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कदमों ने साथ छोड़ा, तो कलम पकड़कर तय किया हजारों दिलों तक पहुंचने का सफर

मिलिये युवा लेखिका स्वाति उर्फ किक्की सिंह से, जिन्होंने अपनी दिव्यांगता को अपने सपनों पर नहीं होने दिया हावी, छोटी-मोटी कविताएं और बाल कहानियां लिखते-लिखते बन गयीं उपन्यासकार

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  • महज 23 साल की उम्र में लिख डाला उपन्यास, देशभर में अब तक 3000 कॉपियां बिक चुकी हैं ‘शादी का सपना’ की

Chhaya

Ranchi : वह चल नहीं पाती. व्हील चेयर का इस्तेमाल करती है. लेकिन, माथे पर तनिक भी शिकन नहीं कि वह दिव्यांग है. चेहरे पर हमेशा मुस्कुराहट रहती है, जो दूसरों को भी आशावादी बना दे. ऐसी हैं युवा लेखिका स्वाति उर्फ किक्की सिंह. उन्होंने अपनी दिव्यांगता को कभी भी खुद पर हावी नहीं होने दिया. महज 23 साल की उम्र में उन्होंने ‘शादी का सपना’ नामक उपन्यास लिखा. साल 2017 में उपन्यास को बाजार में उतारा गया, जिसकी अब तक तीन हजार कॉपियां देशभर में बिक चुकी हैं. स्वाति का जन्म 1995 में गाजियाबाद में हुआ था. माता-पिता की पहली बच्ची होने के कारण स्वाति के जन्म पर खुशियां खूब मनी. लेकिन, जब स्वाति के पैर में समस्या की बात परिवारवालों को पता चली, तो मायूसी-सी छा गयी. फिर भी स्वाति के माता-पिता ने स्वाति को उच्च शिक्षा देने की सोची और कक्षा छह तक स्वाति की पढ़ाई गाजियाबाद के एयरफोर्स स्कूल से करायी. उसके बाद की पढ़ाई स्वाति ने रांची आने के बाद प्राइवेट से की.

कविताओं और बाल कहानियों से हुई शुरुआत

स्वाति ने नौ साल की उम्र से ही लिखना शुरू कर दिया. तब वह बाल पत्रिकाओं के लिए बाल कविताएं और कहानियां लिखा करती थीं. पत्र-पत्रिकाओं में लिखते हुए कई बार लखनऊ, दिल्ली समेत अन्य शहरों में बाल लेखक के रूप में इन्हें सम्मानित किया गया. उन्होंने बताया कि कई रेडियो कार्यक्रमों में भी वह शामिल हुई हैं और पुरस्कृत भी हुई हैं.

2015 में लिखना शुरू किया उपन्यास

स्वाति ने बताया कि उन्होंने साल 2015 में उपन्यास लिखना शुरू किया, जिसे 2017 में बाजार में लाया गया. उन्होंने कहा कि बाल कहानियां और छोटे-मोटे आलेख लिखते-लिखते अचानक से उपन्यास लिखना काफी बड़ी बात थी, क्योंकि उसके लिए उतनी जानकारी भी चाहिए होती है. उन्होंने कहा कि मां के कहने पर उपन्यास लिखना शुरू तो किया, लेकिन थोड़ी हिचक भी थी. लेकिन, किताब की सफलता देखते हुए अब लगता है कि कलम और मजबूत करूं.

साहित्य सारथी सम्मान से हैं सम्मानित

साल 2017 में स्वाति को साहित्य सारथी सम्मान से पुरस्कृत किया गया. इसके साथ ही कई पत्र-पत्रिकाओं की ओर से भी इन्हें सम्मानित किया जा चुका है.

चल नहीं सकती हूं, पर लोगों तक पहुंच सकती हूं

अपने बारे में बताते हुए स्वाति ने कहा, “पैर से नहीं चल पाने के कारण जिंदगी में कुछ न करूं, यह जिंदगी जीना नहीं, बल्कि जिंदगी बर्बाद करना है. भले ही पैर से चल न पाऊं पर लोगों के दिलों तक अपनी लेखनी के माध्यम से पहुंच सकती हूं. ऐसे भी पढ़ाई-लिखाई घर से हुई है. लेकिन, अब बाहर निकलना है, दुनिया को समझना है.”

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