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पहले जिस पप्पू लोहरा के साथ घूमते थे, अब उससे ही लड़ना पड़ रहा झारखंड पुलिस को

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Surjit Singh

लोहरदगा पुलिस और झारखंड जन मुक्ति परिषद (जेजेएमपी) के उग्रवादियों के बीच 18 जुलाई को मुठभेड़ हुई. मुठभेड़ में जेजेएमपी के तीन उग्रवादी मारे गये. 19 जुलाई को मीडिया में जो रिपोर्ट आयी है, उसमें मारे गये उग्रवादियों के नाम का जिक्र नहीं है.

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कहा गया है कि जेजेएमपी के पप्पू लोहरा के दस्ते के साथ मुठभेड़ हुई, जिसमें तीन उग्रवादी मारे गये और एके-47 समेय अन्य हथियार व कारतूस बरामद हुए. आइजी अभियान ने यह भी कहा कि जेजेएमपी लगातार घटनाओं को अंजाम दे रहा है.

जेजेएमपी संगठन कैसे बना. किसके संरक्षण में बना. किसके इशारे पर क्या-क्या काम किया. कई वर्षों तक उसे किसकी इजाजत से कुछ भी करने की छूट मिलती रही. यह सब जांच का विषय है. जांच होगी. शायद कभी नहीं.

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वर्तमान समय में एक सवाल सबके बीच चर्चा का विषय है. चर्चा इस बात की हो रही है कि कुछ समय पहले तक पुलिस के अफसर और जवान जिस जेजेएमपी के उग्रवादी के साथ जंगल में घूमते थे, अब ऐसा क्या हुआ कि उसी उग्रवादी के साथ पुलिस को मुठभेड़ करना पड़ रहा है. क्या गुमला, सिमडेगा, पलामू, लोहरदगा से माओवाद का अंत हो गया है. या कहीं ऐसा तो नहीं कि इसके तार बकोरिया कांड से जुड़े हुए हैं.

16 दिसंबर 2018 को न्यूज विंग ने कुछ तस्वीरें प्रकाशित की थीं. तस्वीर जंगल की है. जंगल में सीआरपीएफ के अधिकारी व जवान हैं. और साथ में जेजेएमपी का वह उग्रवादी पप्पू लोहरा व सुशील उरांव भी है. एक तथ्य यह भी था कि पप्पू लोहरा पर झारखंड पुलिस ने 10 लाख का और सुशील उरांव पर 05 लाख रुपये के इनाम की घोषणा कर रखी है.

इस खबर के आने के बाद पुलिस मुख्यालय के अधिकारियों व सीआरपीएफ के अधिकारियों ने कहा था कि इस तस्वीर की जांच होगी. जांच हुई या नहीं. जांच हुई तो क्या कार्रवाई हुई, इसकी जानकारी अब तक सार्वजनिक नहीं हो पायी है.

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घटना गुलीकेरा ग्राम पंचायत के बुरुगुलीकेरा गांव की है. सूचना है कि हत्या करने के बाद सभी लोगों के शव गांव के पास स्थित जंगल में फेंक दिये गये हैं.

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पुलिस पर पहले भी जेजेएमपी उग्रवादी संगठन से सांठ-गांठ रखने के आरोप लगते रहे हैं. मामला विधानसभा में भी उठा है. जेजेएमपी पहले भी घटनाओं को अंजाम देता रहा है और पुलिस कार्रवाई के नाम पर खानापूर्ती करती रही है. ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि अचानक ऐसा क्या हुआ है, जो पुलिस व जेजेएमपी के उग्रवादी एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गये.

16 दिसंबर 2018 की खबर में न्यूज विंग ने यह भी उल्लेख किया था कि जेजेएमपी का संबंध बकोरिया कांड से है. जिस घटना में पुलिस ने कथित तौर पर एक नक्सली समेत 12 लोगों की हत्या फर्जी मुठभेड़ में कर दी थी.

इस मामले की जांच सीआइडी ने की. सीआईडी ने मुठभेड़ को सही माना. लेकिन हाईकोर्ट सीआइडी की दलील से सहमत नहीं हुई और मामले की सीबीआई जांच का आदेश दिया. सीबीआई इस मामले की जांच कर रही है.

जेजेएमपी का एक उग्रवादी था, गोपाल सिंह. पिछले साल तक वह लातेहार जेल में बंद था. उसका एक वीडियो वायरल हुआ था. जिसमें उसने उग्रवादी संगठन टीपीसी की जन अदालत में यह स्वीकार किया था कि बकोरिया कांड को जेजेएमपी के उग्रवादियों ने अंजाम दिया था. खासकर पप्पू लोहरा ने. फिर पप्पू लोहरा की सूचना पर पुलिस घटनास्थल पर पहुंची और मुठभेड़ की कहानी बनायी.

इन कारणों से ही अब सवाल यह उठने लगा है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि बकोरिया कांड में फंसे अफसरों को यह डर है कि अगर पप्पू लोहरा सीबीआई की पकड़ में आ गया, तो सारा खेल सामने आ जायेगा. बकोरिया कांड में फंसे कुछ अफसर आज भी महत्वपूर्ण पदों पर हैं. ऐसे में लोहरदगा के पेशरार में 18 जुलाई को हुए मुठभेड़ पर कई तरह के सवाल उठना लाजिमी है.

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