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उसकी मौत पर कोई क्यों नहीं रोया, आखिर क्यों ?

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Dhanbad : वह कौन था ?…आजाद भारत का नागरिक. पता ?, नहीं मालूम. कहां से आया था ?…नहीं मालूम. कहां जाना था ? नहीं मालूम. बताया गया कि वह आजाद भारत का नागरिक था. यह किसी की जान माल की हिफाजत की गारंटी नहीं है ? वह गरीब था. उसके जान माल की हिफाजत के लिए कोई सरकारी योजना नहीं थी ?  गरीबों के कल्याण की करोड़ों अरबों की घोषणा और अब आयुष्मान भारत योजना पर बड़े बड़े भाषण और दावों का मजाक उड़ाता वह झरिया के फुटपाथ पर उसने दम तोड़ दिया.

वह फुटपाथ पर ही सोता था. शहर के कूड़ादान से उसे जीवन दायनी शक्ति मिलती थी. सड़क के कुत्ते के साथ मिल बांटकर खाता था. यहीं तन ढंकने के लिए कभी उसे कपड़े भी मिल जाते. कभी खाली बदन ही कड़कड़ाती ठंड में जीता था. पता नहीं क्यों? कभी किसी के फेंके कंबल तो किसी के दिए गर्म कपड़ों के एहसान तले जीता था. पता नहीं क्यों? वह भारत के विकास के तमाम दावों की खिल्ली उड़ाता था? वह खुद कुछ बोलता नहीं था पर उसके जिंदा रहने और मैले…कुचैले कपड़े से सने होने से सरकार के गरीबों के विकास के दावों की खिल्ली स्वतः उड़ती.

संवेदनशील प्रशासन, यहां के डीसी, बीडीओ साहब की उपलब्धियों में वह शुमार नहीं था ? वह मर गया. भारत का वह गरीब लावारिस करार दिया गया. वह अपाहिज भी था. यहां तक कि लोग हाथ फैला कर मांगने पर भी उसे गालियां ही देते थे. यह व्यथा है गुरुवार को झरिया के लक्ष्मनिया मोड़ के पास मरे एक वृद्ध की. बुधवार रात को सड़क किनारे फुटपाथ पर सोया था. सबेरे उठा नहीं. मानवता को शर्मसार करनेवाली बात हुई कि कई घंटे तक मृत पड़े शरीर को किसी ने ढंका तक नहीं. उसके शरीर पर मक्खियां भिनभिना रही थी. किसी तरह झरिया थाना को इसकी जानकारी मिली. तब उसका पता लगाने में पुलिस लग गई और अन्तिम संस्कार के लिये नगर निगम और अन्य लोगों से सम्पर्क करने में लगी.

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