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जब वाजपेयी ने पत्र में लिखा, “काल चक्र की गति विचित्र है, हमारा अधिकार कर्म पर है, फल पर नहीं”

वाजपेयी ने गिरिडीह के साहित्यकार भरत मिश्र को 1985 में लिखा था पत्र

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Giridih : गिरिडीह के साहित्यकार भरत कुमार मिश्र आज भी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की यादों को संजोये हुए हैं. वाजपेयी ने भरत मिश्र को दो फरवरी 1985 को पत्र लिखा था. पत्र बड़े ही तार्किक अंदाज में लिखा हुआ था. इसमें ऊर्जा और नये जोश के साथ काम करने की प्रेरणा भी है. यह पत्र वाजपेयी ने उस कालखंड में लिखा था, जब वह चुनाव में सफल नहीं रहे थे.

जब वाजपेयी ने पत्र में लिखा, "काल चक्र की गति विचित्र है, हमारा अधिकार कर्म पर है, फल पर नहीं"
भरत कुमार मिश्र.

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वाजपेयी ने क्या लिखा था पत्र में

प्रिय भरत, सप्रेम नमस्ते, तुम्हारा 31 दिसंबर का पत्र सामने है. व्यस्तता के कारण उत्तर में विलंब हुआ. कालचक्र की गति विचित्र है. हमारा अधिकार कर्म पर है, फल पर नहीं. तुमने ठीक लिखा है, हमें वक्त का मिजाज बदलने का प्रयत्न करना है. इसके साथ ही वाजपेयी ने पत्र में भरत को नववर्ष की शुभकामनाएं भी दी थीं.

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छात्र जीवन में लिखे थे पत्र : भरत

भरत कुमार मिश्र ने बताया, “वाजपेयी जी ने मेरे छात्र जीवन के समय पत्र लिखा था. पत्राचार होता रहता था. वाजपेयी जी भी जवाब देते रहते थे. उन्होंने समय का महत्व और समय पर परिवर्तन के बारे में लिखा था. इस पत्राचार से राजनीतिज्ञों को सीख लेनी चाहिए, जहां हर व्यक्ति महत्वपूर्ण है. सभी के विचार का आदर किया जाना चाहिए. राजनेता आमजनों के लिए सर्वसुलभ हों.” उन्होंने कहा कि आज प्रधानमंत्री से अप्वॉइंटमेंट लेने में साल बीत जाता है, लेकिन प्रधानमंत्री वाजपेयी के काल में 15 दिन में ही अप्वॉइंटमेंट मिल जाता था.

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