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जब हिटलर के सामने भारतीय खिलाड़ियों ने खेली कबड्डी

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New Delhi : क्या आपको पता है कि अमरावती के एक छोटे से क्लब ने 1936 में बर्लिन ओलंपिक के समय जर्मनी के तत्कालीन शासक एडोल्फ हिटलर के सामने कबड्डी खेली थी या फिर महात्मा गांधी ने भारत के इस जमीनी खेल के फायदे बताते हुए लेख लिखा था.लेखक विवेक चौधरी की किताब‘‘कबड्डी बाई नेचर’’ में कुछ ऐसे ही दिलचस्प किस्से हैं.

किताब में इस बात का भी जिक्र है कि कैसे गांव का खेल माने जाने वाले कबड्डी ने शहरों में अपनी पहचान बनायी और मिट्टी के मैदान पर खेले जाने वाला यह खेल इनडोर वातानुकूलित स्टेडियम तक पहुंचा. इसके दर्शकों में बड़े व्यपारियों के साथ बालीवुड के सितारें भी शामिल हैं. भारतीय खेलों में खिलाड़ियों की नीलामी की बात करें तो क्रिकेट के बाद सबसे ज्यादा करोड़पति इस खेल से ही बने हैं.

30 खिलाड़ियों को बर्लिन की यात्रा पर गये थे

किताब में बताया गया है कि 1936 में अमरावती के जाने-माने क्लब हनुमान व्यायाम प्रसारक मंडल (एचवीपीएम) ने लगभग 30 खिलाड़ियों को बर्लिन की यात्रा के लिये भेजा. इन खिलाड़ियों को कबड्डी, मल्लखम्भ और दूसरे पारंपरिक भारतीय खेलों का प्रदर्शन करना था जो ओलंपिक खेलों का हिस्सा नहीं थे.
इस दौरे पर टीम के साथ पत्रकार वीबी कप्तान भी गये थे. यह दौरा एचवीपीएम के उपाध्यक्ष सिद्धांत काने की पहल से संभव हुआ था जो भारतीय खेलों से दुनिया को रूबरू करवाना चाहते थे.

शहर के विश्वविद्यालय मैदान पर 40 मिनट का मैच खेला गया

किताब के मुताबिक, ‘‘शहर के विश्वविद्यालय मैदान पर 40 मिनट का मैच खेला गया, जिसमें बड़ी संख्या में दर्शक पहुंचे. यह इतना लोकप्रिय हुआ कि पहले मैच के खत्म होने के बाद तुरंत दूसरा और फिर तीसरा मैच खेला गया. व्यवस्था को सुचारू बनाये रखने के लिए वहां मौजूद सुरक्षाकर्मियों को मैदान के आस पास लगाया गया था. दर्शकों की बड़ी संख्या के कारण कैमरामैन और इस खेल की रिकार्डिेंग करने वालों को भी कैमरा लगाने के लिए काफी परेशानी का सामना करना पड़ा.’’

हिटलर काने से मिले और उन्हें ‘हिटलर मेडल’ भी दिया

इस मैच के बाद हिटलर काने से मिले और उन्हें ‘हिटलर मेडल’ भी दिया. जिसके प्रशस्ति पत्र पर लिखा था, ‘‘यह पदक 1936 में बर्लिन ओलंपिक में दी गयी सेवा के लिए दिया जा रहा है. यह सम्मान काने को दिया जा रहा है.’’ राष्ट्रपिता महात्मा गांधी दिसंबर 1926 में जब अमरावती पहुंचे, तो वह यहां के युवाओं को कबड्डी खेलते देख काफी प्रभावित हुए. वह इस बात को लेकर काफी खुश थे कि जाति का बंधन तोड़ युवा ना सिर्फ इस खेल का लुत्फ उठा रहे थे बल्कि वे साथ में खाना भी खा रहे थे.

 

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