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असली दोषी कौन, टाटा स्टील या झारखंड सरकार? सरयू राय के इन ट्वीट को जरा गौर से पढ़िये

टाटा समूह की कंपनियों के खिलाफ सत्तारूढ़ दलों और मंत्री की मुहिम पर सरयू राय ने उठाये सवाल, कहा-समाधान सरकार के पास लेकिन मकसद सिर्फ सुर्खियां बनाना

Anand Kumar

Jamshedpur :  भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी मुहिम और जनहित के मुद्दों पर बेबाकी से अपनी राय रखनेवाले सरयू राय ने बुधवार को टाटा समूह के खिलाफ राज्य की सत्ता में भागीदार दलों, झामुमो और कांग्रेस के हमलावर रुख पर सवाल उठाये हैं. बता दें कि टाटा कमिंस कंपनी का मुख्यालय पुणे ले जाने सहित कई मुद्दों पर झामुमो ने बुधवार को पश्चिम सिंहभूम और जमशेदपुर में टाटा समूह की कंपनियों और खदानों के गेट को जाम कर धरना-प्रदर्शन किया.टाटा कमिंस कंपनी भारी वाहनों के इंजन का निर्माण करती है. इससे पहले मंगलवार को स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता ने बिरसा जयंती पर टाटा स्टील द्वारा कोई कार्यक्रम नहीं किये जाने पर रोष जताया था. गुप्ता जमशेदजी टाटा की प्रतिमा को गंगाजल से धोने के बाद अपने मुंह पर काली पट्टी बांद कर धरना पर बैठ गये थे. सत्तारूढ़ दलों के इस रवैये पर पूर्व मंत्री और जमशेदपुर पूर्वी के विधायक सरयू राय ने बुधवार को एक के बाद एक तीन ट्वीट कर इन दलों और सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया. सरयू राय ने अपने ट्वीट से यह स्पष्ट संदेश देने की कोशिश की है कि सत्ता में भागीदार  दल और उनके मंत्री जिन मुद्दों को लेकर टाटा कंपनी पर निधाना साध रहे हैं, दरअसल उनके हल की चाबी तो खुद सरकार के पास ही है.

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एक ट्वीट में राय लिखते हैं कि –  “टाटा स्टील और सरकार के बीच हुए लीज समझौता के अनुसार पूरे जमशेदपुर में नागरिक सुविधाएं टाटा स्टील को देनी है, वह भी सरकारी दर पर. मगर सुविधा नहीं मिलने की शिकायत लोग कहां करें,इसका प्रावधान समझौते में नहीं है. कंपनी पर भड़ास निकालने वाले इस बारे में सरकार से भी पूछने की हिम्मत करें.”  यह ट्वीट इशारा है कि कंपनी यदि लीज शर्तों का पालन नहीं कर रही, तो सरकार उससे इनका पालन कराने में सक्षम है. सत्तारूढ़ दलों को सरकार पर दवाब डालकर ऐसा फोरम  बनवाना चाहिए कि अगर कंपनी लीज की शर्तों का पालन नहीं करती, तो उसके खिलाफ उस फोरम में शिकायत हो सके औऱ उस फोरम को कानूनी अधिकार दिये जायें.

 

सरयू राय का अगला ट्वीट है –  “किसने रोका है जमशेदपुर को नगर निगम बनाने से या औद्योगिक नगर नहीं बनने से? जिस विषय का निदान सरकार की संचिकाओं में होना है,वह यदि समाचार पत्रों की सुर्खियां बनकर रह जाता है तो जनता के संदर्भ में इसे क्या कहा जाए? जागरण करना?गुमराह करना?भड़ास निकालना?खिसियानी बिल्ली का खंभा नोचना?”

एक और ट्वीट देखें –  “लीज़ समझौता अनुसार टाटा स्टील को जमशेदपुर के नागरिकों को जन सुविधाएँ देनी है.इस बारे में विधानसभा में उठे सवालों का सही जवाब झारखंड सरकार नहीं देती है तो इसके लिये कौन दोषी है? टाटा स्टील या झारखंड सरकार? इस बारे में कंपनी पर भडास निकालने वाले अपनी सरकार के गिरेबान में तो झांकें.”

इन तीनों ट्वीट से साफ जाहिर है कि सरयू राय टाटा कंपनी के खिलाफ चल रहे आंदोलन की मंशा पर सवाल उठा रहे हैं. उनके नजरिये से यह सारा खेल राजनीतिक प्रपंच के सिवा कुछ नहीं है. सरयू ने इन ट्वीट में सवाल उठाये हैं और इन सवालों का जवाब भी दिया है. जमशेदपुर को नगर निगम बनाने का मामला हो या जमशेदपुर में जनसुविधाओं को लेकर विधानसभा में पूछे गये सवालों पर सरकार का जवाब, सरयू ने इन मुद्दों पर सरकार और सत्तारूढ़ दलों दोनों को एक साथ कटघरे में खड़ा कर दिया है.

सरयू राय 2005 में टाटा लीज के नवीकरण के बाद से ही इसकी मध्यवर्ती समीक्षा की बात उठाते रहे हैं. इस बात को लेकर उन्होंंने सरकारों को पत्र भी लिखे हैं. अपनी बातों के समर्थन में उन्होंने मजबूत तर्क रखे हैं. उनका कहना है कि टाटा ने लीज की शर्तों में उल्लिखित बातों का कितना पालन किया है, जमशेदपुर की जनता को जनसुविधाएं उपलब्ध कराने की जिन बातों पर उसने हामी भरी है, प्रदूषण को लेकर जो वायदे उसने किये हैं, उनका कितना पालन टाटा कंपनी ने किया है, उसकी बीच में समीक्षा होनी चाहिए. लेकिन उनके सुझावों पर किसी सरकार ने अमल नहीं किया है. शायद इसीलिए सरयू अपने ट्वीट के माध्यम से यह जताना चाहते हैं कि जिन मुद्दों की चाबी सरकार के पास है, उनका समाधान यदि सरकार में शामिल दल टाटा कंपनी का गेट जाम करके या जमशेदजी की प्रतिमा को गंगाजल से नहलाकर निकालना चाहते हैं, तो इसके राजनीतिक निहितार्थ कुछ और ही चीजों की तरफ इशारा करते हैं.

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