LITERATURE

रुख हवाओं का जिधर है, हम उधर के हैं…

  • Mithilesh

मित्रो! आप सबको पता है हम मध्यवर्ग हैं और हम भी इसी दुनिया के वाशिंदे हैं. हां, हां, आपने सही पहचाना हम खाये-अघाये पगुराते हुए मध्यवर्ग हैं. ज्यादातर मामलों में हमें कोई फर्क नहीं पड़ता कि देश दुनिया में क्या कुछ हो-जा रहा है? और यदि हो-जा भी रहा है तो हम ऊ सबसे बचने का रास्ता आसानी से ढूंढ़ लेते हैं. अरे ढूंढ़ना भी क्या है, घोंघे की मानिंद खोल के अंदर चले जाते हैं.खोल बोले तो घर- आशियाने के अंदर.

तो भला बताओ आंधी आवे कि तूफान हमरा कोई फरक पड़ेगा, बचे रहेंगे कि नहीं? कौनो किसम की कोई भी समस्या आवे अपने-आपको ही बचाना मार्के की बात होती है. हम बचेंगे तभी न यह देश बचेगा और हमारी देशभक्ति भी बचेगी. उंहूँ! आप लोग कौनो गलतफहमी में मत परियेगा कि हम अब वैसन वाला देशभक्त हैं, जैसन वाला भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु, आज़ाद, विवेकानंद, गांधी जी, अम्बेडकर ई सब थे. हम ऊ सबसे फ्रेश वाला देशभक्त हैं. पहिले तो पड़ोस में भी भगतसिंह के पैदा होने या बनने को लेकर खुश हो लेते थे, लेकिन अब ऊहो हमको नयं रुचता- पचता है.

अब ड्राइंग रूम में भी हम उसको पसंद नहीं कर पाते, बल्कि हमें भक्ति- भाव में ही डूबा रहना ज्यादा मज़ेदार लगता है. अब कोइयो सवाल उठा देता है न प्रधानसेवक पर तो हमको लगता है कि ओकर मुंह नोंच लें, इसलिए भाई कोई सवाल करने का नहीं. कैसे? क्यों? कब? ई सब भूल जाओ, अब खाली सुनने का और सुनने का, गुनने का कोई ज़रूरत नहीं है, बस सुनने और फॉलो करने का है, क्या समझे? जे कहीं कोई सवाल उठावे तो उसको देशद्रोही बताने का और पाकिस्तान भेजने का. ऐसा इसलिए कि जानम देखा करो और समझा भी करो कि भक्त बने रहकर भक्ति बनाये रखने का. भक्ति नहीं करोगे तो शक्ति कहां से पाओगे प्यारे?
यह भक्ति-भाव हममें उत्पत्ति काल से ही उद्भूत हुआ है. हमारा ज्यादा हिस्सा भक्ति काल को साकार करने में ही लगा रहा है और अब तो लगभग पुरम पूरा. अच्छा ई जानते हो कि नहीं हमारी पैदाइश कहां की है? लो, नहीं जानते तो बता देते हैं, सात समुन्दर पार बर्तानिया में हम पले- बढ़े हैं.

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हां-हां, ठीके बूझे, वहीं न कल-युगी (औद्योगिक) क्रांति हुई थी और वह जब हो गई तो एक तबके को वहां के कल-कारखानों में परिश्रम याने मेहनत-मशक्कत करने के लिए लाया गया और ओकरे में एगो और ग्रुप को, जो थोड़ा चालू-पुरजा माने पढ़ल-लिखल था, तो उसको मजूर सब पर कुर्सी पर बैठे-बैठे निगरानी रखनेवाला बना दिया. और, ऊ हमीं थे.

हमारे ऊपर कारखानेदार-पूंजीपति-मालिक था और हमारे नीचे माने मातहत मजूर सब था, सो दुनो के घट- बढ़, नफ़ा-नुकसान को हम जानते-बुझते थे. एहि से हम ‘हाय रे हमर हरिना, बूझ-बूझ चरना’-की तरह चरते रहे. हमर ई भूमिका और समझ-बूझ के देख के न ऊ जर्मनी वाला बाबा, अरे वही मार्कुस (मार्क्स) बाबा जो था न ऊ सोचा कि हमीं पहिले-पहिल इंग्लैंड में क्रांति कर देंगे और साम्यवाद का सपना साकार करते हुए बाघ-बकरी दूनो को एके घाट पर पानी पीने की छूट दिया देंगे.

लेकिन मार्क्स बाबा के पते नयं था कि हम कौन टाइप के पंछी हैं और कौन टाइप का भक्ति-भाव हमरा में है? अरे हम तो सूरदास जी के ऊ पंछी जइसन हैं न जे कि बड़ी ऊँची उड़ान भरता है, लेकिन उड़ के कहां तक जा सकता है, सो उड़ने के बाद तो उसको उसी जहाज पर न आना है, जहां से ऊ उड़ा था. से हम भी जहाज पर फिर बैठ गए और खाओ, पियो मौज करो को अपना चरम लक्ष्य बना लिये. जे सब ई बात के नयं समझा ऊ सब बागी और सज़ा के भागी बना.

बर्तानिया का अंग्रेज ब्यापारी सब अपना वाणिज्य- व्यापार को खूब फैलाया. ऊ सब का व्यापार जैसे-जैसे फैला वैसे-वैसे हमरो मौज बढ़ते गया. बर्तानिया के अंग्रेजों ने हमें दुनिया के कोने-कोने में भेजा और देखो कि हमलोग ऊ सबके राज में सुरुज बाबा का चमक अउर तेज हमेशा बनाये रखने को पुरमपुर जोर लगाए रखे. हम भी गदगद और हमारा मालिक भी गदगद.

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तब से जो गदगदायमान हुए सो दिनोंदिन उसमें बढ़ोतरी हुई ही जा रही है, वह बाहर जाने का नाम ही नहीं ले रही और अब अप्पन देश, जे सोने की चिरई रहा है, में तो फुल मस्ती में हैं. ऊ जर्मन बाबा कैसे सोच लिया था कि हम क्रांति कर देंगे. सब कोई वर्गद्रोही हो जायेगा, एकाध गो के दिल- दिमाग गड़बड़ायेगा तो ठीक करे में केतना टाइम लगेगा? ऊ सोचा था कि हमलोग में सम्वेदनशीलता रहेगी और मजूरा लोग से मीठा-मीठा बतिया के क्रांति करवा देंगे और अप्पन जीवन और बाल-बच्चों को रोड मास्टरी करे ला छोड़ देते न.

हमलोग मजूरा लोग के लीड करके क्रांति करके टाइम खराब करने से बेसी बढ़िया सोचे खुदे पांचों उंगली घी में और सिर कड़ाही में काहे न डाल लें और जे कुछ जैसे चल रहा है चलने दें.

हमसे बड़ी लोग ढेरे उम्मीद पाल लिया था, ओकरो में समाजशास्त्री लोग तो औरे ज्यादा. सोंचता है कि हमीं लोग में से न वकील बनता है, मास्टर-प्रोफेसर बनता है, ऑफिसर बनता है, वैज्ञानिक बनता है, पत्रकार बनता है, साहित्यकार बनता है और भी कई गो जो चाहे सो कहो. ये ही से न ऊ एगो राल्फ फॉक्स था आलोचक, जे बताया कि आधुनिक काल में जो एगो नई विधा पैदा हुई है लिखने के लिए और उसका नाम उपन्यास है. ऊ जो है सो मध्यवर्गीय जीवन का महाकाव्य है. महाकाव्य माने बूझे कि नहीं? अरे, उसमें नायक याने हीरो होता है. पहिले हीरो राजा- महाराजा या फिर राजकुमारे सब होता था सो अब नहीं होगा. अब कौनो मध्यवर्गीय घर का बाल-बच्चा हीरो का गुण लेके पैदा होगा और सारी दुनिया को बदल डालेगा.

ऊ कमानेवाला सबको अपने साथ लेगा और क्रांति कर देगा. लेकिन ऊ तो नहीं हुआ, सारा लोग जो क्रांति करने को सोच सकता था, ऊ लोग को अंग्रेजवन पूरी दुनिया में बूंट-मटर की तरह छींट दिया. ई जो छींटा न तो हमलोग अपने-अपने अधिकार के सुख-भोग में ही मगन हो गए, लेकिन जहां जहां हमलोग गए वहां अपन आल-औलाद पैदा कर दिये. एकरे में से कुछ सिरफिरा सब भी पैदा हो गया और होतम-हवातम घर को आग घर के ही चिराग से लग गई और बर्तानिया हुकूमत फिर ब्रिटेन तक ही सिमट कर रह गया लेकिन जौन सभ्यता को फैलाना चाहता था, उसको फैला दिया.

अपने देश में भी जो लोग तनी-मनी पढ़-लिख गया ऊ सबके संगत में वही लोग में से कौनो-कौनो का बाल- बच्चा बागी हो गया और अपनी ही बगिया को उजाड़ने में लग गया. वही बाग-उजाडू सब बर्तानिया वाला लोग के खिलाफ लिखा-पढ़ी करने लगा, घूम-घूम के बताने लगा कि देश का सब माल ई लोग लूट के अप्पन देश ले जा रहा है. लोग भी भड़क गए. सो तो खैर, बर्तानिया वाला सब तनी जब्बर था इसलिए 1947 तक टिकल रह गया और जाते-जाते अप्पन भुअर (भूरा) उत्तराधिकारी सब के राज थमा गया.

जो लोग लड़ा से किनारे और जे वहां मलाई मार रहा था से यहां भी मारते ही रहा. राजकाज हथियाने के बाद भी ऊ सब के ई खतरा सताते रहा कि कभियो ई मध्यवर्ग नाम का प्राणी शासन-प्रशासन के लिए हेडेक बन सकता है. लेकिन एगो बात छूटल जा रहा है. अपने ही यहां 1906 में हमीं लोग का एक ग्रुप ऐसन निकला जो अपने लिए पाक जमीन के तलाश में लग गया और ’47
आते-आते डायरेक्ट एक्शन कर-करा के डेढ़ ईंटा के अपन मस्जिद भी बनाइये लिया.

यहीं एगो बात और कह देते हैं कि हमीं ऊ मध्यवर्ग हैं, जिसको देशभक्ति का एगो अलगे घुट्टी 1925 से पिलाना शुरू किया गया और दुश्मन को भी देखाया गया. काहे से कि बिना दुश्मन के देशभक्ति का मजे नहीं न है. दुश्मन भीतर वाला को भी और बाहर वाला को भी बताया गया. ऊ समय के रोपल बीजा के फल अब चख रहे हैं और पेड़वा भी छतनार हो गया है.खैर, एकर पर आगे कुछ और बताएंगे इसलिए यहां दस्तूर आगे बढ़ने का है.

तो, जे लोग के कुर्सी मिला, ऊ सब जौन बात से डर रहा था वही बात हो गई याने आज़ाद देश का मध्यवर्ग याने हमीं लोग व्यवस्था के हेडेक बन गए. 20-25 बरस होते-होते ई करम जला मध्यवर्ग का कुछ हिस्सा अंगड़ाई लेने लगा और बंगाल में 1967 में डॉक्टरी- इंजीनियरी और कॉलेज की पढ़ाई छोड़ के ढेरे लड़का-लड़की सब सड़क पर उतर गया और गाँव-घर में भ्रमण कर-करके गरीब लोग के भ्रमित भी करने लगा और बंगाले के एगो गाँव नक्सलबाड़ी में क्रांति का बिगुल फुंकवा दिया.

ई सबसे तो सत्ता बड़ी दहशत में में आ गयी, लेकिन कुर्सी पर बैठे वाला माने सत्ता चलावेवाला कम थोडीए न होता है. पांच-सात साल के भीतरे एगो झुरपुट बूढ़ा के आगे करके ‘सम्पूर्ण क्रांति’ का नारा उछाल दिया. ई पर धर्मवीर भारती एगो ‘मुनादी’ कविता भी लिख दिये थे. बड़े – बड़ों को कृष्ण जन्मभूमि में प्रविष्ट करा दिया गया. ऊ घड़ी ढेरे पत्रकार लोग डर के मारे सरकारे के मन-मोताबिक लिखा-पढ़ा, एकाध गो ही ऐसन था जो नहीं माना तो ऊ अंदर भी गया. खैर ’77 में वोट के चोट से सत्ता परिवर्तन हो गया. लेकिन ई ‘सम्पूर्ण क्रांति’ तो ‘सम्पूर्ण भ्रांति’ जल्दीए साबित हो गई. जैसे ’47में गांधी बूढा का कोई नहीं सुना वैसे ही ’77 में जयप्रकाश बुजुर्ग को भी कोई
नहीं लगाया. इस भ्रांति से निकले कई लोग आजो सत्ता की चाशनी में डूबा हुआ है और बाकी अप्पन करम-किस्मत कनेक्शन से डिस्कनेक्ट होकर रो-पिट रहा है.
आज किस्सा-कोताह कुछ दूसरे हो गया है मित्रो, हम मध्यवर्गीय लोग को दुष्मनागी के खेल में मज़ा आने लगा है. और ई दुष्मनागी का खेल खेलाने का सिलसिला तब से बेसी जोर पकड़ा है जब से हाथ में मोबाइल और ऊ भी एंड्रॉयड स्मार्टफोन आ गया है. अब तो देशभक्ति का घुट्टी पिलाना और दुश्मन की शिनाख्त करने में सुबिस्ता होने लगा है.

जब जैसन चाहो देशभक्ति से लबरेज माल पेलो और देशभक्तों की फ़ौज दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ाते जाओ. एतना सारा ऐप्प और सोशल मीडिया का प्लेटफॉर्म की झूठ को सच और सच को झूठ जब जैसा चाहो पेश करो, कोई थोड़ो चेक करता है, बस दे दनादन फॉरवर्ड करो और करते ही जाओ. गांधी, नेहरू, कम्युनिस्ट, मुसलमान, क्रिस्तान से लेकर जिसको जब चाहो बेईमान और देशद्रोही, देशतोड़क साबित कर दो और गांधी के गोली से उड़ावे वाला और अंग्रेजवन से माफ़ी मांगे वाला के सबसे बड़ा देशभक्त बना दो, इतिहास लिखे वाला सबको झुट्ठा बताओ.

ई सूचना-तकनीक को फैलावे वाला एगो टूअर गांधी था, ऊ जब प्रधान सेवक बन गया और कंप्यूटर-कंप्यूटर, टेक्नोलॉजी-टेक्नोलॉजी पुके ले शुरू किया था न तो ओकरो पता नयं था कि मध्यवर्गीय देशभक्त सब ऐसन कर देगा कि ओकर पटिये (पार्टी) बैठ जाएगी. ऊ तो कुम्मर पहले ही न बन गया था टूअर तो बाद में हुआ, अरे नहीं सुने हैं कि ‘माय मरले टूअर और बाप मरले कुम्मर.’ से ही से ऊ टूअर तो ’84 में हुआ. लेकिन ओकरो हमनी पर माने मध्यवर्ग पर बड़ी भरोसा था. जे लोग ओकर साथे था और डुबावे में जोग दिया आज ओही सबके बाल-बच्चा देशभक्ति का गाना गला फाड़-फाड़ के गा रहा है.

अब ई मत पूछियेगा कि देशभक्त होना अच्छा है कि अंधभक्त होना कि प्रधान सेवक का भक्त होना, जे जब कहे तब ताली बजावें, थाली बजावें, दीया बारें और वेतन-भत्ता मिलते रहे, दाल-रोटी खाते रहें, तनी-मनी वेतन उतन कट भी जाय तो फिकिर नहीं, असल काम प्रभु माने प्रधान सेवक का गुण गाते रहना है.मज़दूर चाहे कारखाना में मरे, चाहे रोड पर धक्का खा के मरे, कि गाड़ी-घोड़ा से दब-दबा के,कि भूख से बिलबिला के, हमरा का फरक पड़ता है? एतने नहीं स्कूल-कॉलेज में केकरो बाल-बच्चा पढ़े कि नयं पढ़े, अस्पताल में कुक्कुर सब डेरा डाले हमनी के कोई फरक पड़ता है.

‘अपना काम बनता भांड में जाय जनता.’ हम अप्पन बच्चा सबके तो प्रायभेट में भेज देते हैं और अप्पन इलाज-विलाज भी प्रायभेट में कर-करा लेते हैं. कभी कौनो जमाना में हमको सरकार और ओकर महकमा में कमी-बेसी दिखता था तो बोलते भी थे और कुछ करे खातिर भी सोचते थे लेकिन अब तो सब चकाचक दिखता है आखिर देश का सवाल है तो हम सवाल कैसे और काहे उठावें, हमरा तो मोबाइल टनाटन बजता है. तनियो स्लो होता है तो तड़ से दूसर ले लेते हैं, अरे घर ही मंगवा लेते हैं.
का बढ़िया हिंदू-मुस्लिम का डिबेट टीवी वाला सब चलाता है और चिचिया के जब टिविया पर दाढ़ी वाला सबसे पूछता है ‘नेशन वांट्स टू नो’ आर ऊ सबके फजीहत करता है न तब देख के दिल गार्डन-गार्डन हो जाता है. लेकिन एने तो ई भुक्खड़ मजूरा लोग सब गूढ़-गोबर न कर दिया, यही लोग के कारण हिन्दू- मुसलमान फ़िट होइये नहीं रहा है.

ई मजूरा में हिंदुओ है और मुसलमानो है. ई सबके सले-मटे (चुपचाप) जहां था वहीं रहे के न चाहिये था. ई लोग जब तक रोड पर मरने-चिपाने के लिए नहीं आया था तब तक कैसन सब कुछ जमातियों पर थोप के मज़ा आ रहा था. रोग-बीमारी को भी हिंदू-मुसलमान बना दिये थे कि नहीं! तनी धीरज धरिये ई सब हो-हवा जाने दीजिए फिर से वही खेला होगा, काहे से कि-
‘अपनी मर्ज़ी से कहां अपने सफ़र के हम हैं
रुख हवाओं का जिधर है, उधर के हम हैं.’
(निदा फ़ाज़ली)

 

लेखक का परिचय –

प्राचार्य, रामगढ़ कॉलेज, रामगढ़
एवं
महासचिव, झारखंड प्रगतिशील लेखक संघ
ई-मेल – onlymithilesh@gmail.com
मोबाइल- 7463041969
‌ 7488220675

 

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