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#Economic Recession : आंकड़ों में हेराफेरी का असर देश की अर्थव्यवस्था को किस रास्ते पर ले जा रहा है

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Faisal  Anurag

भारत जैसे तमाम देशों में आर्थिर्की का संकट सामान्य परिघटना नहीं है. यह नीतिगत नाकामयाबी को ही प्रदर्शित कर रहा है. हालांकि इस संकट को लेकर अर्थशास्त्री एकमत तो नहीं हैं, लेकिन उनकी चिंताओं में यह तथ्य मुखर हो रहा है.

दरअसल लोकप्रियतावादी रुझानों का प्रभाव भी इसमें दिखता है. अनेक अर्थशास्त्री हालात में सुधार पर जोर तो दे रहे हैं लेकिन वे जो नुस्खा बता रहे, उससे दूरगामी सार्थक परिणाम की संभावना को लेकर निश्चितता का माहौल नहीं है.

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मध्यमार्गी अर्थशास्त्रियों के विचारों को हाशिये पर धकेला जा रहा है उसका असर भी हालात पर देखा जा सकता है. भारत की आर्थिक राह पिछले छह सालों से कोई ठोस आकार ग्रहण नहीं कर सकी है.

इसके साथ ही डॉ मनमाहन सिंह के जमाने से अलग दिखने लेकिन नीतियों के तौर पर उसी पर चलते रहने की प्रवृति भी एक ऐसा संजाल बनाती है, जिससे निकलना आसान नहीं दिखता है. 2014 के बाद से राजनीतिक कामयाबियों  के शोर में आर्थिक वास्तविकताओं को लेकर संवेदना का अभाव दिखता रहा है.

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आमतौर पर राजनीतिक प्रवृतियां अपने अनुकूल अर्थव्यवस्था का निर्माण करती हैं. लेकिन मोदी सरकार ने पुरानी राह नहीं छोड़ी है, लेकिन उसे अपनाया भी नही है. जबकि राजनीतिक तौर पर उनकी प्रथमिताएं पिछली तमाम सरकारों से बहुत अलग हैं. इस अलगाव के असर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है.

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चीन के जीडीपी ग्रोथ में आ रही कमी का असर विश्व की तमाम अर्थव्यस्थाओं को प्रभावित कर रहा है. 2007 में चीन जहां 14 प्रतिशत के दर से विकास की कहानी लिख रहा था. तब भारत की विकास दर भी लगातार आगे बढ रही थी.

और 2011 तक वह 10 प्रतिशत तक पहुंच गया था. विकसित होती इन अर्थव्यवस्थाओं ने   दुनिया के बाजार को संकट से उबारने में बड़ी भूमिका निभायी है. लेकिन 2007 के बाद से चीन अपने स्वप्निल ग्रोथ से लगातार नीचे खिसक रहा है. इस वर्ष चीन की विकास दर 6 प्रतिशत ही दर्ज की गयी है.

इसके साथ ब्रेक्ज्टि ओर ट्रंप की नीतियों के का दुष्प्रभाव भी इकोनॉमी पर पड़ रहे हैं. जिन देशों ने अपनी विकास दर को बढ़या है, उसकी कहानी बताती है कि स्थनीय कारक वहां प्रभावी हैं. भारत की विकास दर में कमी का कारण 2015 की नोटबंदी और बाद की नीतियों हैं. यहां तक की बनावटी आकडों के कारण भी भारत को नुकसान हुआ है.

दुनिया की अनेक आर्थिक संस्थानों ने कई बार इन आंकड़ों को लेकर अविश्वास को प्रकट किया है. नरेंद्र मोदी के आर्थिक सलाहकार पद से इस्तीफा देने के बाद तो अरविंद सुब्रहमण्यम भी लगतार आरोप लगाते रहे हैं कि आंकड़ों के साथ फर्जीवाड़ा किया गया है. इसे लेकर अनेक बड़े अर्थशास्त्री संदेह और चिंता प्रकट कर चुके हैं.

इस संदर्भ में नोबल प्राइज जीतने के बाद हली बार भारत आये अभिजीत बनर्जी ने आर्थिक व्यवस्था को लेकर अनेक अहम बातें कही हैं. बनर्जी ने सामाजिक पंजीनिवेश पर सबसे ज्यादा फोकस किया है. उन्होने कहा है कि सामाजिक बेनिफिट प्राइवेज गेन जैसा ही नहीं है.

हिंदुस्तान टाइम्स को दिये गये साक्षात्कार में भारत की इकोनॉमी को ले कर उनकी चिंता साफ झलकती है. करण थापर को दिये गये इंटरव्यू में बेहद महत्वपूर्ण बातें हैं. इसमें उन्होंने यह कहा है कि देश बेहद संकटग्रस्त इकोनॉमी का शिकार है. बनर्जी गरीबी और बेरोजगारी के सवाल को प्रमुखता से फोकस करते हैं.

एक अंग्रेजी चैनल से बात करते हुए उन्होंने कहा, We don’t like people being unemployed, but private companies don’t care. If it is cheaper to replace an employee with a machine, a private company will do it,”

साथ ही उन्होंने दि हिंदू को कहा है कि कार्रपोरेट टैक्स के विपरीत परिणाम होंगे. इसे केंद्र सरकार को वापस लेना चाहिये.

वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश के राय ने उनके अनेक साक्षात्कार के सार को इन शब्दो में व्यक्त किया है : बातचीत में एक जगह बनर्जी कहते हैं कि रीगन-थैचर दौर की नीतियां भी ब्रेक्जिट और ट्रंप जैसी घटनाओं के लिए जिम्मेदार हैं.

मेरी राय में यह बिंदु हमारे देश के लिए भी अहम है. उन्हीं नियो-कॉन (न्यू कंजरवेटिज्म या नव-दक्षिणपंथ) नीतियों को भारत समेत कई विकासशील व अविकासित देशों में नियो-लिब (न्यू लिबरलाइजेशन या नव-उदारवाद) के नाम पर लागू किया गया.

दुर्भाग्य से हमारे देश में धुर-दक्षिणपंथ और क्रिप्टो-फासीज्म के बढ़त की पड़ताल करते हुए इस पहलू पर न के बराबर ध्यान दिया गया है. अभी भी हमारे उदारवादी सांस्कृतिक व राजनीतिक आयामों पर ही फंसे हुए हैं. और जिनको यानी मार्क्सवादियों व समाजवादियों को आर्थिक और सामाजिक पहलू के साथ भी मुद्दे को देखना था, वे भी ऐसा करने से चूक रहे हैं.

बनर्जी का आरोप है कि लोकतंत्र की प्रक्रिया को भारतीय उदारवादी मध्यममार्गियों ने बहुत नुकसान किया है. यह बेहद तल्ख टिप्पणी है. हिंदुस्तान टाइम्स के रोशन किशोर ने उनका बेहद दिलचस्प साक्षात्कार लिया है.  इसमें बनर्जी उन तमाम सवालों पर खुल कर अपनी बात कह रहे हैं जिन्हें ले कर संशय या विवाद खड़ा किया जाता है.

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