Opinion

देश को कहां ले जाने वाली है ये विध्वंसकारी मानसिकता

 

श्रीनिवास वरिष्ठ पत्रकार और चिंतक हैं. समय-समय पर विभिन्न मुद्दों पर उनके आलेख न्यूजविंग में प्रकाशित होते रहे हैं. यह आलेख उनके निजी पत्राचार का हिस्सा है. लेकिन इसमें जो विमर्श है वो निजी नहीं है. इसी नजरिये के साथ इसे यहां प्रकाशित किया जा रहा है. ये पत्र है, लेकिन इसमें एक मुद्दा जेर-ए-बहस है. इस लिहाज से इसका एक शीर्षक भी होना भी होना चाहिये. से इसे एक “आलेखीय” शीर्षक देकर प्रस्तुत किया जा रहा है.

देश को कहां ले जाने वाली है ये विध्वंसकारी मानसिकता

 

Shrinivas

(मेरे एक भैया हैं- अशोक पाण्डेय. अभी अमेरिका में हैं, अपने बच्चों के पास. इसे मैंने उनके एक फेसबुक पोस्ट के जवाब में लिखा था. पर वहां डालने से हिचक गया. पर बात चूंकि निजी होने के बावजूद सार्वजनिक सरोकार से जुड़ी है, इसलिए यहां शेयर कर रहा हूं. थोडा लंबा हो गया है. पर उम्मीद है, कुछ कद्रदान पढ़ने का कष्ट कर ही लेंगे.)

 

भैया, प्रणाम!

 

26 नवंबर की रात आपने किसी मोदी भक्त का एक पोस्ट शेयर किया था, जिसमें शाहरुख़ खान की आनेवाली फिल्म के बहिष्कार की अपील की गयी है. मैंने उसी रात अपनी त्वरित प्रतिक्रिया व्यक्त कर दी थी. फिर भी मन बेचैन रहा, यह सोच कर कि आप कैसे इस उत्तेजना में बह गये. बाद में लगा, शायद आप खुद मोदी मुरीदों में शामिल हो गये हैं. फिर भी, कल्पना कीजिये कि अभिषेक बच्चन, ऋतिक रोशन या अन्य किसी हिंदू अभिनेता के वैसे ही बयान पर उनके खिलाफ ऐसा ही अभियान चलता? क्या उन्हें भी गद्दार कहा जाता?

निश्चय ही नहीं. तो क्या भारत के किसी मुस्लिम (वह लेखक हो, कलाकार हो या नेता) को अपनी बात- जो आपकी या किसी की राय में गलत हो सकती है- कहने का अधिकार नहीं है? एक जैसी ही बात कोई हिंदू बोले या मुसलमान बोले, उस पर इतनी भिन्न प्रतिक्रिया? क्या शाहरुख़ (या अब आम़िर खान) से एक तरह से यह नहीं कहा जा रहा है कि भारत में रहना है, तो ‘औकात’ में रहो? और सोचिये कि क्या देश में हमेशा से उनके (मुसलमानों के) प्रति एक संदेह और द्वेष का भाव नहीं रहा है? हमारे शहरों में कितने मकान मालिक किसी मुस्लिम परिवार को किराये पर रखने को तैयार रहते हैं? या मुस्लिम मोहल्ले में घर खोजते हैं?

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बेशक इस स्थिति के ऐतिहासिक कारण भी हैं. भारत विभाजन के बाद स्थिति और बिगड़ी है. और किसी भी दल ने हालत को बदलने का ईमानदार प्रयास नहीं किया है. माना कि कुछ दलों ने वोट के लिए भी मुस्लिम समाज के उदार तत्वों के बजाय फैनेटिक मुस्लिम नेताओं को बढ़ावा दिया है, कि वे मुस्लिम साम्प्रदायिकता के खिलाफ बोलने से बचते और हिचकते रहे हैं. मगर संघ जमात ने भी उन्हें डराने के अलावा क्या किया है? सीधे पूछें तो क्या भाजपा एक (संकीर्ण) हिंदू पार्टी और आरएसएस पूरी तरह एक हिंदू संगठन नहीं है? आप पूछेंगे, इसमें हर्ज क्या है? कोई हर्ज नहीं है, मगर ईमानदारी से इस बात को स्वीकार तो कीजिये, बजाय इसके कि आप मंच से ‘सबका साथ, सबका विकास’ जैसी नकली बात बोलते रहें. तब इसे खुल कर स्वीकार करना और भी जरूरी हो जाता है, जब इस जमात के लोग आये दिन उल्टे सीधे बयान देकर माहौल को बिगाड़ने में लगे हुए हैं.

 

ये ‘हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान’ और ‘भारत में यदि रहना है, तो बंदे मातरम गाना होगा’ जैसे नारे लगायेंगे और उम्मीद करेंगे कि वे इन्हें अपना हितैषी मान लें! भारत माता की तस्वीर ठीक ‘मां दुर्गा’ जैसी बनायेंगे और उम्मीद करेंगे कि सभी आपकी तरह उसकी ‘पूजा’ करें! क्या इस जमात के लोग लगातार हिंदुओं को असहिष्णु व आक्रामक बनाने का ही प्रयास नहीं करते रहते हैं?

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भारत का हिंदू समाज बेशक सहिष्णु है. लेकिन इसका क्रेडिट संघ या भाजपा को नहीं दिया जा सकता. इन लोगों को तो दरअसल हिंदू समाज का इतना सहिष्णु होना ही अखरता है. ये तो हिंदुओं को भी ‘मुसलिमों-जैसा’ (जैसा ये कहते और मानते हैं और जिसमें, मेरे खयाल से, किंचित सच भी है) कट्टर और असहिष्णु बनाना चाहते हैं, जिसके लिए खुद मुसलिमों की आलोचना करते हैं.

 

क्या आपको नहीं लगता कि  ’92 के अयोध्या काण्ड और फिर 2002 के गुजरात दंगों के बाद भारत में सम्प्रदायिक ध्रुवीकरण गहरा हुआ है, कि हिंदू समाज ज्यादा असहिष्णु हुआ है? क्या इसके लिए सिर्फ कांग्रेस, वामपंथी और मुस्लिम कट्टरपंथी जवाबदेह हैं, संघ की इसमें कोई भूमिका नहीं रही है? भाजपा को असल में कष्ट तो इस बात से है कि उसके तमाम प्रयासों के बावजूद यहां का हिंदू वैसा नहीं बन पाया है, जैसा वह चाहती है. इसका एक कारण तो भारत या हिंदू समाज की उदार परंपरा है, दूसरा बड़ा कारण हिंदू समाज का ऊंच-नीच में बंटा होना भी है. लेकिन ये लोग ऊंच-नीच का भेदभाव मिटाने का जरूरी प्रयास करने के बजाय संकीर्ण धार्मिक भावनाएं उभार कर, अल्पसंख्यकों, खास कर मुसलमानों के प्रति दुश्मनी का भाव जगा कर हिंदुओं को एक करना चाहते हैं!

 

धर्म किसी देश की एकता का आधार नहीं हो सकता, यह बात तो इतने सारे मुस्लिम और ईसाई देशों के वजूद से ही सिद्ध है. फिर इसलाम के नाम पर बने पाकिस्तान की टूट (अपने जन्म या गठन के महज 24 साल बाथ) से तो यह आईने की तरह साफ़ है. फिर भी ये लोग ‘हिंदू राष्ट्र’ की रट लगाये हुए हैं! इससे क्या समझा जाये?

और यह तो आपको मालूम ही होगा कि भारत में ‘हिंदू और मुसलमान दो अलग अलग राष्ट्र’ हैं, यह बात सबसे पहले इनके ‘वीर’ सावरकर ने ही कही थी. इस जमात की नजर में इस महान स्वतंत्रता सेनानी और ने आजादी के बहुत पहले यह भी कहा था कि मुसलमानों को इस देश में रहना है, तो दोयम दर्जे का नागरिक बन कर रहना होगा. ऐसे में यदि जिन्ना और मुस्लिम लीग ने मुसलमानों के लिए अलग देश की मांग कर दी, तो क्या इसके लिए सावरकर और उनके विचारों के समर्थक भी जिम्मेवार नहीं माने जाने चाहिए? क्या आज भी संघ प्रशिक्षित नेता और राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद पर आसीन लोग भी वही भाषा नहीं बोल रहे? दाभोलकर, पानसरे और कलबुर्गी की हत्या कहीं भी हुई हो, पर तीनों की हत्या में हिंदू अतिवादियों का हाथ रहा है, क्या यह सच नहीं है?

चुनाव जीतने के लिए गाय के इस्तेमाल में भी आपको कुछ गलत नहीं लगता? साक्षी महाराज, योगी आदित्यनाथ, साध्वी प्राची, तोगड़िया और गिरिराज सिंह जैसों की वाणी सुन कर भी आपको लगता है कि देश में असहिष्णुता का कोई माहौल नहीं है, तो फिर मुझे कुछ नहीं कहना. मगर इतनी नफरत भी ठीक नहीं है भैया. इससे व्यक्ति के अंदर सिर्फ जहर भरता जाता है, जो अंततः उसके लिए भी नुकसानदेह होता है.

 

बड़े दुख के साथ कह रहा हूं कि बचपन से बड़े होने तक कई मायनों में आपको मैं आईडियल मानता रहा हूं. जिंदादिल, कन्फिडेंट, उत्साह से भरपूर और आधुनिक. आज आपका यह रूप देख कर निराशा हो रही है. मगर बदलाव तो प्रकृति का नियम है. अतः उम्मीद करता रहूंगा कि आप फिर बदलेंगे, इस बार सकारात्मक दिशा में.

 

मैं तो आपलोगों की नजर में बहुत पहले से ‘बिगड़ा’ हुआ हूं. हालांकि मैं भी बदलने के लिए हमेशा तैयार रहता हूं, बशर्ते कि कोई अपने तर्कों से कनविंस कर दे. और हां, वैचारिक बहस में अक्सर उम्र और रिश्ते का लिहाज नहीं रख पाता. इसके लिए क्षमा. शायद जीवन में पहली बार आपको इस तरह संबोधित किया है. आमने-सामने होते, तो और जम कर बात होती. आप जवाब देंगे, चाहे कितना भी तीखा, तो अच्छा लगेगा. लगता है, फेसबुक इस तरह की चर्चा के लिए बहुत सही मंच नहीं है. इसलिए भी कि हम किसी को इसे पढ़ने से रोक नहीं सकते. वैसे मुझे इससे फर्क नहीं पड़ता है.

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अंत में इतना ही कहूंगा कि शाहरुख़ और आम़िर की फिल्म का बहिष्कार करने की अपील में शामिल होकर आप एक खतरा मोल ले रहे हैं. मान लीजिये, इस अपील के बाद भी फिल्म हिट हो जाये तो? क्या आप उन सारे दर्शकों को भी गद्दार और देशद्रोही घोषित कर देंगे? कुछ लोग किसी कलाकार के फैन जरूर होते हैं, पर सामान्य दर्शक तो मनोरंजन के लिए ही फिल्म देखता है. इसी आधार पर उसे पसंद या नापसंद करता है. और इन्हीं के कारण फ़िल्में फ्लाप या हिट होती हैं. बड़े बड़े स्टार- शाहरुख़, आम़िर, सलमान और अमिताभ से लेकर राज कपूर और दिलीप कुमार तक- की फ़िल्में फ्लाप हुई हैं. मुझे यकीन है कि इनकी फिल्में फ्लाप होंगी भी, तो अपने कारणों से, आप जैसों की अपील या बद्दुआ के कारण नहीं.

(नोट- लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं)

 

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