Opinion

निवेश के लिए बैंकों के दरवाजे खोलने के क्या होंगे दूरगामी परिणाम

Faisal Anurag

सार्वजनिक क्षेत्र के छह बड़े बैंकों में निजी निवेश की दिशा में मोदी सरकार ने तेजी से कदम बढ़ा दिया है. हालांकि बैंकिंग विशेषज्ञों ने इसमें असहमति दर्ज की है. लेकिन बिजनेस अखबारों का दावा है कि केंद्र सरकार इसके बावजूद अपने इरादे पर अटल है. रिजर्व बैंक ने भी बैंकिंग क्षेत्र में निवेश के दरवाजे पूरी तरह से खोले जाने पर चिंता प्रकट की है. बिजनेस स्टैंडर्ड की खबर के अनुसार केंद्र इस सवाल पर गंभीर है. कुछ दिनों से इकोनॉमिक टाइम्स और कुछ अन्य अखबारों में लगतार इस आशय की खबरें छप रही हैं. जानकार मानते हैं कि यदि सरकारी क्षेत्र के बैंकों के साथ इस तरह का खिलवाड़ होगा तो उनकी हालत आइडीबीआई की तरह हो जायेगी.

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का सामाजिक दायित्व भी रहा है. जो इसमें निवेश की प्रक्रिया के बाद प्रभावित होगा. कमजोर तबकों के हितों की रक्षा के संजीदा दायित्व इन बैंको के रहे हैं. जबकि निजी क्षेत्र सामाजिक प्रतिबद्धता से बेखबर होता है. दबाव के बावजूद देखा गया है कि सोशल रिसपॉन्सबिलीटी के निवर्हन में कारपोरेट गंभीर नहीं रहे हैं. वित्त मंत्रालय ने इस मामले में चुप्पी साध रखी है. बिजनेस स्टैंडर्ड ने दावा किया है कि उसने वित्त मंत्रालय को इमेल किया था. लेकिन इन पंक्तियों के लिखे जाने तक कोई जवाब नहीं मिला है.

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हालांकि वित्त मंत्री निर्मला सीतारामण कह चुकी हैं कि बैंको और इंश्यारेंस सेक्टर में निवेश के लिए दरवाजे खोले जाएंगे. वित्त वर्ष 2021 का निवेश लक्ष्य 2.1 लाख करोड़ रुपये के करीब पहुंचने पर आरबीआई ने सरकार को शीर्ष छह सार्वजनिक बैंकों में अपनी हिस्सेदारी घटाकर 51 फीसदी करने का सुझाव दिया है. इस प्रक्रिया के लिए भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई), पंजाब नैशनल बैंक (पीएनबी), बैंक ऑफ बड़ौदा (बीओबी), केनरा बैंक, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया और बैंक ऑफ इंडिया (बीओआई) को चुना गया है. आरबीआई कह चुका है कि सरकार बैंको में अपनी हिस्सेदारी 26 प्रतिशत कम कर सकती है.

लेकिन सरकार बहुत हड़बड़ी में है. वो कोर सेक्टर के सार्वजनिक क्षेत्र के दरवाजे एफडीआई के लिए खोलने की घोषणा कर चुकी है. यह खबर ऐसे समय में आ रही है जबकि बैंक अपनी परिसंपत्ति की गुणवत्ता में सुधार के लिए जोर दे रहे हैं. और इस दिशा में कदम उठा चुके हैं. वे अपने दम पर इक्विटी पूंजी जुटाने की कवायद तेज कर चुके हैं. जानकारों की चिंता यह है कि सरकार ने बुनियादी सवालों और समस्याओं को गंभीरता से लेने के बजाय निवेश को ही एक आसान रास्ता मान लिया है.

वैश्विक संस्थानों का भी दबाव है कि भारत तेजी से आर्थिक सुधार करे. सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठनों के गठन के पीछे सरकार का लक्ष्य था एक आत्मनिर्भर भारत. इस दिशा में सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका को नकारा भी नहीं जा सकता है. भारत की औद्योगिक प्रगति में इस क्षेत्र की बड़ी भूमिका रही है. इतिहास का वह दौर कभी विस्मृत नहीं करना चाहिए. जब भारत के हितों के अनुरूप स्वायत्त विकास की राह में वैश्विक ताकतों ने रोड़े अटकाए थे.

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हो सकता है कि इतिहास के इन तथ्यों को नजरअंदाज भी कर दिया जाए. लेकिन सामाजिक दायित्व के क्षेत्र में एफडीआई कितना करगर होगा, यह सवाल तो है ही. दुनिया के इतिहास में ऐसा उदाहरण नहीं के बारबर है. जब किसी भी देश के विकास और उसके लोगों के बीच आर्थिक असमानता दूर करने की दिशा में वैश्किव पूंजी ने कोई भूमिका निभायी हो. भारत के लोगों के बीच सामाजिक और आर्थिक असमानता की जो खाई है, वह एक बड़ी समस्या है. और उसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए. नीतियों की प्राथमिकता में इस सामाजिक सच्चाई को नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है.

दुनियाभर में आर्थिक असमानता लगातार बढ़ रही है. और इसके संकट भी दिखायी दे रहे हैं. थॉमस पिकेटी जैसे अर्थशास्त्री इस सवाल पर किताब लिख कर विश्व नेतृत्व को अगाह कर चुके हैं. पिछले दो सालों में ही इस असमानता ने और खतरनाक रूप ले लिया है. आक्सफेम की चर्चित रिपोर्ट बता चुकी है कि असमानता के कारण दुनिया भर के देशों के भीतर आंतरिक अशांति के तत्व मजबूत हुए हैं.  इसे आज के संदर्भ में याद करने की और ज्यादा जरूरत है. ताकि आर्थिक सुधारों के अमानवीय पहलू को ले कर गंभीर विचार विमर्श हो सके.

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