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आखिर क्यों बांग्लादेश से रेमडेसिविर मंगाने की है योजना…

New Delhi : देश में कोरोना की दूसरी लहर ने स्वास्थ्य सिस्टम को हिला कर रख दिया है. एक ओर हर रोज कोरोना के मामले बढ़ते जा रहे हैं वहीं ऑक्सीजन और जरूरी दवाओं की किल्लत बढ़ती जा रही है. इनमें से एक जरूरी इंजेक्शन रेमडेसिविर भी है. केंद्र सरकार इसकी सप्लाई बढ़ाने के लिए कई तरह के उपाय कर रही है.

अमेरिकी फार्मा दिग्गज कंपनी गिलियड साइंसेज ने रेमडेसिविर की 450,000 शीशियां देने पर सहमति जतायी है. इसके अलावा सरकार मिस्र, उज्बेकिस्तान, यूएई और बांग्लादेश जैसे देशों से भी इसे खरीदने की योजना बना रही है. सरकार चाहती है कि देश में इसकी किसी भी प्रकार से किल्लत न हो.

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बांग्लादेश में रेमडेसिविर का उत्पादन है सस्ता

सरकार बांग्लादेश के रेमडेसिविर खरीदने की योजना बना रही है उसके पीछे सबसे बड़ा कारण वहां इसका सस्ता होना भी है. बांग्लादेश में दवा के जेनरिक उत्पाद की कीमत काफी कम होती है. यूएन क्लासिफिकेशन के अनुसार बांग्लादेश कम विकसित देश (LDC) कैटेगरी में आता है. वह रेमडेसिविर का जेनरिक वर्जन उत्पादित कर सकता है. इसके लिए उसे मूल कंपनी से लाइसेंस की जरूरत नहीं होगी. दोहा घोषणा के अनुसार ट्रिप्स (TRIPS) पेटेंट कानून 2033 तक बांग्लादेश पर लागू नहीं हो सकते हैं. बांग्लादेश में उत्पादन लागत काफी पड़ने के कारण भारत को यह दवा सस्ते में मिल सकती है.

रेमडेसिविर पर इम्पोर्ट ड्यूटी खत्म

देश में इस एंटीवायरल दवा की कमी को देखते हुए भारत ने इस महीने की शुरुआत में रेमडेसिविर के आयात पर इम्पोर्ट ड्यूटी और इसे बनाने के लिए उपयोग किये जाने वाले कच्चे माल पर शुल्क को खत्म कर दिया था. आधिकारिक सूत्रों ने रेमडेसिविर के मालिक गिलियड साइंसेज की तरफ से दवा की 4.50 लाख शीशियों को दान करने के फैसले को कूटनीतिक जीत बताया था. इतना ही नहीं कंपनी ने स्थानीय उत्पादन में तेजी लाने के लिए कच्चा माल भी उपलब्ध कराने का फैसला किया.

 

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