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क्यों है सबकी नजर, पाकुड़ विधानसभा सीट पर…

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Akshay Kumar Jha

Ranchi: आखिर ऐसी क्या बात है कि पाकुड़ विधानसभा सीट पर पूरे सूबे की नजर है. लोगों में इस बात को लेकर काफी जिज्ञासा है कि पाकुड़ से इस बार विधायक बन कर विधानसभा कौन पहुंचता है. क्या जीत को दोहराते हुए कांग्रेस के आलमगीर आलम बाजी मारते हैं या फिर बीजेपी किसी समीकरण के तहत इस सीट को अपनी झोली में डालने में सफल होती है.

विपक्षी पार्टी अगर गठबंधन करते हैं, तो क्या जेएमएम यहां से अपना उम्मीदवार का दावा करेगा या कोई मजबूत उम्मीदवार आजसू में जा कर इस सीट पर कब्जा करना चाहेगा.

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तमाम तरह के सवाल हैं. इन सवालों के बीच एक नाम ऐसा भी है, जो इस सीट को झारखंड के तमाम सीटों से अलग करता है. वो नाम है बड़े ही कम समय में एक साधारण से पंचायत की मुखिया से बीजेपी की प्रदेश प्रवक्ता बनी मिसफिका हसन का है.

कौन-कौन हैं रेस में

टिकट मिलने से पहले इस बात को लेकर काफी चर्चा है कि आखिर पाकुड़ सीट से चुनाव कौन लड़ेगा. बीजेपी अपना उम्मीदवार किसको बनाती है. जाहिर है कि कांग्रेस की तरफ से आलमगीर आलम के अलावा कोई भी उम्मीदवार दावेदारी करने में सफल नहीं हो सकता.

गठबंधन होता भी है तो निश्चित तौर पर सीट कांग्रेस के खाते में ही जाएगी. सीट कांग्रेस के खाते में जाते ही पूर्व विधायक अकील अख्तर की राजनीति जीवन पर संकट के बादल छाने लगेंगे. ऐसे में अकील अख्तर क्या करेंगे.

उनके सामने दूसरी किसी पार्टी में जाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है. क्योंकि उन्हें इस बात का भरोसा है कि उनका पाकुड़ विधानसभा क्षेत्र में अपना जनाधार है. एक बार विधायक बनने का तजुर्बा भी उनके पास है.

2009 में उन्होंने मौजूदा विधायक आलमगीर आलम को हराया था. अकील अख्तर के समर्थकों के बीच इस बात की कानाफूसी है कि वो आजसू के साथ जा सकते हैं. लेकिन सवाल यह है कि क्या बीजेपी पाकुड़ जैसे संवेदनशील सीट को आजसू की झोली में डालेगी.

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इसलिए आजसू के साथ अकील अख्तर का जाना और उनका विधायक उम्मीदवार बन जाना कहना अभी जल्दबाजी होगी. ऐसे में सवाल अब उठता है कि बीजेपी की पाकुड़ विधानसभा सीट को लेकर क्या रणनीति है.

बीजेपी के लिए पाकुड़ विधानसभा खास क्यों ?

एक ऐसी यंग लेडी का जिसने डीपीएस फरक्का से स्कूलिंग, रांची के कैरैली स्कूल से प्लस टू, संत जेवियर स्कूल से बायो-टेक में ग्रेजुएशन, दिल्ली के जामिया मीलिया यूनिवर्सिटी से बायो-टेकनॉलिजी में पीजी और इसके बाद एम्स में सेलेक्शन.

एम्स में महीनों कैंसर पर रिसर्च करने के बाद वापस हमेशा के लिए झारखंड लौट जाना. वो भी पाकुड़ जैसे जिले में. यहां आने के बाद मुखिया बनना और फिर बीजेपी ज्वाइन करते ही पार्टी की प्रदेश प्रवक्ता बन जाना. प्रवक्ता बनते ही विधानसभा चुनाव के लिए फिल्डिंग करना इस विधानसभा को खास बना देता है.
लेकिन सवाल है कि क्या बीजेपी झारखंड में एक मुस्लिम महिला को उम्मीदवार बनाने का रिस्क लेगी. युवा होना, बीजेपी प्रदेश कार्यालय में उनकी पहुंच और क्षेत्र में सक्रियता इस बात को बल देती है कि वो चुनाव में पार्टी का फेस हो सकती हैं.

लेकिन बात यह भी हो रही है कि वो क्षेत्र में जितनी चर्चित हैं, उसके मुताबिक उनकी पैठ उतनी नहीं है. मिसफिका के अलावा इस सीट के लिए बीजेपी की तरफ से पिछले चुनाव के उम्मीदवार रंजीत तिवारी ताल ठोंक रहे हैं.

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पिछली बार वो नंबर तीन पर थे. श्यामल कुमार दास जो बरहरवा नगर परिषद के अध्यक्ष हैं, वो भी टिकट के लिए जोर लगा रहे हैं. अनुग्रहित प्रसाद जैसे कुछ और नाम भी शामिल हैं.

बीजेपी के लिए क्या हो सकता है जीत का समीकरण

पाकुड़ विधानसभा को नजदीक से जानने वालों का कहना है कि बीजेपी के लिए यहां जीत तभी सुनिश्चित हो सकती है, जब कुछ खास समीकरण बने. अगर कांग्रेस और दूसरी किसी पार्टी से मजबूत मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव लड़ते हैं और बीजेपी किसी आदिवासी उम्मीदवार पर भरोसा जताती है, तो जीत की संभावना है.
क्योंकि पाकुड़ विधानसभा में मुस्लिम वोटर ज्यादा हैं. वहीं आदिवासी वोटर भी करीब 25 हजार हैं. आदिवासी उम्मीदवार की वजह से आदिवासी वोट मिलने के अलावा बीजेपी का अपना कोर वोटर का वोट भी पार्टी के खाते में आएगा.

पाकुड़ विधानसभा का संयोग

पाकुड़ विधानसभा का इसे संयोग ही कहा जा सकता है कि यहां से ज्यादातर विधायक बरहरवा प्रखंड के उम्मीदवार ही बनते हैं. बरहरवा साहेबगंज जिले में आता है. लेकिन विधानसभा क्षेत्र पाकुड़ है.
संयुक्त बिहार के दौरान मात्र तीन बार ऐसा हुआ कि यहां के विधायक बरहरवा प्रखंड के नहीं थे. उनमें से एक जनसंघ के उम्मीदवार बद्रिकानाथ झा थे. बीजेपी से दो बार विधायक बने बेनी प्रसाद गुप्ता थे और कांग्रेस से रानी ज्योतीर्मयी थी. बाकी ज्यादातर विधायक बरहरवा प्रखंड के ही थे.

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