Opinion

14 अप्रैल, अंबेडकर जयंती पर : बाबा साहेब और उनके मूल्यों को याद करना आज क्यों जरूरी है

Faisal Anurag

“भारतीय प्रेस (मीडिया) में समाचार को सनसनीखेज बनाना, तार्किक विचारों के स्थान पर अतार्किक जुनूनी बातें लिखना और जिम्मेदार लोगों की बुद्धि को जाग्रत करने के बजाय गैर-जिम्मेदार लोगों की भावनाएं भड़काना आम बात है.”

– डॉ भीमराव अंबेडकर

(संपूर्ण वाङ्मय, खंड 1, पृ. 273) 

डॉ अंबेडकर ने अपनी दूरदर्शिता से मीडिया के संदर्भ में जितनी बातें कहीं थी वह आज कहीं ज्यादा प्रासंगिक है. डॉ. अंबेडकर भारत के उन नेताओं में हैं जिनके नेतृत्व में भारत के उत्पीड़ित दलितों ने इंसाफ और बराबरी के लिए संघर्ष किया. अंबेडकर ने उन बहसों को खड़ा किया जिस पर चर्चा तक नहीं की जाती थी. जाति का सवाल इसमें महत्वपूर्ण था. इसके साथ ही आधुनिक वैश्विक मूल्यों की भारतीय व्याख्या को भारत के संविधान का हिस्सा बनाया.

भारत का संविधान की संरचना में अंबेडकर की प्रभावी भूमिका है. संविधान के माध्यम से उन्होने भारत के लिए एक ऐसे देश की परिकल्पना पेश की जिसकी बुनियाद समानता, स्वतंत्रता, न्याय और धर्मनिरपेक्षकता है. उस दौर में यह कोई मामूली बात नहीं थी जब अतीतवादी भारत की दिशा को बदलने के लिए तरह-तरह से कुचक्र कर रहे थे. इन अतीतवादियों ने कभी भी भारत की जाति व्यवस्था पर सवाल नहीं किया. बल्कि उसे धर्म संगत ठहराने का षडयंत्र तक किया.

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हालांकि आजादी के इतने सालों के बाद भी भारत में जाति का सवाल महत्वपूर्ण बना हुआ है. और वह भारत की आधुनिक अवधारणा को अलग-अलग तरीके से चुनौती देता रहता है. सवाल उठता है कि आखिर आजादी की इतनी लंबी लड़ाई के बाद भी भारत की सामाजिक जड़ता और स्थिरता खत्म क्यों नहीं हुई?  इस सवाल का हल अंबेडकर के अनेक भाषणों और पुस्तकों में दर्ज है. जाति का उन्मूलन के सवाल पर उनकी पुस्तक अत्यंत महत्वपूण है. जाति के इतिहास और शोषण व उत्पीड़न के इतिहास पर अंबेडकर की दृष्टि अपूर्व और  अतुलनीय है.

अंबेडकर को उनकी जयंती पर याद करना उनके विचारों को गहरायी से अमल में लाने की मांग करता है. जिस पर अंबेडकरवादी आंदोलनों के एक बड़े तबके की खोमोशी बहुत कुछ कहती है. अंबेडकर अपने समय और इतिहास की जिस कठोर आलोचना को प्रस्तुत करते हैं वह उन्हें तमाम विमर्शो में विशिष्ट बना देता है.

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अंबेडकर को याद करने का मतलब होता है संविधान के मूल्यों को जमीन पर उतारना. सामाजिक और आर्थिक इंसाफ भारत के संविधान की प्रस्तावना के मूल मूल्यों में एक है. भारत में जिस तरह सामाजिक और आर्थिक विषमता की खायी बढ़ती गयी है वह पुष्ट करती है कि भारत के संविधान के मूल्यों की रक्षा के लिए और ज्यादा समर्पण की जरूरत है. भारत में जिस तरह आर्थिक आधार पर समाज का विभाजन बढ़ रहा है, वह अनेक अंतरविरोधों को तेज करता है.

इन अंतरविरोधों को हल करने के लिए अंबेडकर जैसे नजरिया की जरूरत है. जो गांधी की तरह ही भारत को सशक्त करने के लिए सामाजिक शक्तियों के अधिकारों की वकालत करते रहे हैं.  अंबेडकर गांधी ओर नेहरू के साथ एक आधुनिक भारत का विचार गढ़ते हैं. इन तीनों के बीच के तमाम अंतरविरोधों के बावजूद उनमें एक खास तरह की सूत्र बद्धता भी है.

स्वतंत्रता संग्राम अनेक विचारों के बीच एक ऐसे सूत्र का निर्माण करता है जो भविष्य का प्रगतिशील नजरिया पेश करता है. भारत को अतीत के गौरव के मिथ से बाहर निकालने में गांधी,  नेहरू और अंबेडकर के इतिहासबोध की बडी भूमिका है. गांधी ने हिंद स्वराज के बाद जो वैचारिक यात्रा की है, उसमें निरंतरता के साथ नवीनता को ग्रहण करने की अद्भुत मिसाल है.

अंबेडकर और गांधी को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा किया जाता रहा है. यह आसान भी रहा है. लेकिन आज यह बहस तेज है कि दोनों एक दूसरे के पूरक हैं न कि विरोधी. हालांकि जाति के सवाल पर गांधी और अंबेडकर के नजरिए में बड़ा अंतर है. इसके साथ ही अनेक ऐसे सवाल भी हैं जिनकी पर चर्चा कम हुई है.

भारत में जैसे-जैसे संविधान की अहमियत बढ़ती गयी है, अंबेडकर के व्यक्त्वि और विचारों को ले कर विमर्श भी तीक्ष्ण होता गया है. यहां तक कि अंबेडकर के खुले वैचारिक विरोधी भी अब उनके नाम पर खूब कार्यक्रम करते हैं. लेकिन वे अंबेडकर के मूल सवालों को कभी नहीं उठाते. अंबेडकर का इतिहास दृष्टिकोण उन धाराओं को मोड़ने का प्रयास करता है जिससे भारत में जाति उत्पीड़न के अनेक तरह के बंधनों को मजबूती दी.

अंबेडकर का इतिहास हस्तक्षेप निर्ममता से धर्मग्रंथो की अवधारणों की आलोचना खड़ा करता है. और नया विमर्श खड़ा करता है.  अंबेडकर ने उत्पीड़ितों और दलितो को नया इतिहासबोध दिया. यह एक बड़ी सामाजिक क्रांति है. यह समूह आज बहुजन के नाम से भारत के राजनीति के विमर्श को प्रभावित करता है. हालांकि बहुजनों की राजनीत भी इतिहास के कठघरे में खड़ी है. बावजूद उसकी अहमियत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. क्योंकि समाज में क्रांतिकारी बदलाव की आकांक्षा उससे निर्मित होती है.

इस परिप्रेक्ष्य में मीडिया की भी भूमिका है. डा अबेडकर मीडिया पूजा और व्यक्तिपूजा के खिलाफ एक समानांतर लोकतांत्रिक नजरिया पेश करते हैं. इसका अर्थ मीडिया के सामाजिक ढांचे से भी जुड़ा है. आज के समय में मीडिया की भूमिका बताती है कि मूकनायक के माध्यम से डॉ अंबेडकर ने जो लोकातांत्रिक संवाद की राह प्रशस्त की थी उसे गंभीरता से विचार का विषय बनाते हुए स्वतंत्र व सामाजिक तानेबाने के अनुकूल मीडिया संरचना की वकालत की जाये.

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