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सेक्युलरिज्म पर अरण्य रोदन क्यों

Baijnath Mishra

जब भी चुनाव आते हैं, या कोई विशेष राजनीतिक घटना विकास होता है, सेक्युलरिज्म पर अरण्य रोदन शुरू हो जाता है. अभी देश के 5 राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव हो रहे हैं. इन सभी राज्यों में अल्पसंख्यक मतदाताओं की संख्या अच्छी खासी है. इसलिए मजहबी गोलबंदी ठाठें मार रही हैं.

सबसे दिलचस्प नजारा बंगाल में है. वहां जियारत और सियासत का भेद खत्म हो गया है. कभी जामा मस्जिद के इमाम सैयद अब्दुल्लाह बुखारी किसी दल विशेष को वोट देने का फतवा जारी किया करते थे. लेकिन बंगाल में तो फुरफुरा दरगाह के पीरजादा अब्बास सिद्दिकी बाकायदा एक पार्टी आइएसएफ बना कर सेक्युलर राजनीति को परवान चढ़ा रहे हैं.

पहले यह सिद्दिकी परिवार टीएमसी के साथ था, लेकिन इस बार सेक्युलरिज्म की सोल एजेंसी चलानेवाली कांग्रेस तथा वामपंथी पार्टियों के साथ है. इससे ममता बनर्जी को परेशानी तो है, लेकिन वह भी खांटी सेक्युलरिस्ट हैं इसलिए पीरजादा के खिलाफ कुछ खास नहीं बोल रही हैं.

उनके साथ भी जमातवाले पूरी शिद्दत से लगे हैं. भाजपा वाले भी बिफरे हुए हैं लेकिन वे अंदर से खुश हैं क्योंकि सेक्युलर वोटों का बिखराव उनके हक में है. वे समानांतर गोलबंदी की तैयारी कर रहे हैं.

अलबत्ता कांग्रेस में आजकल असंतुष्ट चल रहे दो दर्जन नामी नेताओं में से एक आनंद शर्मा ने पीरजादा की पार्टी के साथ कांग्रेस के गठबंधन पर सवाल उठाया है. उनका कहना है कि यह गांधी-नेहरू की विरासत और कांग्रेस की विचारधारा के खिलाफ है.

इस पर बंगाल कांग्रेस के मुखिया अधीर रंजन चौधरी का कहना है कि आनंद शर्मा अपने भावी बॉस (यानी नरेंद्र मोदी) को खुश करने के लिए पीरजादा के आइएसएफ (इंडियन सेक्युलर फ्रंट) से गठबंधन का विरोध कर रहे हैं, जबकि गठबंधन का फैसला सोनिया जी का है. इसके विपरीत महान अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी का कहना है कि कांग्रेस का आइएसएफ से कोई समझौता नहीं हुआ है.

कांग्रेस का समझौता वाममोर्चा के साथ है और वाममोर्चा ने आइएसएफ से हाथ मिला लिया है लेकिन सिंघवी साहब ने यह साफ नहीं किया कि साझा रैली में कांग्रेस नेता पीरजादा के साथ मंच पर क्यों थे और सीटों के बंटवारे पर उसके साथ बात क्यों कर रहे हैं. इसी को कहते हैं ‘ऐसी क्या बेबसी चिलमन से लगे बैठे हो, साफ छुपाते भी नहीं, सामने आते भी नहीं.’

खैर अब आते हैं आइएसएफ और कांग्रेस गठजोड़ के बारे में आनंद शर्मा के बयान पर. आनंद शर्मा घुटे हुए पढ़े-लिखे पुराने कांग्रेसी हैं. इसलिए वह इतना जरूर जानते होंगे कि कांग्रेस सांप्रदायिक ताकतों की पुरानी इश्कबाज है.

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यदि ऐसा नहीं है तो क्या वह और उन जैसे कांग्रेसी यह बताने का कष्ट करेंगे कि केरल में मुस्लिम लीग, ईसाइयों की केरल से कांग्रेस का समझौता नेहरू काल से लेकर आज तक क्यों जारी है? अब तो कांग्रेस के इस सेक्युलर मुकुट में पीएफआइ की फ्रंटल जमात के भी पंख लग गये हैं.

असदुद्दीन ओवैसी की सेक्युलर पार्टी 2013 से पहले करीब डेढ़ दशक तक कांग्रेस के साथ थी और कांग्रेस की सेक्युलर छवि को चटक बना रही थी. वह अलग हुई तो सिर्फ सीट शेयरिंग के सवाल पर, लेकिन आजकल सभी भाजपा विरोधी दल ओवैसी को भाजपा का मददगार और संप्रदायिक बताने में लगे हैं. ओवैसी जबसे हैदराबाद से बाहर पांव पसारने लगे हैं, तमाम सेक्युलरिस्टों के होश फाख्ता हो गये हैं.

तमिलनाडु में भी कांग्रेस-डीएमके अलायंस के साथ कम्युनिस्ट भी हैं और मुस्लिम लीग भी. असम का नजारा और भी मजेदार है. वहां कांग्रेस ने बदरुद्दीन अजमल की पार्टी एआइयूडीएफ, भाकपा, माकपा, माले और एक स्थानीय दल के साथ मिल कर भाजपा के खिलाफ एक महाजोड़ बनाया है.

पिछली बार बदरुद्दीन कांग्रेस से बिदक गये थे और कांग्रेस बुरी तरह हार गयी थी, क्योंकि तब वह सेक्युलर नहीं रह गयी थी. यह बदरूद्दीन साहब शरिया कानूनों तथा तीन तलाक के हिमायती हैं, मुसलमानों से जनसंख्या बढ़ाने की सार्वजनिक अपील करते हैं, घुसपैठियों के संरक्षक हैं और हवाला रैकेट चलाने के आरोपी हैं.

एनआइए इनकी करतूतों की जांच कर रही है. इनके बारे में भी आनंद शर्मा ने कुछ नहीं बोला. उन्होंने सिर्फ पीरजादा अब्बास सिद्दीकी से समझौते पर नाराजगी व्यक्त की है.

सही है कि यह पीरजादा सार्वजनिक रूप से 40-50 करोड़ भारतीयों की मौत की दुआएं करता है और गंदी से गंदी भाषा का इस्तेमाल करने से गुरेज नहीं करता है.

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लेकिन शर्मा जी नरेंद्र मोदी को बोटी-बोटी काटने की धमकी देने वाले सहारनपुर (यूपी) के सेक्युलर नेता इमरान को जब कांग्रेस ने गले लगाया तब आवाज क्यों नहीं निकली. दरअसल शर्मा जी को यह अहसास हो गया है कि कांग्रेस आलाकमान उनकी राज्यसभा की सीट अगली बार कन्फर्म करने के मूड में नहीं है. आजाद साहब की पैंतरेबाजी का भी यही कारण है.

सिंघल जी को शायद लालू जी का सहयोग मिल जाये, लेकिन ये सभी महानुभाव कांग्रेस के उस हर जुर्म में शरीक रहे हैं, जिससे लोकतंत्र शर्मसार हुआ है और सेक्युलरिज्म सिर्फ नारा बन कर रह गया है.

आनंद शर्मा जैसे कांग्रेसियों को यह तथ्य ठीक से समझ लेना चाहिए कि सेक्युलरिज्म की एजेंसी कांग्रेस के हाथ से निकल गयी है. बिहार में लालू प्रसाद ने लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार कर सेक्युलरिस्ट होने का प्रमाण देकर सीएनएफ ले लिया तो मुलायम सिंह यादव ने कारसेवकों पर गोलियां चलवा कर मुल्ला की पदवी हासिल कर ली. झारखंड में कांग्रेस का सेक्युलरिज्म झामुमो के सहयोग पर टिका है.

मध्य प्रदेश में जरूर कांग्रेस के आत्मघाती दस्ते के लेफ्टिनेंट दिग्विजय सिंह ने सेक्युलरिस्टों को संभाल रखा है, लेकिन वे जब भी बोलते हैं, कांग्रेस का कुछ न कुछ नुकसान ही करते हैं. गुजरात में ओवैसी के सेक्युलरिज्म के आगे कांग्रेस बेबस लग रही है और ऊपर से आप की थाप से और निढाल हो गयी है.

उत्तर पूर्व में कांग्रेस मार्का सेक्युलरिज्म जरूर अभी छिटका नहीं है, लेकिन उसका बंदोबस्त ठीक नहीं है. महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ जाकर कांग्रेस ने ओवैसी को मौका दे दिया है. पंजाब, हिमाचल, उत्तराखंड में सेक्युलरिज्म कोई मुद्दा ही नहीं है.

हरियाणा में है भी तो अरविंद केजरीवाल अपनी गोटी बिछाने में लगे हैं और दीपेंद्र हुड्डा के बिदकने से यदि कांग्रेस का आधार ही डिग गया तो फिर कांग्रेस की रंगत के क्या कहने. राजस्थान का सेक्युलरिज्म अलग ढंग का है और अभी तक यह कांग्रेस के साथ है.

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दरअसल जबसे इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी के दौरान लोकतंत्र को हवा में टांग कर संविधान की उद्देशिका में सेक्युलरिज्म और समाजवाद शब्द छोड़ दिया, उसके बाद से इन दोनों शब्दों की व्यावहारिक इतिश्री हो गयी.

इमरजेंसी के पहले भी यह देश सेक्युलर था और आज भी है. सेक्युलरिज्म भारत की परंपरा में निहित है. इसलिए संविधान निर्माताओं ने अलग से सेक्युलर शब्द लिखना जरूरी नहीं समझा लेकिन वोट के मदारियों ने क्षुद्र स्वार्थों की पूर्ति के लिए तुष्टीकरण को सेक्युलरिज्म का पर्याय बना दिया.

देश के संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों के होने की हांक लगायी जाने लगी और कोर्ट के फैसले बदले जाने लगे, तब सेक्युलरिज्म के चीथड़े उड़ने लगे. यही कारण है कि कांग्रेस धीरे-धीरे अल्पसंख्यक पार्टी होने की ओर अग्रसर है.

वह अपनी ही गलतियों से एक ऐसे जाल में फंस गयी है जहां से निकलने के लिए वह जितना छटपटाती है, तरह तरह के समझौते करती है, बदरुद्दीन और पीरजादाओं जैसों से हाथ मिलाती है और फंसती जाती है. कांग्रेस अपने इतिहास में इतनी दुर्दशाग्रस्त, किंकर्तव्यविमूढ़, निहत्था कभी नहीं थी. देश के अधिकतर राज्यों में पिछलग्गू बन गयी है.

उसे अपनी अस्तित्व रक्षा की चिंता सता रही है और इसलिए वह अविवेकी समझौते करने को मजबूर है. इसलिए आनंद शर्मा जी सेक्युलरिज्म, नैतिकता वगैरह पर अरण्य रोदन बंद कीजिए. अब कांग्रेस के वे दिन हवा हुए, जब पसीना गुलाब था.

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