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जब गुलजार से निदा फाजली पर बोलने कहा गया…

Hari Mridul

एक बार मैंने गुलजार साहब से पूछा था कि आप अपने समकालीन किस गीतकार पर गहरी नजर रखते हैं, तो उन्होंने जवाब दिया- निदा फाजली. लेकिन उन्होंने काफी कम काम किया है. निःसंदेह वह कमाल के शायर हैं, लेकिन उन्हें फिल्मों से दूरी नहीं बनानी चाहिए. बाद में ‘कम काम’ वाला सवाल मैंने निदा साहब से किया, तो उन्होंने जो दो टूक जवाब दिया, वह फिल्मी दुनिया का एक सच है और हैरत में डालने वाला है.

यह मेरा नसीब है कि मैंने निदा साहब जैसे कालजयी शायर को साहित्य सृजन करते देखा है. कितनी ही बार नज्म की पंक्तियां काटते-जोड़ते, फिर उन्हें पढ़ते-गुनगुनाते और आश्वस्त होने पर कि अब यह पूर्ण हो चुकी है, उन्हें खूब उल्लास में देखा है. उनके कई शेर मेरे सामने आमद हुए हैं.

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उनकी कुछ गजलों के प्रथम श्रोताओं में एक मैं भी रहा हूं. जब वह खार डांडा के अमर अपार्टमेंट वाले फ्लैट में रहते थे, तब भी उन्हें साहित्य साधना में लीन देखा और जब वह वर्सोवा सनराइज अपार्टमेंट में रहने आ गए, तब भी उन्हें रचनारत देखा. हालांकि ऐसा सौभाग्य सिर्फ मुझे ही प्राप्त नहीं हुआ है, निदा साहब के कितने ही करीबियों को यह सुख मिला है.

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उनका यह कहना अभी तक याद है, ‘हम तो एक दिन चले जाएंगे, लेकिन रचना बची रहेगी- अगर उसमें आम इंसान की बात होगी. उसमें लोगों के दुख-दर्द, उल्लास और खुशियां समाहित होंगे. उसमें शुभ की आकांक्षा होगी और अन्याय का विरोध होगा….’

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निदा फाजली साहब में हिंदी और उर्दू का कोई भेद नहीं था. यही वजह है कि वह हमेशा ही इन दो भाषाओं के बीच एक पुल की तरह रहे. दोनों ही भाषाओं और रचनाकारों के बीच उन्होंने समान रूप से लोकप्रियता भी पाई. हिंदी की बात करूं, तो उन्हें कबीर, तुलसी, सूर और मीरा बहुत प्रिय थे. निराला, मुक्तिबोध, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, धर्मवीर भारती से लेकर नरेश सक्सेना, सूर्यभानु गुप्त, धूमिल, गोरख पांडे, मंगलेश डबराल, वीरेन डंगवाल, अरुण कमल, राजेश जोशी, उदय प्रकाश और देवी प्रसाद मिश्र की कविताओं की वह अक्सर चर्चा करते थे.

भारतीय कवियों में रवींद्रनाथ ठाकुर, नजरूल इस्लाम, कुसुमाग्रज, नारायण सुर्वे, सुरजीत पातर, पाश आदि को पसंद करते थे. विश्व कविता में पाब्लो नेरुदा, नाजिम हिकमत, ब्रेख्त, विस्साव शिंबोर्स्का आदि के बड़े प्रशंसक थे. उर्दू साहित्य के तो खैर वह अध्येता ही थे.

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निदा साहब जैसे यारबाश भी विरले ही होते हैं. उनका व्यक्तित्व ही ऐसा था, सबसे अलग. खिलंदड़ा. दोस्ती करने पर आएं, तो किसी नादान बालक के साथ भी घंटों गुजार दें और सबक सिखाने में आएं, तो बड़े से बड़े तुर्रम खां को भी जता दें कि भाई, तू आखिर है क्या…! कई बार ऐसे मौके भी आए, जब उनकी टेबल पर हवाई जहाज के टिकट फड़फड़ाते रह गए और वह आयोजकों के बारंबार बुलाने पर भी नहीं गए, तो नहीं ही गए.

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मुझे वे दिन याद आ रहे हैं, जब वह फिल्म ‘सरफरोश’ के लिए अपनी मशहूर गजल ‘होश वालों को खबर क्या, बेखुदी क्या चीज है…’ लिख रहे थे. मैंने उन्हें एक मासूम सा सवाल किया था कि निदा साहब, आपका फिल्मों में भी अनूठा काम है, लेकिन आपके हिस्से इतने कम गीत क्यों हैं? उन्होंने मुस्कराते हुए जवाब दिया था, ‘इसलिए कि मैं फील्डिंग नहीं करता. जो काम घर बैठे मिलता है, वही करता हूं.’

(हरि मृदुल का यह संस्मरण उनके फेसबुक वाल से लिया गया है)

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