Opinion

“सर्वज्ञ” की छवि वाले मोदी विशेषज्ञों की सलाह से क्यों रखते हैं इतनी दूरी

Faisal Anurag   

राजनीतिक और आर्थिक मामलों में केंद्र विपक्ष के सुझाव को गंभीरता से नहीं लेता. मोदी सरकार ने “सर्वज्ञ” की छवि का नियोजित प्रयास किया है. लेकिन विपक्ष या विशेषज्ञों के सुझावों की अपनी अहमियत है. डॉ. मनमोहन सिंह ने एक विदेशी मीडिया को दिये ईमेल साक्षात्कार में आर्थिक मामलों को ले कर महत्वपूर्ण बातें कहीं हैं. और केंद्र सरकार को सुझाव दिया है. नोटबंदी के बाद डॉ. सिंह ने बड़ी मंदी आने का अंदेशा राज्यसभा में व्यक्त किया था. और नोटबंदी को संगठित लूट बताया था.

डॉ. सिंह ने एक बार फिर चेतावनी दी है कि देश एक और मंदी की चपेट में है. 1970 के बाद की सबसे बड़ी मंदी की चेतावनी देते हुए डॉ. सिंह ने कहा कि वर्ततान वित्त वर्ष में जीडीपी ग्रोथ में भारी गिरावट संभावित है. हालांकि उन्होंने डिप्रेशन शब्द का इस्तेमाल नहीं किया है. लेकिन आर्थिक सुस्ती तय है- ये बात कही है.

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इस माहामारी की चपेट के बीच वे पहले भी तीन बार आर्थिक स्थिति को ले कर सरकार को सुझाव दे चुके हैं. लेकिन केंद्र ने डॉ. सिंह के सुझावों को गंभीरता से नहीं लिया है. डॉ. सिंह ने इस बार सरकार को तीन कदम त्वरित गति से उठाने का सुझाव दिया है.  डॉ. सिंह के अनुसार, केंद्र की ओर से लोगों को खर्च के लिए अच्छी खासी नगदी मदद दिये जाने चाहिये. साथ ही सरकार को लोगों की आजीविका की गारंटी करनी चाहिये. उनका दूसरा सुझाव है कि कारोबार में गति पहुंचाने के लिए पर्याप्त पूंजी सरकार उपलब्ध कराये.

इसके लिए क्रेडिट गारंटी प्रोग्राम चलाने की जरूरत है. तीसरा सुझाव है कि “सांस्थानिक स्वायत्तता और प्रक्रियाओं” के ज़रिए वित्तीय सेक्टर की समस्याओं को हल करना चाहिये. डॉ. सिंह से मिलते जुलते सुझाव इसके पहले रिजर्व बैंक के गवर्नर रह चुके डॉ. रघुराम राजन ने भी दिये थे.  लोगों के लिए कैश पर उनका जोर शुरू से रहा है.

नोबल पुरस्कार विजेता भारतीय मूल के डॉ. अभिजीत बनर्जी ने भी इस आशय का सुझाव दिया था. इनके अतिरिक्त दूसरे अनेक विशेषज्ञों ने सरकार को इस तरह के सुझाव दिये थे. केंद्र ने जब 21 लाख करोड़ के पैकेज की घोषणा की थी, तब उम्मीद की जा रही थी कि विशेषज्ञों के सुझावों को गंभीरता से लिया जायेगा.

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लेकिन जैसा कि साबित हो चुका है कि सरकार का पैकेज प्रोत्साहन पैदा करने के बजाय कर्जखोरी बढ़ाने का माध्यम भर बन कर रह गया है. इससे छोटे और मंझोले उद्योग को गति तो मिल ही नहीं पायी. और न ही श्रमिकों के विश्वास बहाली में मदद मिली है. मध्य वर्ग की क्रयशक्ति जिस तरह प्रभावित हुई है, उसके दूरगामी असर दिखने लगे हैं. बावजूद केंद्र सरकार इन से बेखबर है. सरकार की ओर से कहा गया है कि प्रधानमंत्री मोदी 15 अगस्त को आत्मनिर्भर भारत योजना के तहत बड़ी घोषणा करेंगे.

हावर्ड बनाम हार्ड वर्क का प्रतीक गढ़ चुके नरेंद्र मोदी आखिर जानकारों की इतनी उपेक्षा क्यों करते हैं. उनके सलाहकार परिषदों में भी ऐसे विशेषज्ञों की कमी है जो निष्पक्ष तरीके से सरकार की नीतियों का मूल्यांकन पेश करें. या नीतियों के निर्माण में स्वतंत्र सुझाव दे सकें. प्रधानमंत्री की आर्थिक परिषद में अब तक दो बड़े विद्रोह हो चुके हैं.

इसमें डॉ. अरविंद सुब्रह्मण्यम भी शामिल हैं. जिन्होंने मोदी सरकार की कार्यशैली में स्वतंत्र विचारों के प्रति सहानुभूति न रखने का खुलासा किया. उन्होंने केंद्र के आर्थिक आंकड़ों को ले कर भी सवाल खड़े किये. और उसमें मनमानी बदलाव करने का आरोप तक लगाया है. कांग्रेस के कई नेताओं ने समय-समय पर केंद्र को आर्थिक और अन्य मामलों में सुझाव दिये. लेकिन इनमें से किसी पर भी केंद्र ने कभी ध्यान नहीं दिया.

डॉ. सिंह के सुझावों का भविष्य क्या होगा, यह तो समय साबित करेगा. लेकिन केंद्र को गंभीरता से समझने की जरूरत है कि राजनीति वर्चस्व दिखाने के बजाय विशेषज्ञों के सुझावों के प्रति गंभीर हों. ताकि कोविड माहामारी के कारण फैली आर्थिक मंदी से निपटा जा सके.

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