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वर्तमान राजनीति भारत के संघीय ढांचे को किस ओर ले जा रही है?

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Faisal Anurag

देश में संवैधानिक लोकतंत्र एक नये प्रयोग से गुजर रहा है. जहां कैबिनेट की राय भी नहीं ली जा रही है.  उनसे केवल सहमति प्रकट करवा लिया जा रहा है. इमरजेंसी भी जब लगी थी, तब भी कैबिनेट को इस तरह से  नजरअंदाज नहीं किया गया था. तब भी संविघान के कुछ आर्टिकिल को स्थगित किया गया था. लेकिन एकतरफा संसद की राय लेना जरूरी समझा गया था. यह पहला ही अवसर है जब एक आर्टिकिल को निरस्त करते हुए इस तरह की प्रक्रिया अपनायी गयी है. यह माना जा सकता है कि यहां कुछ भी हो सकता है. संविधान और लोकतंत्र के अब  तक के प्रयोग और अनुभव के यह सब बिल्कुल उलट है.

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कुछ खास लोग इससे खुश हो सकते हैं. लेकिन सवाल कश्मीरियों का है जिसे वाजपेयी सरकार भी कश्मीरीयत के नाम से सम्मान देते रही थी. और उस सरकार ने भी कश्मीर को एक बेहद संवेदनशील नजरिये से देखा था. पिछले कुछ समय से जिस तरह से कश्मीरियों के साथ संवाद के तमाम रास्ते बंद किये गये, उससे ही जाहिर हो गया था कि मोदी सरकार आरएसएस के उस एजेंडे पर चल रही है, जो धारा 370 हटाने की वकालत करती रही है.

इस सवाल पर देश में न तो राजनीतिक सहमति बनाने की कोशि की गयी न ही अन्य स्टेट होल्डरों की राय को महत्व दिया गया. जिस तरह भारतीय सैनिक की उपस्थिति के बीच इसका फैसला लिया गया है, वह सामान्य नहीं है. यहां तक कि संविधान सभा ने जिन कारणों से धारा 370 और धारा 371 के महत्व को रेखांतिक करते हुए अहम बताया था, उसे भी नजरअंदाज कर दिया गया.

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जम्मू और कश्मीर से राज्य का दर्जा छीना जाना और लद्दाख को भी अलग केंद्र शासित प्रदेश बना देना, भारत के संघात्मक गणराज्य की बहस को भी तेज करेगा. देश के अनेक राज्य लंबे समय से संघात्मकता को मजबूत बनाने ओर उसका आदर करने की मांग करते रहे हैं. 2019 के चुनाव के बाद भारत की राजनीति जिस दिशा में जा रही है, उसके कई निहितार्थ हैं. संवैधानिक शासन का साफ मतलब यह है कि संविधान की आत्मा को किसी भी सूरत में नजरअंदाज नहीं किया जाये.

कश्मीर घाटी में इसकी क्या प्रतिक्रिया होगी, वह तो अभी साफ नहीं है. लेकिन महबूबा मुफ्ती के ट्वीट ने  साफ कर दिया है कि हालात आसानी से सामान्य नहीं होंगे. महबूबा, जिनके साथ अभी हाल तक भाजपा ने साझा सरकार का संचालन किया, इसे लोकतंत्र का काला दिन बता रही हैं. उनका कहना है कि भारत के इस फैसले के बाद कश्मीर में सेना की उपस्थिति एक दखलअंदाजी है.

यह बेहद गंभीर बयान है. भारत को पाकिस्तान सहित अन्य देशों की प्रतिक्रिया और उसके नतीजों के लिए अभी इंतजार करना होगा. दुनियाभर में अब तक जम्मू-कश्मरी को एक विवादित क्षेत्र माना जाता रहा है. और समस्या के निदान के लिए द्विपक्षीय पहल की बात की जाती रही है. मोदी सरकार भी हाल तक इस नीति को मानती रही है. लेकिन इस फैसले से साफ है कि वह इससे प्रस्थान कर चुकी है.

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सवाल यह नहीं है कि धारा 370 खत्म हो गया. बल्कि सवाल इससे कहीं ज्यादा गहरा और संवैधानिक है. संविधान सभा में तो पटेल और श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इसका खुला समर्थन किया था. मुखर्जी ने अपना नजरिया कुछ सालों के बाद बदला. इस धारा में कई बार अनेक बदलाव भी लाये गये हैं.

लेकिन इसके अस्तित्व से खिलवाड़ नहीं किया गया. इसका कारण यह है कि अब तक भारत अपनी प्रादेशिक विविधताओं के प्रति सम्मान का भाव रखता रहा है और इसे लोकतंत्र के लिए जरूरी मानता रहा है. सांसकृतिक एकात्मक राष्ट्रवाद की जिस अवधारणा को आरएसएस ने अपनी वैचारिक विशेषता मान रखा है, मोदी सरकार ने उसपर खुल कर चलना शुरू कर दिया है.

आनेवाले दिनों में यह बहस तेज होगी. यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि देश के अनेक प्रदेशों में अनेक तरह के सवाल उठते रहे हैं. आदिवासी क्षेत्र भी अपनी सांस्कृतिक विशिष्टताओं की बात करते हुए संवैधानिक प्रावधानों की बात करते रहे हैं. कश्मीर के अलावे भी देश के अन्य छह राज्यों में 35 ए की भावना के अनुरूप कानून लागू है. हिमाचल प्रदेश के संरक्षण के लिए धारा 371 वहां लागू किया गया है.

भारत की खूबसूरती उसकी विविधताओं में मानी जाती रही है. कश्मीरीयत का सवाल भी इसमें से एक है. सवाल उठता है कि मोदी सरकार पूर्ववर्ती नीतियों के प्रति जिस तरह की उपेक्षा का भाव रखती है, उसके आने वाले दिनों में दिशा क्या होगी?

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