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चुनाव आयोग नफरती चुनाव प्रचार पर अंकुश लगाने में कमजोर क्यों ?

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Faisal Anurag

सुप्रीम कोर्ट ने हेटस्पीच के खिलाफ सख्त रूख दिखाते हुए चुनाव आयोग को फटकार लगायी है.  चुनाव आयोग ने इस डांट के बाद ही हरकत में आकर अपनी गिरती हुई साख को बचाने का प्रयास किया है.

हालांकि अब भी चुनाव आयोग पर आरोप लग रहे हैं कि उसका कदम कम सख्त है और उसकी कार्रवाई के दायरे से अनेक प्रभावी लोग बाहर ही रखे जा रहे हें. प्रधानमंत्री मोदी को लेकर चुनाव आयोग की चुप्पी भी अब चर्चा में सरेआम है.

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चुनाव आयोग के अधिवक्ता को जबाव देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़ी टिप्पणी की है. किसी भी देश की किसी भी स्वतंत्र माने जाने वाले एजेंसी के लिए इस तरह की टिप्पणी बताती है कि उसके बारे में आमधारणा क्या बनती जा रही है. बेंच ने कहा कि यानी कि आप बुनियादी तौर पर कह रहे हैं कि आप शक्तिविहीन और दन्तविहीन है.

आयोग के अधिवक्ता बार-बारर यही तर्क दे रहे थे कि आयोग केवल नोटिस जारी कर सकता है और केवल एडवाइजरी ही जारी कर सकता है. इस पर चीफ जस्टिस गगोई ने कहा कि मुख्य आयोग की उपस्थिति में 30 मिनट में हम कदम उठा सकते हैं. अदालत ने यहां तक कहा कि मुख्य चुनाव आयोग को कोर्ट में सम्मन किया जाए क्या.

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आयोग के इतिहास में यह पहला अवसर है, जब हेट स्पीच के खिलाफ दायर याचिका की सुनवाई करते हुए अदालत ने इस तरह तल्खी बयान किया है. देश में हेट स्पीच को लेकर एक बड़ा तबका खासकर बेचैन है.

एक अनिवासी भारतीय ने रिट दायर करते हुए अदालत से मांग की है कि राजनीतिक दलों और नेताओं के खिलाफ हेटस्पीच को लेकर सख्त सजा दिया जाए. यह भी मांग की गयी है कि चुनाव आयोग और मीडिया की भूमिका को सुप्रीम कोर्ट के जज की निगरारी में रखा जाए.

जिस तरह धर्म  और जाति के सवाल पर नफरत पैदा की जा रही है, उसके प्रति चिंता जाहिर करते हुए मैं इसे रोकने और इसे फैलाने वालों के खिलाफ कड़ा कदम उठाते हुए सख्त सजा की मांग की गयी है. दुखद पहलू यह है कि चुनाव आयोग अपनी बेबसी का प्रश्न आयोग से कर रहा है. वह अपने संविधान प्रदत्त अधिकारों के इस्तेमाल के बजाय इस तरह के नफरती बयानों पर सख्त होने के लिए ठोस कदम उठाने से हिचक रहा है.

उसकी बेबसी और हिचकिचाहट का ही परिणाम है कि 2014 के बाद से हुए लगभग सभी चुनावों में नफरत फैलाने की प्रक्रिया बढ़ी ही है. खासकर धर्म विशेष के खिलाफ प्रधानमंत्री सहित अनेक सत्तारूढ़ नेता बयान देते रहे हैं.

प्रधानमंत्री ने तो उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के समय जिस तरह श्मसान बनाम कब्रिस्तान के प्रतीक के सहारे हेटस्पीच दिया था, वह अन्य नेताओं के लिए एक नजीर बन गया था.

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भारत में जेंडर के सवाल पर राजनीतिक मर्यादाहीन टिप्पणियों की लंबी दास्तान है. बंद कमरों में तो बेहद अश्लील बातें जो होती थीं अब वह मंचों तक भी पहुंच गयी हैं. महिलाओं का राजनीतिक इस्तेमाल करने की राजनीति में लगते ही रहे हैं. 2019 आते-आते बेशर्मी की सीमा ही खत्म हो गयी है और महिलाओं के प्रति अभद्रता चरम पर पहुंचता जा रहा है.

भारत की आधी आबादी की राजनीतिक स्वतंत्रता और भागीदारी बढ़ाने की बात करने वाले दलों में तो बेहद अगंभीर बातें होती हैं. संसद तक में परकटी महिलाओं की टिप्पणी की जा चुकी है. राजनीतिक मंचों से चुनाव अभियान के दौरान महिला विरोधी टिप्पणियां करने वाले नेताओं को उनके अपने ही दल में समान काम नहीं है.

बल्कि वे और ज्यादा प्रभावी होकर सामने आम हैं. पिछले कुछ सालों में बलात्कार की घटनाओं में देखा गया है कि इनमें से कई नेताओं ने किस तरह की बातें कर न केवल भुक्तभोगी के दर्द को  बताया है बल्कि महिलाओं के प्रति उनका नजरिया बेहद शर्मनाक रहा है.

भारत में वंचित समुदायों के बारे में भी जिस तरह की भाषा और शब्दों का प्रयोग किया जाता रहा है, वह किसी भी लोकतंत्र के लिए सह्य नहीं हो सकता. बावजूद इस तरह की बातें करने वालों का ओहदा कभी कम नहीं हुआ.

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एक बार राजनीतिक दलों ने इस तरह के नेताओं के खिलाफ कदम उठाने की छवि बनाने का प्रयास तो किया, लेकिन उनके भाई, उनकी पत्नियों को टिकट देकर और राजनहीतिक तुफान का माहौल कम होते ही फिर से उनकी वापसी बड़ा पद देकर किया जाता रहा है.

सवाल उठता है कि क्या इससे लोकतंत्र और संविधान के समानता की प्रतिबद्धता को नजरअंदाज नहीं किया जाता है. कुलमिलाकार लोकतंत्र की प्रक्रिया इस तरह के वर्चस्ववादी और सामंती प्रवृति के मजबूत नहीं हो पाती और समाज के बड़े वर्ग की लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की भागीदारी को इससे प्रभावित करने का प्रयास किया जाता है.

सुप्रीम कोर्ट इस मामले में भी सचेत है. आयोग को एक क्रियाशील भूमिका निभाते हुए भागीदारी और सम्मान को ठेस पहंचाने वाली राजनीतिक प्रवृति पर कड़ा अंकुश लगाना चाहिए. यह वक्त की मांग है.

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