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83 साल पुरानी बरवाडीह-अंबिकापुर रेललाइन प्रोजेक्ट कब होगी शुरू?

Dilip Kumar

Sanjeevani

Palamu : 83 साल पहले शुरू हुई बरवाडीह-अंबिकापुर रेललाइन प्रोजेक्ट आखिर कब पूरी होगी, यह सवाल लगातार उठता रहा है. हर चुनाव में इसे मुद्दा बनाया जाता रहा है. लेकिन तीन चार बार सर्वे होने के बावजूद इस पर निर्माण कार्य शुरू नहीं कराया जा सका.

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वर्ष 1935-36 में ब्रिटिश सरकार ने इस रेललाइन की योजना बनायी थी. 1940-41 से काम शुरू हुआ और 1946 तक चला.

बरवाडीह से छत्तीसगढ़ के बलरामपुर के सरनाडीह तक अर्थवर्क का काम पूरा करा लिया गया था. चनान, कन्हर नदी पर पुल निर्माण के लिए खंभे भी लगा दिये गये थे. लेकिन आजादी से पहले ही काम बंद कर दिया गया. इसके बाद लगातार इस रेललाइन का निर्माण पूरा करने की मांग की जाती रही है.

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पूरा होगा सांसद का वादा? 

पलामू के सांसद विष्णुदयाल राम ने वर्ष 2014 का चुनाव जीतने के बाद वादा किया था कि वे बरसों से लटकी बरवाडीह-अंबिकापुर रेललाइन परियोजना पर काम शुरू करने की मांग संसद में उठायेंगे. उन्होंने लोकसभा में इस लंबित परियोजना को शीघ्र स्वीकृति देने की आवाज बुलंद भी की थी.

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव के क्रम में अपने चुनावी अभियान में उन्होंने घोषणा की थी कि बरवाडीह-अंबिकापुर-चिरमिरी रेललाइन का निर्माण कराना उनकी प्राथमिकता है जिसके लिए वे अन्य सांसदों से भी सहयोग लेंगे.

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क्या है यह रेल परियोजना?

चिरमिरी और अंबिकापुर के बीच रेललाइन बिछ चुकी है और ट्रेनों का आवागमन भी जारी है. अब बरवाडीह से अंबिकापुर तक 135 किलोमीटर की रेललाइन बनानी है. अंबिकापुर से राजपुर 40 किलोमीटर,  यहां से बलरामपुर (सरनाडीह) 40 किलोमीटर, रामनगर 10 किलोमीटर, बड़गढ़ 15 किलोमीटर, कुटकु 10 किलोमीटर और कुटमु से बरवाडीह 10 किलोमीटर है.

इस लाइन का चार बार रेलमंत्रालय सर्वेक्षण करा चुका है. बरवाडीह का इलाका चतरा लोकसभा क्षेत्र में है. चतरा के पूर्व सांसद इंदर सिंह नामधारी व वर्तमान सांसद सुनील सिंह भी काफी जोर आजमाइश कर चुके हैं. किन्तु रेलमंत्री के आश्वासनों के सिवा कुछ हासिल नहीं हो सका. 

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अंग्रेज सरकार ने की थी पहल 

इस रेल लाइन का प्रस्ताव अंग्रेज सरकार के समय सन् 1935 में आया था. सेना मुख्यालय कलकता से बंबई के लिए ऐसे रेलपथ की खोज की गयी जो कम समय में कलकता को बंबई से जोड़ सके और दूरी भी कम हो.

ब्रिटिश सरकार ने इस योजना पर काम शुरू करने के लिए सभी औपचारिकताएं पूर्ण कर लीं. काम भी शुरू हो गया. सरकार जल्दी में थी. इस मार्ग से कोलकाता से मुंबई की दूरी में करीब 400 किलोमीटर की कमी आती.

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दस साल चला कार्य 

इस लाइन पर 1936 से लेकर वर्ष 1946 तक मिट्टी कटाई आदि सहित प्रारंभिक कार्य शुरू हो गये. पर ब्रिटिश सरकार के जाते ही काम बंद हो गया. आज भी उस समय के कामों के अवशेष दिखाई देते हैं. कहीं-कहीं पुल-पुलिया भी बन गये थे. रेलवे स्टेशन भवनों का निर्माण कार्य भी शुरू हो चुका था.

ये पूरा क्षेत्र आदिवासी बाहुल्य है और खनिज संपदा से भरपूर है. इस लाइन के बन जाने से मुंबई की दूरी कम हो जायेगी.

प्रस्तावित क्षेत्र के तातापानी, रामकोला, भैयाथान के विशाल कोयला भंडार का उत्खनन वैद्य ढंग से हो सकेगा. इसके अलावा समारीपाठ, लहसुनपाठ, जमीरापाठ, और जोकापाठ आदि खदानों से प्रचुर मात्रा में बाक्साइट का उत्खनन किया जा सकेगा.

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नीतीश ने शुरू कराया था प्रारंभिक कार्य

रेलवे के एक जानकार अधिकारी ने बताया कि जब रेलमंत्री नीतीश कुमार थे, तो उनके निर्देश पर यहां सर्वे करने रेल मंत्रालय का एक दल आया था.

सर्वे के दरम्यान यह बात सामने आयी कि कुसमी-सामरी क्षेत्र से बाक्साइट का परिवहन रेणुकूट के हिन्डालको को अपेक्षाकृत कम खर्च और तेज गति से हो सकेगा. इससे खुंटपाली सिंचाई योजना एवं जलवि़द्युत योजना तथा तातापानी में गंधक से उत्पन्न विद्युत योजनाओं को आकार दिया जा सकेगा.

पलामू प्रमंडल और छतीसगढ़ के सरगुजा अंचल की विशाल जनजातीय अस्मिता को इससे जोड़ कर उन्हें समाज की मुख्यधारा में समरस करने का सशक्त माध्यम बनेगा.

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रेलमार्ग के बनने से जनजातीय क्षेत्रों में होगा विकास 

इस रेलमार्ग के बन जाने से जनजातीय क्षेत्रों में जिस आर्थिक, सामाजिक एवं राजनैतिक शोषण की प्रतिक्रिया स्वरूप नक्सलवाद पनप रहा है उसे आसानी से रोका जा सकता है.

रेलमंत्री नीतीश कुमार के कार्यकाल में वर्ष 2001 में इस रेलपथ के प्रारंभिक कार्यों हेतु दस करोड़ रूपया स्वीकृत किया गया, किन्तु वन भूमि का हस्तांतरण नहीं होने तथा पेड़ आदि काटने की अनुमति न मिलने के कारण रेल मंत्रालय हाथ पर हाथ धर कर बैठा रह गया. नीतीश के बाद लालू प्रसाद रेलमंत्री बने, किन्तु इस परियोजना पर कोई ध्यान नहीं दिया.

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छात्तीसगढ़ में आंदोलन, झारखंड में नहीं

इस प्रकरण में सरगुजा, अंबिकापुर क्षेत्र के लोग लगातार आंदोलन करते रहे. लेकिन पलामू में न नेताओं ने और न ही जनता ने कोई बड़ा आंदोलन करना उचित समझा. समाजवादी नेता एवं एकीकृत बिहार के खनन मंत्री रहे पूरनचंद (स्मृतिशेष) ने बरवाडीह-चिरीमिरी रेललाइन के लिए पुरजोर कोशिश की. लेकिन परिणाम सुखद नहीं रहा.

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नेतृत्वहीनता के कारण नहीं हुए बड़े आन्दोलन 

सरगुजांचल में रेलविस्तार के लिए समाजसेवी वेद प्रकाश अग्रवाल ने समर्पित भाव से जो आंदोलन चलाया और जनप्रतिनिधियों को अपने साथ बांधे रखा, वह प्रशंसनीय और अतुलनीय है. रेलमंत्रालय बिहार के कई सांसदों के हाथ में रहा, लेकिन इस परियोजना की सुधि नहीं ली गयी.

सच कहा जाय तो नेतृत्व विहीनता के कारण इस रेलमार्ग के लिए पलामू में आंदोलन में कोई गर्मी नहीं दिखाई दी. इसे एक औपचारिक प्रदर्शन ही कहा जा सकता है.

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झारखंड और छत्तीसगढ़ के सांसद मिले रेलमंत्री से 

झारखंड से राज्य सभा सांसद महेश पोद्दार एवं समीर उरांव तथा छतीसगढ़ से सांसद रामविचार नेताम.  नयी दिल्ली में रेलमंत्री पियुष गोयल से मिले और उनसे झारखंड एवं छतीसगढ़ की दो महत्वपूर्ण योजनाओं को शुरू करने की मांग की.

तीनों सांसदों ने लोहरदगा से गुमला होते हुए जशपुर, कुनकुरी, कोरबा के लिए नई रेल लाइन के लिए सर्वे की मांग रखी. सांसदों ने बहुत जोर देकर रेलमंत्री से आग्रह किया कि बरवाडीह-अंबिकापुर चिरमिरी रेललाईन के अधूरे काम को पूरा करने के लिए शीघ्र उचित पहल की जाए.

सांसदों ने रेलमंत्री को बरवाडीह-चिरमिरी रेललाईन का इतिहास संक्षिप्त रूप से बताते हुए कहा कि आजादी से पहले शुरू हुई यह परियोजना अधूरी पड़ी हुई है.

श्री गोयल ने भरोसा दिलाया कि वह इस मामले को गंभीरतापूर्वक देखेंगे. इस संबंध में कोयला मंत्रालाय से भी बात की जायेगी. रेल विभाग कोयला मंत्रालय से परियोजना के आर्थिक सहयोग मांगेगा. हालांकि छतीसगढ़ सरकार एवं झारखंड सरकार इस लंबित परियोजना को पूर्ण करने के लिए आर्थिक सहयोग करने को तैयार हैं.

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