Opinion

राहुल, अखिलेश और तेजस्वी अपनी आत्मघाती प्रवृत्ति से कब बाहर आयेंगे

Faisal Anurag

राहुल गांधी, तेजस्वी यादव और अखिलेश यादव लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद अखिर बेरूखी से क्या साबित करना चाहते हैं. उनकी उदासीनता का सबब उन की पार्टियों के लिए घातक साबित हो रहा है. क्या यह मान लेना चाहिए कि इन नेताओं को खुद की क्षमता पर ही भरोसा नहीं है या फिर वे वर्तमान परिप्रेक्ष्य को समझ नहीं पा रहे हैं. चुनाव अभियान के दौरान इन तीनों की उम्मीदें परवान पर थीं.

और तीनों ने अपने दलों और गठबंधन के लिए जबरदसत मेहनत की थी. लेकिन परिणाम बेहद निराशाजनक रहा है. माना जा रहा था कि परिणामों के गंभीर मूल्यांकन के बाद ये नेता नयी रणनीति बनायेंगे और विपक्ष की हैसियत से अपनी प्रासंगिकता साबित करेंगे. इन तीनों नेताओं ने चुनाव अभियान के दौरान लोकतंत्र और संविधान पर खतरे को ले कर अपनी चिंता व्यक्त की थी.

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राहुल गांधी ने इस्तीफा देने के बाद यह उम्मीद पैदा की थी कि वह नया कुछ करना चाहते हैं. लेकिन वैकल्पिक व्यवस्था किये बगैर जिस तरह का रूख अपनाया है, उसकी कीमत कांग्रेस के प्रतिबद्ध कार्यकर्ता चुका रहे हैं. बेरूखी का ही आलम है कि महाराष्ट्र में पार्टी कई बड़े नेता पाला बदल चुके हैं. कर्नाटक में सरकार गिर चुकी है और कांग्रेस में भारी बिखराव के संकेत मिल रहे हैं.

कांग्रेस के मठाधीश नेता जिस प्रवृति का इजहार कर रहे हैं, इससे जाहिर होता है कि वे केवल अपने भविष्य के लिए चिंतित हैं. पार्टी का भविष्य उनकी प्राथमिकता में है ही नहीं. पार्टी कार्यकर्ताओं को उत्साहित करने वाला न तो उनके पास कोई राजनीतिक एजेंडा है ओर न ही नजरिया.

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दूसरी ओर कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की मायूसी लगातार बढ़ती जा रही है. दिशाहीनता का इस तरह का दौर कांग्रेस के इतिहास में कभी नहीं आया है. नेतृत्व अपने न केवल दायित्व से पलायन करता हुआ दिखा है, बल्कि 12 करोड़ की संख्या वाले वे मतदाता जिन्होंने कांग्रेस के लिए वोट किया है, ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं. कांग्रेस के मठाधीश एक दूसरे को कमजोर करने के लिए नेतृत्व का मसला हल ही नहीं करना चाहते.

और न तो सोनिया गांधी और न ही राहुल गांधी इस हालात को बदलते हुए दिख रहे हें. प्रियंका गांधी ने जरूर सोनभद्र की यात्रा कर पार्टी के कर्याकताओं को संघर्ष का संदेश दिया है. उनकी गिरफतारी को भी कांग्रेस के मठाधीश नेता पार्टी में जान फूंकने वाला कारक नहीं बना पाये.

दरअसल 2019 के लोकसभा चुनाव का जनादेश मतदाओं में आंतरिक मनोविज्ञान में आये बदलाव का ही संकेत देता है. इसकी तुलना न तो 1971 के चुनाव से की जा सकती है और न ही 1984 के चुनाव से. बावजूद 1984 के चुनाव की तुलना मनोविज्ञान के कुछ तत्वों से की जा सकती है. राजनीति जब चुनाव विश्लेषण और मूल्यंकन करती है तो वह चलताऊ जुमला ही इस्तेमाल करती है. कांग्रेस सहित विपक्ष के सभी दलों में इसी नजरिये से चुनाव परिणाम को देखा है. जो उनके लिए आत्मघाती कदम ही माना जायेगा.

राहुल गांधी की भूमिका कांग्रेस के लिए आत्मघाती कदम है. कांग्रेस में न तो सामूहिक नेतृत्व को विकसित करने का हुनर शेष है और न ही कोई ऐसा नेता है जिसकी देशव्यापी पहचान या प्रभाव हो. इस संकट का कारण गांधी परिवार के प्रति निर्भरता है. पूर्व कांग्रेसी नटवर सिंह ने ठीक ही कहा है कि कांग्रेस के किसी भी गैर-गांधी नेतृत्व में पार्टी को एक रखने की क्षमता नहीं है.

उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि गैर-गांधी परिवार अध्यक्ष होते ही 48 घंटे के अंदर पार्टी कई गुटों में बिखर जायेगी. सीताराम केसरी के अध्यक्ष होने के बाद कांग्रेस 15 पार्टियों में बंट गयी थी. सोनिया गांधी ने बिखरे हुए कांग्रेस को अध्यक्ष बनने के बाद समेटा था.

2019 का कांग्रेस संकट नायाब है. इतिहास के किसी भी दौर से इसकी तुलना नहीं की जा सकती है. इंदिरा गांधी ने कांग्रेस तोड़ कर भी असली कांग्रेस को बनाये रखा था. अलग हुए कांग्रेसियों की घर वापसी हुई. तो क्या कांग्रेस अपनी मृत्यु का अंतिम संदेश लिख रही है. वैसे राजनीति में किसी भी राजनीतिक विचारधारा के मौत की घोषणा नहीं की जानी चाहिए. लेकिन ब्रिटेन की ताकतवर पार्टी लिबरल पार्टी जिस तरह हाशिये पर सिमटी, उससे कई तरह का सबक सीखा जा सकता है. राहुल गांधी ने गुजरात विधानसभा चुनाव के बाद अपनी एक बड़ी छवि का निर्माण किया था. वर्तमान घटनाक्रम बता रहा है कि वे एक स्वपीड़क की तरह व्यवहार कर रहे हैं.

बिहार में राजद को भी इसी तरह के हालात से गुजरते हुए देखा जा रहा है. नीतीश कुमार राजद को तोड़ने का हर संभव प्रयास कर रहे हैं. राजद के अनेक नेता तेजस्वी के नेतृत्च में अपना राजनीतिक भविष्य सुरक्षित नहीं देख रहे हैं. अभी तक तो कोई बड़ी नारजगी नहीं दिखी है.

लेकिन पार्टी के नेता और कार्यकर्ता हताश दिख रहे हैं. लालू प्रसाद के जेल जाने के बाद तेजस्वी राजद को एक रखने में कामयाब हुए हैं. और अपनी नेतृत्व क्षमता को भी साबित किया है. लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद उनके रूख ने पार्टी की भावी संभावनाओं पर सवाल खड़ा किया है. राजद के कोर वोट आधार में भाजपा और जदयू सेंध लगा चुके हैं.

भाजपा की कोशिश लालू  प्रसाद के वोट आधार को ही नष्ट करने की है. विपक्षी नेता और पार्टी की हैसियत से राजद चुनाव के बाद हताश दिख रहा है. ऐसा लगता है कि लालू परिवार में सबकुछ ठीक नहीं है. और बिहार के मतदाओं के मनोविज्ञान के अनुकूल कोर ताकतों को भी बांधे रखने की नेतृत्व की क्षमता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं.   विधानसभा चुनाव अगले साल होने हैं.

राजद विरोधी दल जहां उसे ध्यान में रख कर अपनी राजनीतिक गतिविधियों को अंजाम दे रहे हैं वहीं राजद न तो एक पार्टी के बतौर न ही गठबंधन नेता के बतौर कारगर भूमिका निभाता दिखायी दे रहा है. राजद यह मानने को तैयार ही नहीं दिख रहा है कि सामाजिक न्याय आंदोलन को नया संदर्भ और संघर्ष दिये बगैर उनकी प्रासंगिकता भविष्य के लिए सुरक्षित नहीं है.

क्मोबेश यही संकट अखिलेश यादव का भी है. अखिलेश ने चुनाव के दौरान खूब मेहनत की थी. लेकिन गठबंधन की नाकायाबी के बाद उनका रूख बेहद निराशा जनक है.

तो क्या राहुल, अखिलेश और तेजस्वी आत्मघाती प्रवृति से बाहर आ सकेंगे. यह बेहद जटिल और संजीदा सवाल है. इसी सवाल का जवाब इन दलों का भविष्य तय करेगा.

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