि यहां काम तो हो रहा है लेकिन 20-25 की जगह पांच छह कामगार ही दिखाई दे रहे हैं.

रामगढ़ में भी 42 स्पंज आयरन के उद्योग बंद हो गये. जिससे लगभग 5000 लोग बेरोजागार हुए. स्थानीय व्यवसायियों से बात करने से जानकारी मिली की इसकी जानकारी कई बार उद्योग विभाग को दी गयी. लेकिन इस पर कुछ नहीं किया गया. गौरतलब है कि राज्य में उद्योग मंत्री मुख्यमंत्री ही हैं.

पतरातू और देवघर नहीं बन पायें ओद्योगिक क्षेत्र

राज्य सरकार ने उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए पतरातू और देवघर को औद्योगिक क्षेत्र बनाया. देवघर के देवीपुर को इसी सरकार ने औद्योगिक क्षेत्र घोषित किया. इस क्षेत्र में 70 लोगों के बीच लगभग 82 प्लाॅट आवंटित की गयी. आवंटन सिंगल विंडो सिस्टम के तहत की गयी. लेकिन सभी जमीन विवादित निकले. जबकि इस क्षेत्र को औद्योगिक क्षेत्र बनाने के लिये 438 एकड़ जमीन सरकार ने चिन्हित की.

इसमें से 83 एकड़ जमीन में प्लास्टिक पार्क बनाया गया. लेकिन अभी तक प्लास्टिक पार्क का काम भी पूरा नहीं हो पाया है. सिंगल विंडो सिस्टम के तहत राज्य सरकार ने व्यापारियों को जमीन देने की बात की, लेकिन अब तक जितने भी जमीन आवंटित किये गये. उनमें अधिकांश जमीन विवादित निकल गयें. इसके लिये सरकार ने लैंड बैंक नियम भी बनाया.

सिर्फ पतरातू में लगभग छह लोगों को विवादित जमीन दिया गया. जबकि इन लोगों ने जमीन के लिये अग्रिम भुगतान किया. कई बार व्यापारियों ने सरकार के पास शिकायत की. फेडरेशन ऑफ झारखंड चेंबर ऑफ काॅमर्स एंड इंडस्ट्रीज के प्रयास के बाद भी इन समस्याओं का समाधान नहीं किया गया.

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मोमेंटम झारखंड की मात्र दो कंपनियां धरातल पर

राज्य सरकार ने 16 और 17 फरवरी 2017 को मोमेंटम झारखंड का आयोजन किया. जिसमें देश के बड़े उद्योपतियों के साथ-साथ विदेशी उद्योपतियों को बुलाया गया. इस आयोजन से लगभग 3.50 लाख करोड़ निवेश होने की संभावना थी.

जमशेदपुर के गोपाल मैदान में जून 2017 को 74 कंपनियों का शिलान्यास किया गया. इसके तहत सात सौ करोड़ रुपये निवेश करने वाली 21 कंपनियों को जमीन उपलब्ध कराना था. कोल्हान में लगभग एक लाख लोगों को रोजगार मिलना था, पर एक भी योजना धरातल पर नहीं उतर पायी.

मोमेंटम झारखंड के तहत सिर्फ अरविंद मिल्स और ओरिएंट क्राफ्ट ही लगाये गये. 27 अप्रैल 2018 को राज्य सरकार ने फिर से मोमेंटम झारखंड के चौथे चरण का आयोजन किया. जिसमें मुख्यमंत्री रघुवर दास ने 10 हजार 600 लोगों को रोजगार देने की बात कही. लेकिन साल 2019 आने तक राज्य में उद्योगों से होने वाली बेरोजगारी और बढ़ गयी.

सरकार की गलत नितियां उद्योगों के बंद होने की वजह

कुछ व्यापारियों से बात करने से जानकारी मिली कि सरकार की गलत नितियां उद्योगों को बंद करने की प्रमुख वजह है. इसमें बिजली और टैक्स सबसे प्रमुख हैं. राज्य के छोटे उद्योग बड़ी और मदर कंपनियों पर निर्भर रहते हैं. लेकिन राज्य की बड़ी कंपनियां जैसे टाटा, मेकाॅन आदि ही इन छोटे उद्योगों को ऑर्डर देना बंद कर दी.

यह सिलसिला पिछले दो सालों में तेजी से हुआ. वहीं खनिज लाने के लिये भी आइओसीएल जैसी कंपनियों की ओर से अलग-अलग पाबंदियां लगायी जाने लगी.

बिजली दरों में 40 प्रतिशत वृद्धि की गयी. जिसे राज्य के उद्योग सहन नहीं कर पाये. व्यापारियों की शुरू से मांग रही है कि सरकार उनकी बात सुने लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

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