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भारत की राजनीति में धार्मिकता सावर्जनिक बहस का विषय क्यों ?

भारतीय राजनीति की यह विडबंना है कि नेताओं की निजी या़त्राएं भी राजनीतिक विवाद का कारण बन जाती है

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                                                                                                                              संदर्भ : राहुल गांधी की मानसरोवर यात्रा                                                                                                   

Faisal Anurag

भारतीय राजनीति की यह विडबंना है कि नेताओं की निजी या़त्राएं भी राजनीतिक विवाद का कारण बन जाती है. 21वीं सदी में भारतीय राजनीति में विमर्श विज्ञान ओैर टेक्नोलॅाजी पर नहीं होकर उन धार्मिक प्रतीकों और यात्राओं पर केंद्रित है,  जिनका कोई सरोकार आमजनों की रोजमर्रे की समस्याओं से नहीं है. भारत दुनिया की आर्थिक ताकत बनने की बात करता है, लेकिन उसकी राजनीति में इस सवाल पर शायद ही कोई खास चर्चा होती है. दुनिया के विकसित देशों में जीवन को बेहतर करने के सवाल पर विभिन्न नजरिया उभर कर सामने आ रहा है. विकास जनित पर्यावरण संकट  और आर्थिक असमानता के बढने पर गहरी चिंता दिखती है.

दुनिया के अनेक देशों में विकास की नीतियों के कारण जो भेद पैैदा हुए हैं ओर लोकतंत्र पर उसका जो प्रभाव हुआ है, वह भी विचार विमर्श को बडा कारण बना हुआ है. लेकिन एशिया, अरब और अफ्रीका के कुछ देशों में उभरते कट्टरपंथ के कारण लगातार विमर्श किसी पिछड़ी हुई चेतना का ही बोध करा रहा है.  यही कारण हे कि इन देशों के विकास के देशज अभियान जोर नहीं पकड रहे हैं और न ही इन देशों की लोकतांत्रिक चेतना मध्यकालीन प्रभावों से मुक्त हो पा रही है. इस कारण इन देशों के वैज्ञानिक भी कोई मौलिक शोध के क्षेत्र में योगदान नहीं दे पा रहे हैं. पिछले कुछ समय से भारत भी इसी तरह के विवादों में घिरा हुआ है.

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राहुल गांधी की मानसरोवर यात्रा को भाजपा ने विवाद का विषय बना दिया

राहुल गांधी की मानसरोवर यात्रा को भारतीय जनता पार्टी ने विवाद का विषय बना दिया है. इसके पहले भी गुजरात ओर कर्नाटक के चुनावों के दोरान राहुल गांधी की मंदिर यात्राओं को भाजपा ने विवाद में लाने की कोशिश की थी. दरअसर भारतीय राजनीति में राजनीतिक,आर्थिक सवालों को विमर्श को विषय नहीं बनाया जा रहा है. इसका ठोस कारण है कि आर्थिक सवालों को यदि विमर्श का केंद्र बनाया जायेगा तो अधिकांश राजनीतिक दल इससे बेनकाब हो जायेंगे. भारत की आर्थिक नीतियां जिस दिशा में जा रही है, उससे लोगों को फायदा कम ही हो रहा है. एलिट तबका जरूर इससे खुश है. सवाल उठता है कि भारत की राजनीति में धार्मिकता को सावर्जनिक बहस का विषय क्यों बना दिया गया है. भारतीय स्वतंत्रता संग्रम के दौरान धार्मिक रूझान के नेता सक्रिय थे, लेकिन उन्होंने धर्म के सवाल को सार्वजनिक सवाल शायद ही कभी बनाया.

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भारत का संविधान भी धर्म के सवाल को सार्वजनिक बनाने के पक्ष में नहीं है. लेकिन पिछले तीन दशकों की राजनीति ने भारत की सारी बहस को प्रभावित किया है और आज यह होड़ लगी हुई है कि कौन कितना बडा धार्मिक है.? मानसरोवर जाना या नहीं जाना यह किसी को निजी सवाल है. लेकिन एक ओर भाजपा इसकी आलोचना कर रही है और कांग्रेस इसे राहुल गांधी को बहुत बडा धार्मिक रूझान वाला नेता साबित कर रही है. यह सिलसिला लोकसभा चुनाव तक और बढ़ेगा और इस कारण देश के अनेक फौरी सवाल राजनीतिक मंच पर शायद ही उठे.

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भाजपा ने राहुल के हिंदू होने का प्रमाण मांगा और उन्हें चायनीज गांधी की संज्ञा दी है

राहुल गांधी पर प्रहार करते हुए भाजपा ने राहुल गांधी के हिंदू होने का प्रमाण मांगा है और उन्हें चायनीज गांधी की संज्ञा दी है. दूसरी ओर नेपाल की विभिन्न यात्राओं में नरेंद्र मोदी ने पशुपतिनाथ की यात्रा कर भारत के अपने सहधर्मियों पर असर डालने का प्रयास किया है. क्या धार्मिक सवाल राजनीति में वोट प्रभावित करने का कारक बना दिया गया है. एक समय संवैधानिक पदों पर बैठे संवेदनशीन नेता अपनी इस तरह की छवि नहीं बनाते थे,  लेकिन बाबरी मस्जिद, राम जन्मभूमि आंदोलन के बाद जो बदलाव आया, वह 2014 के बाद से पूरी तरह साफ दिखने लगा है. कांग्रेस में राहुल गांधी पहले नेता हैं, जो लगातार मंदिरों और धार्मिक स्थलों की यात्रा कर रहे हैं.

महात्मा गांधी खुले रूप से कहा करते थे कि वे हिंदू हैं, लेकिन राजनीतिक तौर पर वे सचेत हो सर्वधर्म समभाव को ही महत्व देते थे. उनके लिए धार्मिक विश्वास राजनीति का विषय नहीं था, बल्कि आस्था का सवाल था. आज के संदर्भ में बदलाव यह आया है कि धार्मिक आस्था, राजनीतिक विषय निजी संदर्भ से ज्यादा हो गये हैं और यह भारत की अनेक प्रगतिकामी चेतना को पीछे की ओर ले जा रहे हैं. इसका असर यह है कि भारत में वैज्ञानिक चेतना प्रभावित हो रही है और भविष्य में इसके नकारात़्मक असर का अंदेशा है. साथ ही अंधविश्वास भी तेजी से पसर रहा है.

                                                                                            (लेखक न्यूज विंग के वरिष्ठ संपादक हैं और ये उनके निजी विचार हैं)

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