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भाजपा की हार पर कड़िया मुंडा ने क्यों कही आदिवासियों के नेतृत्व वाली बात?

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Md. Asghar Khan

Ranchi: झारखंड विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार के कई कारण गिनाये जा रहे हैं. मुख्यमंत्री के तौर पर रघुवर दास की अहंकारी छवि, पार्टी के अंदरखाने की नाराजगी, सहयोगियों को साथ नहीं लेना. आखिरी दो सालों में राज्य में हुई मॉब लिंचिंग, भुखमरी से हुई मौत तो शुरूआती दो साल में सरकार के कुछ फैसले. जैसे आदिवासियों की जमीन से संबंधित सीएनटी-एसपीटी एक्ट और भूमि-अधिग्रहण बिल में संशोधन की कोशिश.

ये वो प्रमुख कारण हैं, जिन्हें टीवी न्यूज चैनलों और अखबारों में चुनावी विश्लेषक हार की बड़ी वजहों के तौर पर बता रहे हैं. लेकिन सीटों के समीकरण को समझने पर ऐसा लगता है कि सीएम के लिए पर भाजपा की तरफ से गैर-आदिवासी चेहरा प्रोजेक्ट करना सत्ता गंवाने की सबसे बड़ी वजह हो सकती है.

दरअसल 81 विधानसभा सीटों वाला झारखंड 19 साल देख चुका है. 15 सालों तक भाजपा गठबंधन ने झारखंड में राज किया. इस दौरान राज्य को एक निर्दलीय समेत 10 मुख्यमंत्री मिले और तीन बार राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा.

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राज्य गठन के बाद अस्थिर सरकार ही रही

झारखंड के गठन के बाद नवंबर 2004 से मार्च 2005 तक सूबे में स्थिर सरकार तो रही, लेकिन बाद में अस्थिरता का सिलसिला 2014 तक चला. फिर 2014 में पहला मौका आया, जब राज्य को फिर स्थिर सरकार मिली. पूर्ण बहुमत(42) वाली झारखंड सरकार में भाजपा का ही पांच सालों तक मुख्यमंत्री भी रहा.

सूबे में चौथी विधानसभा के परिणाम आ गये, और सत्ता परिवर्तन के नये मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने 29 दिसंबर 2019 को शपथ ले ली. अब नया साल है 2020 और राज्य में सत्ता एनडीए से यूपीए गठजोड़ के पास है. पर सवाल सत्ता के परिवर्तन को लेकर है.

क्यों और कैसे हुए, के कई कारण बताए जा रहे हैं. उन्हीं में से एक गैर-आदिवासी को सीएम का चेहरा पेश करना भी बताया जा रहा है. इसे समझने के लिए सीटों के समीकरण से पहले थोड़ा झारखंड की भौगोलिक रुपरेखा को समझना पड़ेगा.

नहीं हुआ अपेक्षाकृत विकास

न्यूज विंग के वरिष्ठ संपादक फैसल अनुराग कहते हैं कि, “झारखंड पहला ऐसा राज्य था, जो आदिवासियों के हित और कल्याण के लिए लंबा संघर्ष के बाद बना. ऐसा लगा था कि इनका तेजी से विकास होगा. इन्हें मुख्यधारा से जोड़ा जाएगा. लेकिन 19 साल बीतने के बाद भी अपेक्षाकृत बदलाव नहीं हुआ.”

 

झारखंड एक आदिवासी बहुल्य राज्य है. 2011 की जनगणना के मुताबिक, झारखंड में आदिवासियों की आबादी 26 प्रतिशत है. राज्य की कुल आबादी 3.5 करोड़ का करीबन ये 86 लाख हैं. आदिवासियों की कुल आबादी का लगभग 80 फीसदी लोग गांव में ही बसते हैं.

अब आते हैं सीट पर. झारखंड बनने के बाद अबतक राज्य ने चार-चार विधानसभा-लोकसभा चुनाव देखें हैं. 2014 तक भाजपा ने तीन बार घोषित तो नहीं लेकिन संभावित अर्जुन मुंडा के नाम पर ही तीन विधानसभा चुनाव लड़ा.

इधर झामुमो से दो बार शिबू सोरेने और एक बार हेमंत सोरेन के नाम पर चुनाव लड़ा. इस बीच कांग्रेस और झाविमो का चेहरा आदिवासी ही रहा.

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2014 का परिणाम था ऐतिहासिक

2014 के विधानसभा चुनाव परिणाम को ऐतिहासिक उलेटफेर के रुप में भी देखा जाता है. चार पूर्व मुख्यमंत्री चुनाव हारे और एक उप मुख्यमंत्री. झाविमो सुप्रीमो बाबूलाल मरांडी राजधनवार और गिरिडीह दोनों ही सीट से हार गये.

इसी तरह दो सीट से चुनाव लड़ें झामुमो के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन दुमका सीट से हार गये. मधु कोड़ा मंझगांव से हारे तो डिप्टी सीएम रहे सुदेश महतो सिल्ली से हारे. एक हार और हुई. मोदी लहर में भाजपा के दिग्गज नेता और तब के संभावित मुख्यमंत्री का चेहरा अर्जुन मुंडा खरसांवा से हार गये.

इस चुनाव में भाजपा गठबंधन को पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ. कई आदिवासी विधायकों के जीतने के बावजूद पार्टी में दूसरे नंबर के नेता और पिछली भाजपा सरकार में डिप्टी सीएम रहे रघुवर दास को राज्य का मुख्यमंत्री बनाया गया.

इसके साथ ही झारखंड को नौ आदिवासी मुख्यमंत्री के बाद पहला गैर-आदिवासी सीएम मिला. नतीजा राज्य में गैर-आदिवासी सीएम का मुद्दा छिट-पुट विरोध प्रदर्शन में दब गया. मगर पार्टी के अंदरखाने यह बात कार्यकर्ताओं में घर करती गयी. इधर विपक्ष भी आदिवासियों के बीच इस बात का प्रचार-प्रसार करता रहा.

गैर-आदिवासी चेहरा पड़ा भारी? 

गैर-आदिवासी सीएम का मुद्दा चुनाव में कितना असरदार रहा, इसे समझने के लिए आठ बार लोकसभा चुनाव जीते चुके, तीन बार केंद्रीय मंत्री बने, लोकसभा उपाध्यक्ष रहे 83 साल के भाजपा नेता और पद्मभूषण से सम्मानित कड़िया मुंडा से बात की.

 

सीएम के लिए गैर-आदिवासी चेहरा सामने करना भी हार की बड़ी वजह है?

इसपर भाजपा के पूर्व सांसद कड़िया मुंडा घुमाकर जवाब दिया. उनका कहना है कि,“हमलोग पार्टी से बंधे हुए हैं. पार्टी के अंदर जबतक यह चर्चा नहीं हो जाती है कि बीजेपी से आदिवासियों की दूरी बनाने का क्या कारण है, कहना ठीक नहीं है.

साथ ही कहा, सबको साथ लेकर चलने की मानसिकता होनी चाहिए. जब इसमें कमी आएगी तो जैसा परिणाम हमलोग भोगे हैं उसे भोगना होगा. अलग प्रांत के लिए जितनी भी लड़ाई लड़ी गयी है, उसका नेतृत्व आदिवासियों ने ही किया है.”

 

कड़िया मुंडा ने इससे आगे थोड़ा खुलते हुए कहा कि, “सरकार में आदिवासियों और मूलवासियों को प्राथामिकता नहीं दी गयी. बिना समझे-बुझे सीएनटी-एसपीटी एक्ट में संशोधन पर काम शुरू किया गया. हालांकि बाद में इसे वापस भी लिया गया, लेकिन वापस लेने वाली बात बड़ा फैक्टर नहीं है.

बड़ा फैक्टर है, आपकी मानसिकता में इस कानून को बदलना था. स्थानीय नीति जो बनायी गयी, उससे भी आदिवासी-मूलवासी दोनों के लिए ही खतरा.

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दो सीटों पर क्यों सिमटी भाजपा?

गैर-आदिवासी मुख्यमंत्री वाले सवाल को तब और बल मिल जाता है, जब 2019 के विधानसभा चुनाव के परिणाम को देखें. 81 में से आदिवासियों के लिए आरक्षित 28 सीटों में से मात्र दो सीटों पर भाजपा सिमट गयी.

जबकि इससे पहले 2005 में भाजपा ने 09 सीटें जीती थीं. झामुमो ने भी 09 सीटें जीतीं. वहीं कांग्रेस ने 03, बाकि अन्य दलों ने जीतें. 2009 में भी मामला लगभग बराबरी पर रहा. जेएमएम 10 बीजेपी ने 09 सीटें जीतीं.

जबकि कांग्रेस ने दो बाकि अन्य दलों के खाते में गयीं. 2014 में भाजपा गठबंधन को पूर्ण बहुमत मिला. इस बार भी उसने एसटी सीटों पर अपनी बराबरी बनाये रखा. जेएमएम 13 और भाजपा को 11 सीटें मिलीं.

जबकि इस बार कांग्रेस को एक भी सीट भी नहीं मिली. बाकि के अन्य दलों ने जीती. लेकिन 2019 के विधानसभा चुनाव में आदिवासी सुरक्षित सीटों ने भाजपा का खेल बिगाड़ दिया. भाजपा मात्र दो सीटें ही जीत पायी.

जबकि झामुमो ने इस बार सबसे अधिक 19 सीटें जीतीं. वहीं कांग्रेस का भी आदिवासी सुरक्षित सीट पर अबतक का सबसे अच्छा प्रदर्शन रहा और उसके खाते में 06 सीटें आयीं.

 

न्यूज विंग वरिष्ठ संपादक फैसल अनुराग कहते हैं कि, “हार के कई फैक्टर में गैर-आदिवासी सीएम भी एक प्रमुख फैक्टर हैं. पांच साल में झारखंड में आदिवासियों को लेकर सरकार चिंतित नहीं दिखी. नीतियां आदिवासी विरोधी रहीं. चाहे वो जंगल पर वनाधिकार का मुद्दा हो, या फिर सीएनटी-एसपीटी एक्ट के संशोधन का मामला.”

फैसल अनुराग आगे कहते हैं, “इस सरकार में कॉरपोरेट को निवेश के लिए तेजी से आमंत्रित करना भी रघुवर सरकार को उल्टा पड़ गया. आदिवासियों को लगने लगा कि ये हमें जल, जंगल और जमीन से बेदखल कर देगा.

उपर से विधानसभा चुनाव में सीएम के लिए आदिवासी चेहरा ना देकर, घर-घर रघुवर का नारा भी आदिवासियों में गैर-आदिवासी मुख्यमंत्री के तौर पर देखा गया. मेरा मानना है कि आदिवासियों के बीच यूपीए गठबंधन ने हेमंत सोरेन को बतौर सीएम चेहरा प्रोजेक्ट कर इस गैप को भरा है.

नतीजों में 81 सीटों वाली विधानसभा में यूपीए गठबंधन (झामुमो 30, कांग्रेस 16, राजद 01) को 47 सीटें मिलीं. भाजपा को 25 सीट, झाविमो और आजसू ने 3-2 सीटें जीतीं. झारखंड में बहुमत के लिए 41 सीट चाहिए.

हालांकि भाजपा का पिछले चुनाव की तुलना में 2 प्रतिशत वोट बढ़ा है, लेकिन सीटें 12 घटी हैं. भाजपा 33.04, झामुमो 18.7, कांग्रेस 13.9, आजसू, 8.1, झाविमो 4.5, राजद 2.7 और अन्य को 18.7 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए.

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