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क्या वाकई नरेंद्र मोदी और अमित शाह को काले रंग से डर लगता है?

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Mangalesh Dabral

पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की दो अलग-अलग सभाओं (राजस्थान के जयपुर और छत्तीसगढ़ के भिलाई) में पुरुषों ही नहीं महिलाओं की काले रंग की चुन्नियां और अंतर्वस्त्रों जांच करने की ख़बर सामने आई है. यह एक अश्लीलता तो है ही और आम नागरिकों के सम्मान पर आक्रमण से कम नहीं है. पर ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. बीते जुलाई और अगस्त में इलाहाबाद और पुणे में अमित शाह की रैलियों में भी काले कपड़े प्रतिबंधित किए गए.

एक तरह से प्रधानमंत्री मोदी के भाषणों के दौरान काले रंग पर 2016 से ही अघोषित पाबंदी है और अब जब पांच राज्यों में चुनाव की घोषणा हो चुकी है, इन दोनों नेताओं की जनसभाओं की संख्या बढ़ेगी और इसी के साथ काले कपड़ों को लेकर ये सख्ती बढ़ने की गुंजाइश है.

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मोदी-शाह के ख़िलाफ़ विपक्षी दलों-संगठनों द्वारा काले झंडे दिखाए जाने की घटनाएं अभी छिटपुट ही हुई हैं, लेकिन जैसे-जैसे आर्थिक-सामाजिक मोर्चों पर सरकार को लेकर लोगों में नाराज़गी दिख रही है, वैसे-वैसे प्रशासनिक चौकसी भी बढ़ रही है.

कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री को राजस्थान में और फिर तमिलनाडु में द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम द्वारा कावेरी जल-विवाद पर सरकार की टालमटोल के ख़िलाफ़ काले झंडे दिखाए गए.

उत्तर प्रदेश में भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से जन-असंतोष बढ़ रहा है और लखनऊ की एक छात्रा पूजा शुक्ला को जून में योगी के सामने काला झंडा दिखाने के लिए पच्चीस दिन तक जेल में रहना पड़ा.

जुलाई 2018 में जब नरेंद्र मोदी उत्तर प्रदेश गए तो पुलिस ने पूजा शुक्ला को गड़बड़ी फैलाने की आशंका में पहले ही पकड़ लिया.

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काले झंडे दिखाने की कुछ घटनाएं

राजस्थान में जब मोदी की सभा में काले कपड़े ही नहीं बल्कि काली पगड़ियां पहने हुए सिख श्रोताओं को भी परेशानी उठानी पड़ी तो प्रदेश के कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने कहा, “कांग्रेस की जनसभाओं में किसी भी रंग पर पाबंदी नहीं है. काला, पीला, हरा, नीला, लाल, नारंगी, सभी रंगों का स्वागत है.”

एक सभा में राहुल गांधी भी शायद भाजपा को जवाब देने के लिए ही कह चुके हैं कि “अगर मेरी सभाओं में कुछ लोग काले झंडे दिखाते हैं तो यह उनका लोकतांत्रिक अधिकार है. मैं उनका स्वागत करूँगा.”

  • राजनीति में काले झंडे विरोध के साथ ही चेतावनी और संघर्ष और ‘वापस जाओ’ के भी प्रतीक रहे हैं. अंग्रेज़ों के राज में ही नहीं, आज़ादी के बाद भी काला रंग जलवा दिखाता रहा. साल 1953 में तमिलनाडु में द्रमुक ने जवाहरलाल नेहरू को हिंदी थोपे जाने के विरोध में काले झंडे दिखाए थे.
  • साल 1977 में इमरजेंसी हटने के बाद जब सत्ता से बाहर हो चुकीं इंदिरा गाँधी तमिलनाडु गईं तो इमरजेंसी की ज़्यादतियों के ख़िलाफ़ द्रमुक ने उग्र ढंग से काले झण्डे दिखाए. प्रदर्शन के दौरान पुलिस की गोलियों से दो लोगों की मृत्यु हो गई और सैकड़ों घायल हुए.
  • साल 1975 में इमरजेंसी का काला दौर शुरू होने से पहले ही इंदिरा गाँधी की सभाओं में काले रंग की अघोषित मनाही थी और पुलिस गहरी तलाशी लेती थी. काले कपड़े ही काले रूमाल तक पाए जाने पर पुलिस हरकत में आ जाती थी. उस समय के राजनीतिक माहौल में इंदिरा गाँधी का विरोध बहुत बढ़ गया था, चारों ओर तानाशाही और दमन की आशंका व्याप्त थी और गुजरात, बिहार में युवकों के आन्दोलन उग्र हो रहे थे. लेकिन तब कोई सोच भी नहीं सकता था कि काले रंग की पगड़ियों-चुन्नियों और अंतर्वस्त्रों तक को ख़तरे का संकेत माना जाएगा.

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मोदी को किन-किन रंगों से परहेज़

लेकिन ये मौजूदा समय में हो रहा है. वैसे इसकी एक वजह ये भी हो सकती है कि नरेंद्र मोदी काले कपड़ों से भी परहेज़ करते हैं. इसका जिक्र निलांजन मुखोपाध्याय ने ‘नरेंद्र मोदी : द मैन, द टाइम्स’ में किया है.

इस पुस्तक के एक चैप्टर में मोदी कुर्ता बनाने वाले चौहान ब्रदर्स में से एक बिपिन चौहान ने कहा है कि मोदी आम तौर पर काले कपड़ों से दूर ही रहते हैं और सौ फ़ीसदी काला रंग तो बिल्कुल नहीं पहनते. उनकी कलाई पर एक काला धागा ज़रूर बंधा होता है, लेकिन उसका मकसद शायद बुरी नज़र से बचाना है.

यह काला कलावा पहले मुस्लिम पीरों वगैरह के आस्तीनों पर बांधा जाता था, लेकिन अब इसका चलन पुजारियों और शनि जैसे देवताओं के मंदिरों में हो गया है. बिपिन चौहान के दावों के मुताबिक रंग-बिरंगे परिधान पहनने वाले मोदी हरे रंग से भी दूरी बरतते हैं.

इतिहास के कुछ दिलचस्प किस्से

इतिहास के नज़रिए से देखें तो शासक वर्ग काले रंग को हमेशा नापसंद करता आया है, ख़ासकर वे शासक जो सामंती, एकाधिकारवादी, तानाशाह और सत्ता के मद के साथ आनेवाले दुराग्रहों और अंधविश्वासों से संचालित से होते हैं. इनका इतिहास जानना अपने आप में कम दिलचस्प नहीं है.

बीसवीं सदी के सबसे बड़े उपन्यासकार कहे जानेवाले कोलंबियाई लेखक गैब्रियल गार्सिया मार्केज़ ने अपने कई इंटरव्यू और ख़ासकर एक दूसरे कोलम्बियाई लेखक प्लीनियो मेंदोसा से एक लम्बी बातचीत ‘अमरूद की खुश्बू’ में लातिन अमरीका के कई तानाशाहों की ख़ब्तों और सनकों का दिलचस्प ज़िक्र किया है.

मसलन, एक तानाशाह ने अपने देश में काली दाढ़ी रखने और दूसरे तानाशाह ने काली छतरी लेकर चलने पर पाबंदी लगा दी थी क्योंकि ज्योतिषियों ने काले रंग को उनके लिए अशुभ बताया था.

हैती के शासक फ्रांस्वा दुबलिये उर्फ़ पापा डॉक (1957-97) ने अपने देश में काले रंग के तमाम कुत्तों को मरवा दिया था. उसका अन्धविश्वास था कि उसके विरोधी नेता क्लेमे बारबो ने जादू के ज़रिये खुद को काले कुत्ते में बदल दिया है और उससे बदला लेने जा रहा है. कहते हैं, बारबो को फांसी पर चढ़ाने के बाद उसने जादू-टोने के लिए उसका सर अपने पास रख लिया.

दाढ़ी और लम्बे बालों के एक और दुश्मन तुर्कमेनिस्तान के राष्ट्रपति सपरमुरत नियाज़ोव (1990-2006) भी रहे जिन्होंने सोवियत संघ के टूटने-बिखरने के बाद अपने देश की सत्ता हथिया ली और कई अजीब फ़रमान जारी किए. काली दाढ़ी इसलिए उनके निशाने पर थी कि इस्लाम में जायज़ या ज़रूरी होने पर भी उससे नौजवान पीढ़ी अपनी ‘अलग पहचान’ बना रही थी.

नियाज़ोव ने काली कारों पर भी प्रतिबन्ध लगाया. वे कुत्तों को नापसंद करते थे और वे चाहे किसी भी रंग के हों, उन्हें अपने राज्य से बाहर खदेड़ देते थे. उसके शासन में संगीत कार्यक्रमों में होंठ हिलाकर नक़ल करने, टीवी पर मेकअप करके आने और तम्बाकू चबाने की भी मनाही थी. यही नहीं, उन्होंने एक अनोखा कैलेंडर भी चलाया जिसमें वर्ष की शुरुआत उसकी जन्मतिथि से मानी गई.

दरअसल काले रंग से भड़कने का समाजशास्त्र और मनोविज्ञान ख़ासा पुराना है. रोमन साम्राज्य के समय से ही उसे शोक, अशुभ, मौत, जादू-टोने और चुड़ैलों से जोड़ा जाता रहा. पश्चिमी देशों में मृतक के अंतिम संस्कार पर काले वस्त्र पहनकर आने का चलन उसी परंपरा का विस्तार है.

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यह परंपरा विक्टोरियाई युग (1861) में शुरू हुई थी जहां विधवाएं दो-तीन वर्ष तक काले वस्त्र पहनने के लिए विवश थीं.

लेकिन अठारहवीं-उन्नीसवीं शताब्दी में वह वर्ड्सवर्थ, बायरन, शेली, कीट्स, विलियम ब्लेक, कोलरिज जैसे महान रोमांटिक कवियों का सबसे प्रिय रंग बना, जो अक्सर काले कपड़ों में रहते थे. वे कवियों को राजा-रानियों से श्रेष्ठ मानते थे और लीक से हटकर चलते हुए विक्टोरियाई युग की तथाकथित नैतिकताओं के ख़िलाफ़ थे. शेली का प्रसिद्ध कथन है कि ‘कवि विश्व के स्वघोषित दूत’ होते हैं.

बीसवीं सदी आते-आते काले रंग का अर्थ बदल गया और उसने महंगे और ऊंचे दर्जे के फ़ैशन में प्रवेश किया. काले कपड़ों को संपन्न-सुरुचिपूर्ण रहन-सहन और परिधान का हिस्सा बनाने में फ़्रांस के फ़ैशन डिज़ाइनरों का बहुत हाथ है.

इसी के आसपास ब्रिटेन में बीटल गायकों और उससे कुछ पहले अमरीका की बीट पीढ़ी ने भी व्यवस्था-विरोध के प्रतीक के रूप में काले कपड़े अपनाए. काले रंग की अहमियत बढ़ने के साथ उसका विरोध भी हुआ और कहा गया कि ‘पेरिस का फ़ैशन एक स्थाई अंतिम संस्कार’ बन चुका है.

लेकिन बड़ी फ़ैशन कंपनियों का कहना था कि काला रंग एक साथ ‘बहुत शांत, विनम्र, अखंड और रहस्यमय’ है.

एक मशहूर कंपनी ईव्स सांलरा का ख़याल था, ‘काला परिधान महिलाओं को पेंसिल की एक ही रेखा में परिभाषित, शैलीकृत और प्रतिष्ठित’ कर देता है’. कुल मिलाकर शोक के इस रंग को फ़्रांस ने एक ‘प्रसन्न रंग’ में बदल दिया.

एक डिज़ाइनर का कहना था, “काला एक काव्यात्मक रंग है. आप किसी कवि की कैसी कल्पना करते हैं? चटख़ पीली जैकेट पहने हुए? शायद नहीं.” काला अब इतना अधिक प्रचलन में आ गया है कि अगर सर्दियों में देखें तो पूरा यूरोप काले कपड़ों में मातम मनाता हुआ नज़र आएगा.

लेकिन विरोध और प्रतिरोध के रंग के रूप में काले की अहमियत हमेशा बनी रही है. मध्यवर्गीय उपभोक्ताकरण के इस भीषण दौर में जहां विरोध-प्रतिरोध-प्रदर्शन ख़त्म हो रहे हैं, काले झंडे जब कभी नज़र आते हैं तो एक उम्मीद बंधती है कि शायद कोई बदलाव हो रहा है या होनेवाला है.

                                                                                                                                                          बीबीसी हिंदी से साभार

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