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आखिर मोदी सरकार क्यों नहीं चाहती कि जेपीसी का गठन हो ?

राफेल डील पर SC के फैसले के बाद भी भाजपा–कांग्रेस की रार नहीं थमी है. संसद का शीतकालीन सत्र 11 दिसंबर से शुरू हो गया है . लेकिन दोनों सदनों में सुचारू रूप से कामकाज होने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं.

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NewDelhi : राफेल डील पर SC के फैसले के बाद भी भाजपा–कांग्रेस की रार नहीं थमी है. संसद का शीतकालीन सत्र 11 दिसंबर से शुरू हो गया है . लेकिन दोनों सदनों में सुचारू रूप से कामकाज होने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं. राफेल डील पर जिच कायम है. कांग्रेस के नेतृत़्व में पूरा विपक्ष मोदी सरकार से राफेल डील को लेकर जॉइंट पार्लियामेंट कमेटी (जेपीसी) के गठन की मांग कर रहा है. लेकिन सरकार तैयार नहीं है. वैसे केंद्र सरकार शुरू से कह रही है कि वह राफेल पर दोनों सदनों में चर्चा के लिए तैयार है. बता दें कि जेपीसी के पास असीमित अधिकार होते हैं.  राफेल डील मामला सीधे प्रधानमंत्री से जुड़ा हुआ है.  ऐसे में यदि जेपीसी बनाई गयी तो पीएम मोदी से भी सवाल हो सकता है.  इसीलिए सरकार जेपीसी के गठन से बच रही है.   बता दें कि SC ने शुक्रवार को राफेल डील पर फैसला सुनाते हुए सरकार को सभी आरोपों से बरी कर दिया. लेकन फैसले के बाद देर शाम कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दोबारा जेपीसी के गठन की मांग की है. विपक्षी दल सवाल उठा रहे हैं कि आखिर  सरकार जेपीसी का गठन करना क्यों नहीं करना चाहती है

70 साल के संसदीय इतिहास में जेपीसी का गठन आठ बार हुआ है

जहां तक जेपीसी के गठन की बात है तो जान लें कि देश के 70 साल के संसदीय इतिहास में जेपीसी का गठन आठ बार किया गया है. दिलचस्प बात है कि इसके बाद पांच बार सत्तारूढ़ दल अगला आम चुनाव हार गया था. इस क्रम में 1987 में सबसे पहले राजीव गांधी सरकार ने बोफोर्स तोप खरीद मामले में जेपीसी का गठन किया था.  लेकिन 1989 में कांग्रेस आम चुनाव हार गयी थी.  इसके बाद 1992 में पीवी नरसिम्हाराव सरकार ने सुरक्षा एवं बैंकिंग लेन-देन में अनियमितता मामले में जेपीसी का गठन किया.  हुआ क़्या. 1996 में हुए आम चुनाव में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गयी. एक कार्यकाल में सबसे ज्यादा दो बार जेपीसी का गठन पिछली मनमोहन सिंह और मौजूदा मोदी सरकार में हुआ है . 2003 में वाजपेयी सरकार ने भी जेपीसी का गठन किया था. मोदी सरकार में 2015 में भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास बिल  और 2016 एनआरसी पर जेपीसी का गठन हुआ लेकिन नतीजा नहीं निकला. इससे पहले 2011 में  2जी स्पेक्ट्रम घोटाला       और 2013     में वीवीआईपी चॉपर घोटाला पर जेपीसी का गठन हुआ. इसके बाद    2014 में कांग्रेस चुनाव हार गयी.

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समिति ऐसे किसी भी व्यक्ति पूछताछ कर सकती है, जिसको ले‍कर गठन हुआ है

जेपीसी में दोनों सदनों के सदस्य शामिल होते हैं. बता दें कि जेपीसी का गठन सरकार बेहद गंभीर मामलों में ही करती है.  समिति ऐसे किसी भी व्यक्ति, संस्था से पूछताछ कर सकती है, जिसको ले‍कर उसका गठन हुआ है .  यदि वह जेपीसी के समक्ष पेश नहीं होता है तो यह संसद की अवमानना मानी जाती है .  जेपीसी संबंधित मामले में लिखित, मौखिक जवाब या फिर दोनों मांग सकती है .  लोकसभा के पूर्व महासचिव व संविधान विशेषज्ञ पीडीटी आचारी के अनुसार  कमेटी में अधिकतम 30-31 सदस्यों की नियुक्ति होती है .  समिति का चेयरमैन बहुमत वाली पार्टी के सदस्य को बनाया जाता है .  समिति में शामिल सदस्यों में बहुमत वाले राजनीतिक दल के सदस्यों की संख्या भी अधिक होती है .  समिति के पास मामले की जांच के लिए अधिकतम समय सीमा 3 महीने होती है .  इसके बाद उसे अपनी रिपोर्ट संसद के समक्ष पेश करनी होती है. जेपीसी में फैसला बहुमत से होता है.  समिति में सबसे ज्यादा लोग सत्तारूढ़ पार्टी के होते हैं.  ऐसे में अक्सर निर्णय सरकार के पक्ष में ही आता है

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