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गैर-गुजरातियों पर हुए हमले का जिम्मेदार आखिर कौन ?

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Faisal Anurag

गैर-गुजरातियों को गुजरात से भगाए जाने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है ? यह सवाल इसलिए भी है कि जिन के हाथ में लोगों के जानमाल की सुरक्षा की जिम्मेदारी है, वे भी दूसरों को ही दोषारोपित कर रहे हैं. इस मामले में अभी तक कोई भी बड़ा नेता गिरफ्तार नहीं किया गया है. और न ही उस के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है. इस पूरे मामले पर राजनीति करने की होड़ लगी हुई है. अभी तक केवल हार्दिक पटेल और जिग्नेश मेवानी ने इस पूरी हिंसा की निंदा की है. भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के नेताओं ने दुख तो जरूर जताया है लेकिन इसकी भत्स्रना नहीं की है. राज्य सरकार की नींद दस दिनों के बाद खुली तब उसने कुछ लोगों को गिरफ्तार किया.

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गुजरात में इस तरह की हिंसा पर सरकार की इस खामोशी को लेकर चर्चा गरम है. कांग्रेस के विधायक अल्पेश ठाकोर को भारतीय जनता पार्टी जिम्मेवार बता रही है. लेकिन अभी तक न तो अल्पेश के खिलाफ हिंसा भड़काने का कोई मामला दर्ज हुआ है और न ही उन की गिरफ्तारी हुई है. हालांकि अल्पेश ने आराप को खारिज किया है. और कहा है कि अगर इस तरह के आरोप लगते रहे तो वे राजनीति से संन्यास ले लेंगे. हार्दिक पटेल ने एक हेल्पलाइन नंबर शुरू किया है और कहा है कि जिन्हें भी धमकाया जा रहा है, वे इसकी तुंरत सूचना दें.

गुजरात की इस हिंसा की मार बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के श्रमिकों को उठानी पड़ी है. गुजरात के उद्योग जगत के यूनियनों के एक नेता ने कहा है कि इस तरह की घटना से गुजरात की इंडस्ट्री पर संकट-सा आता जा रहा है. गुजरात क लोग तिजारत करने में तो रूचि लेते हैं, लेकिन वे गैर गुजरातियों की तरह मेहनत का काम नहीं कर सकते हैं. उन्होंने मजदूरों से कहा है कि वे पलायन नहीं करें, कारखानों के भीतर शरण लें. इससे जाहिर होता है कि मामला बेहद गंभीर है और सरकार के स्तर पर जो कदम उठाए जा रहे हैं वे नाकाफी है. इस मामले पर प्रधानमंत्री और अमित शाह की चुप्पी पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं. आखिर प्रधान मंत्री और शाह इस घटना पर खामोश क्यों हैं ?

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इस हिंसा का तत्कालिक कारण तो एक रेप की घटना है जिसका दोषी एक गैर गुजराती है. उस व्यक्ति की गिरफ्तारी तो हो गयी है. बावजूद हिंसा भड़की. लोगों के साथ मारपीट की गयी है और 24 घंटे के अंदर उन्हें गुजरात छोड़ देने का फरमान जारी कर दिया गया. गुजरात के अखबारों में गुजरात से भागने वालों की संख्या 50 हजार बतायी जा रही है. जबकि सरकार इस आकड़ें से इंकार कर रही है. गुजरात के मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि  स्थिति नियंत्रण में है. बावजूद इसके रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों पर लागों की भारी भीड़ है.

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राज्य सरकार लोगों को विश्वास नहीं दिला पा रही है. राज्य की पूरी मिशनरी के प्रति भी लोगा आश्वस्त नहीं है. उत्तर प्रदेश और बिहार के मुख्यमंत्री ने गुजरात के मुख्यमंत्री से बात तो की है, लेकिन उस बात के बाद भी लोगों का भागना रूका नहीं है. हालांकि पिछले तीन दिनों से मारपीट की कोई सचना नहीं है. अल्पेश ठाकोर ने भी बिहार और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिख कर अपना पक्ष रखते हुए इस घटनाक्रम में शामिल नहीं रहने की बात कही है.

मामला सिर्फ एक दुष्कर्म के बाद की प्रतिक्रिया भर नहीं है. गुजरात में समूह विशेष के खिलाफ हिंसा का इतिहास भी पुराना है और राज्य सरकारों का इस तरह की हिंसा से तत्काल निपटने का भी. राज्य सरकार की नींद यदि दस दिनों के बाद टूट रही है, तो मर्ज के असली कारणों को भी समझने की जरूरत है. गुजरात के कारखानों में गैर गुजराती मजदूर ही बहुसंख्या में है. अभी गुजरात की सरकार एक कानून बना रही है कि गुजरात के कारखानों में 80 प्रतिशत गुजरातियों की बहाली अनिवार्य होगी. इससे पता चलता है कि गुजरात में बाहर से आ कर श्रम बेचने वालों के खिलाफ पहले से ही माहौल बनाया जा रहा है और बेरोजगारी चरम पर है.

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इससे गुजरात के विकास मॉडल जिसकी पूरे दश में चर्चा की जाती है, उसकी पोल भी खुल रही है. हिंदी पट्टी के इलाकों में औद्योगिक विकास के अवरूद्ध रहने के कारण बड़े पैमाने पर पलायन होता है. इन इलाकों की राजनीति में रोजगार और विकास के सवाल को जिस तरह नजरअंदाज किया है उससे भी हालात लगातार विस्फोटक बनते गए है. और उसका परिणाम यह निकला है कि इन इलाकों के लोगों की रोजगार के लिए निर्भरता अपेक्षाकृत औद्योगिक राज्यों पर बढ़ी है. अधिकांश जगहों पर इन मजदूरों को बेहद खराब हालात में जीवन गुजारना पड़ता है. हालांकि इसमें उन्हें कुछ बेहतर मजदूरी जरूर मिल जाती है.

लेकिन जिस डिगनिटी ऑफ लेबर की अपेक्षा उनके लिए की जाती है, वह उन्हें नहीं के बराबर ही मिलती है. गुजरात भी इसका अपवाद नहीं है. गुजरात की राजनीति में भी इस तरह के लोग हैं जो गुजरातियों के विशेषाधिकार की बात करते हैं. और इसके लिए कभी किसी धार्मिक समूह को और कभी बाहर से आए मजदूरों को निशाना बनाते हैं. भारत की एकता और अखंडता के लिए यह खतरनाक प्रवृति है और इस तरह की प्रवृतियों को तत्काल रोका जाना चाहिए.

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