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करीम सिटी मास कॉम के छात्र रहे निखिल के इस काव्य संग्रह पर मैत्रेयी पुष्पा ने क्यों लिखा लंबा पोस्ट, आप भी पढ़िए

Sanjay Prasad : करीम सिटी कॉलेज मास कॉम के छात्र रहे निखिल आनंद गिरि के नये काव्य संग्रह- इस कविता में प्रेमिका भी आनी थी.. देश भर में प्रशंसा बटोर रही है. नई किताब प्रकाशन की ओर से प्रकाशित इस पुस्तक के बारे में मशहूर साहित्यकार मैत्रेयी पुष्पा ने फेसबुक पर लंबा पोस्ट लिख इस काव्य संग्रह के लिए निखिल को बधाई दी है. लिखती हैं-लेखन में आने से पहले मैं कविता के सिवा कुछ पढ़ना ही नहीं चाहती थी. शायद इसलिए कि तब कविता आज की तरह नहीं थी. आजकल कविता में काव्य कितना होता है यह मेरी समझ के बाहर है. इसके बावजूद मैं तुम्हारी कविताएं देखना चाहती थी. माना कि कविता इसी तरह लिखी गयी होगी जैसे कि आजकल लिखी जा रही है.

तीस की उम्र
आज तुम्हारी किताब पढ़ने के लिए उठाई. नाम ने भी आकर्षित किया ‘ प्रेमिका ‘ किताब जहां से खुल गई, कविता का शीर्षक था ‘ तीस की उम्र ‘ और मैं उस उम्र पर ठहर गई-
चांद तक जाती हुई एक सीढ़ी
टूट जाती है शायद
टूट जाते हैं सब संवाद चांद जैसी धवल प्रेमिकाओं से
तीस साल की उम्र तक आते आते
अकेले कमरे में सिर्फ़ सिगरेट ही नहीं जलती
पुरानी उम्र जलती है कमरे में
भूख जलती है पेट में
बिस्तर पर
यादें जलती हैं
ज़िंदगी जलकर सोना हो जाती है
तीस की उम्र तक आते आते…

यहां एक युवक की आत्मा की छटपटाहट है, भयानक बेचैनी है जो वह किसी से नहीं अपनी कविता से बांट रहा है. क्या यह उस अकेले की ज़िंदगी जलने लगी है कि आज की युवा पीढ़ी इसी जलन के हवाले है ? निखिल की सोच विस्तार लेती है निरन्तर आगे बढ़ती है. क्या आज का युवक कुंठित नहीं रहना चाहता ? वह जल्दी से जल्दी इस जलती हुयी मन: स्थिति से निजात पाना चाहता है .

लौटना
’लौटना ‘ कविता अपनी कहन के साथ उम्मीद के रास्ते बढ़ती है. हताशा के सन्नाटों को चीरती हुई अपनी ही आवाज़ मन में कौंध जाती है –
“ किसी अनमने दोपहर की
लम्बी चुप से निकली कई कई आवाज़ें
अंतरिक्ष से टकराकर लौट आती हैं
सपनों के प्रदेश में प्रवेश कर जाती हैं चुपके से
ऐसे ही लौटना है एक दिन
जैसे लौटता है पल्टू महतो
हर तीन फ़ीट की खुदाई के बाद
बहुत सारी साँसें लेकर
एक कश बीड़ी के लिए
इस कवि को पढ़ते हुए जहां निराशा घिर आती है और अंधेरा घेरने लगता है , हम चारों ओर उजला देखने के लिए नज़रें घुमाते हैं कि आँखों में रौशनी के सितारे और लौटने लगती है पृथ्वी अपनी धुरी पर ! और फिर अबूझ सी उपमा :
देखना हम लौटेंगे एक दिन
उन पवित्र दोपहरों में
तीन दिन से लापता हुई
अचानक लौट आई बकरी की तरह

निखिल ने किताब को प्रेमिका नाम देकर समझा दिया है कि प्रेमिका किसी भी रूप में किसी भी उम्र में और पृथ्वी के किसी कोने में प्रेम करने के लिये जन्म लेती है और उसका वियोग ही पुरुष का सबसे बड़ा दुख है. बहरहाल यह पुस्तक पढ़ने के बाद सहेजने के लिये है कि बार बार पढ़ी जा सके.

फिलहाल दिल्ली मेट्रो रेल में काम कर रहे

फिलहाल दिल्ली मेट्रो रेल के कारपोरेट कम्युनिकेशन में काम करने वाले निखिल ने करीम सिटी से मास कॉम करने के बाद जामिया मिलिया इस्मालिया से एमए एन मास कम्युनिकेशन कोर्स किया. वे जी न्यूज, नेशनल जियोग्राफिक और हिस्ट्री चैनल में भी काम कर चुके हैं. निखिल को साहित्य के लिए कई पुरस्कार भी मिले हैं और वे दिल्ली के मुख्यधारा के साहित्यकारों के साथ कवि सम्मेलनों में भाग ले चुके हैं.

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