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आईएलएंडएफएस के डूबने की जिम्मेदारी आखिरकार किसकी है ?

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Girish Malviye

आईएलएंडएफएस एक विशालकाय वित्तीय कंपनी है जो बुनियादी संरचना के निर्माण के लिए बड़े ऋण देती है. मार्च की 31 तारीख को आइएलऐंडएफएस में लाइफ इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया की 25.34 फीसदी हिस्सेदारी थी, जबकि ओरिक्स कॉर्पोरेशन की 23.54 फीसदी. बाकी बड़े शेयरधारकों में अबू धाबी इन्वेस्टमेंट अथॉरिटी (12.56 फीसदी), हाउसिंग डेवलपमेंट फाइनेंस कॉर्पोरेशन लि. (9.02 फीसदी), सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया (7.67 फीसदी) और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (6.42 फीसदी) शामिल थे.

कल खबर आई है कि आईएलएंडएफएस समूह के ऑडिट का काम कर चुकी कंपनी डिलॉयट, हैसकिन्स एंड सेल्स को समूह में ऋणदाताओं के साथ की जा रही धोखाधड़ी की जानकारी थी. डेलॉयट ने आईएलएंडएफएस फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड (आईएफआईएन) की 10 सालों तक लेखा-परीक्षा की और 2018 तक उसका लेखापरीक्षक बना रहा. यहां तक कि 2017-18 की लेखा परीक्षा रिपोर्ट के नतीजों में भी कोई गड़बड़ी नहीं दिखाई गई.
मामले की जाँच कर रही सरकारी एजेंसी एसएफआईओ ने पाया कि ऑडिटर धोखाधड़ी में न सिर्फ शीर्ष प्रबंधन के साथ मिले हुए थे, बल्कि उन्होंने अपने कुछ उत्पाद एवं सेवाओं को भी बेचने की कोशिश की थी, अधिकारियों के अनुसार ईमेल समेत अन्य स्रोतों से जुटायी गयी जानकारियों से यह पता चला है कि 2017 की शुरुआत में एक व्हिसलब्लोअर ने शिकायत की थी. ऑडिट समिति को इसके बाद कंपनी की सतर्कता व्यवस्था पर नजर करने की जरूरत थी, लेकिन इसके बावजूद वे शिकायत पर उचित तरीके से कदम उठाने में असफल रहे.
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वित्त वर्ष 2013-14 में कंपनी का कर्ज 48672 करोड़ रुपए था, लेकिन प्रोजेक्ट फंसने से लागत बढ़ी तो कम्पनी शॉर्ट टर्म लोन लेती रही नतीजा यह हुआ कि कर्ज 49 हजार करोड़ से बढ़कर 91 हजार करोड़ हो गया, अब पता चल रहा है कि मोदीराज के पिछले पांच सालो में इस रकम में बहुत बड़े घोटालों को अंजाम दिया गया तो आखिरकार इसकी जिम्मेदारी किसकी बनती है?
आर्थिक मामलों के बहुत बड़े जानकार भरत झुनझुनवाला बताते हैं कि “आईएलएफएस मूलतः सरकारी कंपनी है. इसके 25 प्रतिशत शेयर लाइफ इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन के हाथ में हैं और 6 प्रतिशत स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया के हाथ में. ये दोनों कम्पनियां सरकारी उपक्रम हैं. इसलिए इनके द्वारा नियंत्रित आईएलएफएस भी मूल रूप से सरकारी उपक्रम ही था. इस कंपनी के सरकार द्वारा निर्देशित होने का स्पष्ट प्रमाण है कि इसमें सरकारी अधिकारियों को ही प्रमुख नियुक्त किया गया है.
संकट में पड़ने के कुछ माह पूर्व कंपनी के प्रमुख रवि पार्थसारथी ने इस्तीफा दे दिया था. इसके बाद लाइफ इंश्योरेन्स कॉर्पोरेशन के प्रबंध निदेशक हेमंत भार्गव को कंपनी का प्रमुख नियुक्त किया गया. इन्होंने भी इस्तीफा दे दिया. इसके बाद लाइफ इंश्योरेन्स कॉर्पोरेशन के ही पूर्व प्रमुख एसबी माथुर को आईएलएफएस का प्रमुख नियुक्त किया गया.
लाइफ इंश्योरेन्स कॉर्पोरेशन के पूर्व अधिकारियों की नियुक्ति बताती है कि आईएलएफएस का मूल संचालन लाइफ इंश्योरेन्स कॉर्पोरेशन द्वारा ही किया जाता था. लाइफ इंश्योरेन्स कॉर्पोरेशन पर मालिकाना हक वित्त मंत्री का है. अतः आईएलएफएस के संकट की जिम्मेदारी लाइफ इंश्योरेन्स कॉर्पोरेशन के माध्यम से वित्त मंत्रालय की बनती है.
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अपने लेख में झुनझुनवाला आगे लिखते हैं कि “आईएलएफएस के संकट के लिए वित्त मंत्रालय जवाबदेही से बच नहीं सकता. आईएलएफएस का मालिकाना हक लाइफ इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन का था, जिसपर मालिकाना हक वित्त मंत्रालय का है. अत: यदि आईएलएफएस के निदेशकों ने गलत ऋण दिए तो इसकी जिम्मेदारी लाइफ इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन के माध्यम से वित्त मंत्रालय की बनती है.
दूसरी तरफ यदि जमीनी अर्थव्यवस्था की मंदी के कारण बुनियादी संरचना की मांग बढ़ नहीं रही थी. लेकिन देश को बड़ी परियोजनाओं का दिखावा करने के लिए वित्त मंत्रालय ने इन्हें लगातार बढ़ाया तो इसकी जिम्मेदारी भी वित्त मंत्रालय की ही बनती है. अत: वित्त मंत्रालय को देश को जवाब देना चाहिए कि आईएलएफएस के संकट में उसकी क्या भूमिका थी”.
जब यह मामला पूरी तरह से खुलकर सामने आया है तो पता चला है कि प्रोविडेंट और पेंशन फंड ट्रस्टों के IL&FS ग्रुप के बॉन्ड्स में 1,400 छोटी-बड़ी कंपनियों के इसमें हजारों करोड़ रुपए फंसे हैं. जिसमें करीब 14 लाख कर्मचारियों के पीएफ और पेंशन फंडों के पैसे भी हैं, एलआईसी की कंपनी में सबसे बड़ी हिस्सेदारी है, उसके फंड का बेजा इस्तेमाल मोदी सरकार हमेशा करती आई है. आखिरकार यह हजारों करोड़ रुपये डूबता है तो इसकी जिम्मेदारी से मोदी सरकार अपना मुंह मोड़ नही सकती है.
(लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

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