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कौन सुरक्षित, कौन असुरक्षित है हिंदपीढ़ी में?

Anand Kumar

गिरिडीह का पचंबा फिलहाल सुर्खियों में है. यहां 12 जून की देर शाम हटिया रोड में दो समुदायों के बीच पथराव की घटना के बाद मोहल्ले के लोग डरे हुए हैं और इलाका छोड़ने की बात कह रहे हैं. 14 जून को यहां कुछ हिंदुओं ने अपने घरों के बाहर मकान बेचने का पोस्टर चिपका दिया. पचंबा के हिंदू बहुल इलाकों में कुछ समय से पथराव की घटनाएं हो रही हैं. एक मित्र ने रांची के हिंदपीढ़ी और कर्बला चौक इलाकों में हिंदुओं की घटती आबादी के बारे में मेरा ध्यान खींचते हुए आग्रह किया कि मैं इसके कारणों की पड़ताल करूं. इस बारे में आंकड़ों को जुटा पाना तो काफी श्रमसाध्य और शोध का विषय है, लेकिन मैंने वैसे लोगों से बात की जिनका परिवार पचंबा और हिंदपीढ़ी में कई दशकों से निवास कर रहा है.

उनसे जानने की कोशिश की कि इस इलाके की डेमोग्राफी में कितना और क्या अंतर आया है और हिंदुओं की घटती संख्या की वजह क्या है. और इस बात में कितनी सच्चाई है कि मुस्लिम बहुल बस्तियों में रहनेवाले हिंदू सुरक्षित नहीं हैं.

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गिरिडीह के पचंबा से क्यों भागना चाहते हैं हिंदू

गिरिडीह के पत्रकार मनोज कहते हैं कि पचंबा मुसलिम बहुल इलाका है, लेकिन पहले यहां अभी जैसा तनाव नहीं था. हाल के दिनों में जमीन का कारोबार करनेवाले एक व्यक्ति और उसके गुर्गों के कारण ऐसे हालात पैदा हुए हैं.

यहां लंबे समय से दोनों समुदाय साथ रहते आये हैं. उनके घर, दुकानें और कारोबार भी वहीं हैं. लोग छोटे-मोटे कामों के लिए एक-दूसरे पर आश्रित हैं. सामाजिक तानाबाना टूटेगा तो इसका असर दोनों समुदायों पर पड़ेगा.

मनोज बताते हैं कि पचंबा में तनाव की वजह सांप्रदायिक से ज्यादा जमीन कारोबार से जुड़ी है ताकि हिंदू औनेपौने भाव अपनी संपत्ति दलालों को बेच जायें और वे उन्हें ऊंचे भाव में बेच सकें.

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अपने-आप में एक अजूबा है हिंदपीढ़ी

रांची में पिछले हफ्ते जुमे की नमाज के बाद हुई तनावपूर्ण घटनाओं के  बाद राजधानी की सबसे बड़ी मुसलमान बहुल बस्ती हिंदपीढ़ी में रहनेवाले हिंदुओं की स्थिति जानने के लिए हमने वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता सुधीर पाल से बात की. सुधीर पाल का परिवार पिछले डेढ़ सौ साल से हिंदपीढ़ी में रहता आ रहा है. सुधीर ने हिंदपीढ़ी के इलाके में विभिन्न विषयों पर कई शोध भी किये हैं. वे बताते हैं कि हिंदपीढ़ी एक बहुत ही सघन आबादीवाला मुहल्ला है. करीब डेढ़ लाख की आबादी वहां निवास करती है.

हिंदपीढ़ी का इलाका मोटे तौर पर पुराने वेलफेयर सिनेमा (अभी के सैनिक मार्केट) से लेकर मेन रोड के संकटमोचन हनुमान मंदिर के पीछे काफी दूर पुरानी रांची की सीमा तक सटा हुआ है. इस बड़े इलाके में रांची नगर निगम के पांच-छह वार्ड शामिल हैं. सुधीर कहते हैं कि हिंदपीढ़ी अपने-आप में एक अजूबा है.

यहां सौ-सवा सौ तरीके के काम करनेवाले लोग रहते हैं. दर्जी हैं, तो जरी-कढ़ाई, कसीदाकारी करनेवाले भी. सब्जी-फल बेचनेवाले हैं, तो मांस-अंडा के कारोबारी भी, मैकेनिक-इलेक्ट्रीशियन हैं, तो बढ़ई-लोहार भी हैं. धुनिया-प्लंबर, पेंटर, कारीगर, बैंड बाजेवाले से लेकर लाइटवाले सब यहां भरे पड़े हैं. इसे आर्टीजन की बस्ती कहा जाये, तो अतिश्योक्ति नहीं होगी.

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हिंदपीढ़ी में 150 साल से हैं, कभी डर नहीं लगा

दिन हो रात, हिंदपीढ़ी इलाका हमेशा गुलजार रहता है. सुधीर बताते हैं कि मजाक में हम लोग कहते हैं कि हिंदपीढ़ी कभी सोती नहीं. देर रात ट्रेन आदि से रांची आने पर हम लोग पीपी कंपाउंड के पीछे के रास्ते से ओसीसी कंपाउंड स्थित अपने घर जाते हैं, क्योंकि चाहे जितनी भी रात हो, वहां लोगों की आवाजाही दिखती है. जबकि मेन रोड के सन्नाटे में जाने में डर लगता है. वे कहते हैं कि बाहर से लोगों को लगे कि हिंदपीढ़ी कम्यूनल एरिया है, लेकिन हमलोग पिछले 150 साल से यहां रह रहे हैं. हमें कभी डर या अलग-थलग पड़ जाने का अहसास नहीं हुआ.

सुधीर कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि यहां सभी लोग अच्छे ही हैं, यहां बुरे लोग भी हैं, लेकिन ऐसे लोग हर जगह होते हैं. ओवरऑल देखें, तो हिंदपीढ़ी एक ऐसा इलाका है, जहां आप रात के 12 बजे भी जा सकते हैं और बहुत सुरक्षित होकर जा सकते हैं.

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इस तानेबाने को कोई तोड़ना नहीं चाहता

हिंदपीढ़ी की करीब 90 फीसदी आबादी मुसलमानों की है. जीवन-यापन और दूसरी जरूरतों के लिए यहां के मुसलमानों की निर्भरता जितनी हिंदुओं पर है, उतने ही निर्भर यहां के हिंदू भी मुसलमानों पर हैं. कुछ दिन पहले एक संस्था द्वारा कराये गये शोध के अनुसार करीब 100 तरह के ऐसे काम हैं, जिनके लिए यहां रहनेवाले हिंदू और मुसलमान एक दूसरे पर निर्भर हैं.

कभी वे ग्राहक होते हैं और कभी सप्लायर. इस फैब्रिक को यहां कोई तोड़ना नहीं चाहता. दोनों समुदायों के लोग एक-दूसरे के यहां शादी-विवाह और दूसरे सामाजिक कार्यक्रमों में शामिल होते हैं.

कोरोना के लॉकडाउन के पहले हिंदपीढ़ी के मुसलिम युवकों ने एक हिंदू बच्चे के इलाज के लिए करीब दो महीने तक ऑटो रिक्शा में घूम-घूम कर पैसा इकट्ठा किया था. यह अकेली घटना नहीं है. लंबे समय लोग एक-दूसरे की मदद करते चले आ रहे हैं.

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चंद तात्कालिक घटनाओं से धारणा बनाना सही नहीं

पत्रकार कुमार सौरभ का परिवार मूल रूप से हिंदपीढ़ी का रहनेवाला है. अब वे वहां नहीं रहते, लेकिन हिंदपीढ़ी को लेकर सौरभ के विचार भी कमोबेश सुधीर की तरह ही थे. लेकिन बड़ा सवाल यह था कि इतने सौहार्द्र और सद्भाव के बाद भी माहौल क्यों बिगड़ा और मेन रोड पर बने संकट मोचन हनुमान मंदिर और काली मंदिर पर पत्थरबाजी की घटना कैसे हुई. इस पर सुधीर कहते हैं कि यह एक तात्कालिक घटना थी.

भीड़ में कहां के और कैसे तत्व घुस गये थे, इसका पता पुलिस लगा रही है. इसके अलावा देश में अभी जिस प्रकार का माहौल है, वह भी इसका कारण हो सकता है. पहले भी चंद ऐसी तात्कालिक घटनाएं हुई हैं, लेकिन इससे हिंदपीढ़ी के सोशल फैब्रिक पर कोई खास असर नहीं पड़ा है.

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तो हिंदपीढ़ी से क्यों घटती जा रही है हिंदू अबादी

यह एक अलग तरीके का इकोनॉमिक्स है. जो जमीन दलाल हैं या जो रियल एस्टेट के कारोबार में हैं, उन्हें पता है कि हिंदपीढ़ी एक प्राइम लोकेशन है. हिंदू यहां माइनॉरिटी हैं. ऐसे दलालों और कारोबारियों को लगता है कि अगर यहां का भय का माहौल पैदा नहीं होगा, तो औनेपौने दाम में जमीन नहीं मिलेगी. इसलिए ऐसी बातें फैलायी जाती हैं. जो लोग बाहर से हिंदपीढ़ी को देखते हैं, वे उसी तरीके से इसे प्रोजेक्ट भी करते हैं.

हिंदपीढ़ी के रहनेवाले एक सज्जन बताते हैं कि उन्हें रोज परिचितों के फोन आते हैं कि सुना कि आपके मोहल्ले में कोई तलवार लेकर घुस गया या कहीं कुछ हो गया. जबकि ऐसा कुछ होता नहीं है. इसे कम्यूनल एंगल से देखना सही नहीं होगा, यह जमीन माफिया का विशुद्ध कारोबार है, जो भय पर आधारित है.

हिंदपीढ़ी में मुस्लिम समुदाय के काफी लोग अच्छे-खासे पैसेवाले हैं, जो जमीन या घर के लिए कैश पैसा देने को तैयार रहते हैं. इसलिए भी भय बनाया जाता है ताकि हिंदुओं की संपत्ति को औनेपौने दाम में खरीद कर ऊंचे दाम में बेच दिया जाये.

इसके अलावा हिंदपीढ़ी में जो हिंदू बसे हैं, उनमें ज्यादातर लोग तीन-चार पीढ़ियों से वहां रह रहे हैं. परिवार बढ़ने के कारण बंटवारा भी होता गया, और नौकरी और अन्य कारणों से लोग बाहर रहने लगे.

जब रहनेवाला कोई बचा नहीं, तो ऐसे परिवार भी अपनी संपत्ति बेचने लगे. यहां रहनेवाले हिंदू ऐसी संपत्ति की ज्यादा कीमत नहीं देना चाहते, जबकि मुसलमान अच्छे दाम देते हैं. यह भी हिंदुओं की घटती संख्या का एक प्रमुख कारण हो सकता है.

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हिंदपीढ़ी में बन रहे हैं फ्लैट, बस रहे हैं हिंदू

और ऐसा नहीं है कि हिंदपीढ़ी में हिंदू आना नहीं चाहते. सुधीर पाल बताते हैं कि उनके ही इलाके ओल्ड कमिश्नर्स कंपाउंड, घोष कंपाउंड में कई रिहाइशी फ्लैट बने, बुधिया की बड़ी इमारत बन गयी. अगर स्थिति खराब होती, तो ये चीजें नहीं बनतीं. इतना ही डर का माहौल होता, तो हिंदू परिवार 40-50 लाख का फ्लैट लेकर क्यों यहां रहने आते.

लेकिन जिस तरह हर आदमी दूसरे को सांप्रदायिकता के चश्मे से देख रहा है, हर बात को धर्म से जोड़ कर राजनीति की जा रही है और इसे सामाजिक मान्यता मिल रही है, ऐसे माहौल में हिंदपीढ़ी और इस जैसी बाकी जगहों की सोशल फैब्रिक को जोड़ कर रखनेवालों की संख्या लगातार कम होती जा रही है.

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