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क्या है अलग कोल्हान देश की हकीकत? जानिये 30 मार्च 1980 से 23 जनवरी 2022 तक की पूरी कहानी

NewsWing Desk

तारीख 30 मार्च, 1980. रविवार की उस सुबह चाईबासा की सड़कों पर आदिवासी जुटने लगे थे. लोग झुंड के झुंड आ रहे थे. दोपहर होते-होते हजारों लोग मंगलाहाट में जमा हो चुके थे. सिंहभूम के ये हो (लकड़ा-कोल) आदिवासी यहां रैली के लिए जमा हुए थे. इसी रैली में पहली बार अलग कोल्हान देश की मांग की गयी. मांग करनेवाले थे कोल्हान रक्षा संघ के नेता नारायण जोंको, क्राइस्ट आनंद टोपनो और कृष्ण चंद्र हेंब्रम, जो केसी हेंब्रम के नाम से मशहूर हुए. बाद में अलग कोल्हान की मांग को पश्चिमी सिंहभूम के मंझारी निवासी रामो बिरुवा ने उठाया. दिसंबर 2017 में रामो बिरुआ ने खुद को ‘कोल्हान गर्वनमेंट इस्टेट’ का ‘खेवटदार (मालिक) नंबर-1’ घोषित किया और इस घटना के चार साल बाद आनंद चातर ने तो एक कदम आगे बढ़ते हुए ‘कोल्हान गर्वनमेंट इस्टेट’ पुलिस में भर्ती का अभियान शुरू दिया. चाईबासा मुफस्सिल थाना की पुलिस छापामारी कर चार लोगों को पकड़ लायी. इसके विरोध में तीर-कमान और परंपरागत हथियारों से लैस सैकड़ों महिला-पुरुषों ने थाना घेर लिया. पुलिस से उनकी झड़प हुई और कई पुलिसवाले जख्मी हुए. एक पुलिसकर्मी को तीर भी लगा है. इस घटना के बाद से ही अलग कोल्हान एस्टेट का मामला एकबार फिर चर्चा में आ गया है. आइये जानते हैं कब-कब हुई अलग कोल्हान एस्टेट की मांग और क्या हुआ इसका अंजाम.

30 मार्च,1980 को चाईबासा के मंगलाहाट में पहली बार उठी मांग

केसी हेंब्रम

30 मार्च,1980 को चाईबासा के मंगलाहाट में जुटी उस भीड़ का नेतृत्व कोल्हान रक्षा संघ के नेता नारायण जोंको, क्राइस्ट आनंद टोपनो और कृष्ण चंद्र हेंब्रम (केसी हेंब्रम) कर रहे थे. उन्होंने 1837 के विल्किंसन रूल का हवाला देते हुए ब्रिटेन की सत्ता के प्रति अपनी आस्था जतायी और कहा कि कोल्हान इलाके पर भारत का कोई अधिकार नहीं बनता है. 1837 में कोल्हान अविभाजित बंगाल प्रेसीडेंसी का एक प्रमंडल था. इसके पूर्वी व पश्चिमी सिंहभूम जिले अधीन थे. अब ये इलाका झारखंड में है और सरायकेला-खरसावां जिले के अस्तित्व में आने के बाद नये कोल्हान प्रमंडल में तीन जिले हैं. पश्चिमी सिंहभूम जिले का मुख्यालय चाईबासा है.

कौन थे सर थॉमस विल्किंसन और क्या है विल्किंसन रूल?

ब्रिटिश काल में सर थामस विल्किंसन साउथ वेस्ट फ्रंटियर एजेंसी (एसडब्लूएफए) के प्रमुख थे. उन्होंने 1831 में हुए कोल विद्रोह को सैन्य शक्ति के बल पर दबा दिया और कोल्हान इलाके के 620 गांवों के मुंडाओं (प्रधान) को ब्रिटिश सेना के आगे सरेंडर करने पर मजबूर कर दिया. 1837 में सर विल्किंसन ने ‘कोल्हान सेपरेट एस्टेट’ की घोषणा कर चाईबासा को उसका मुख्यालय बना दिया. तब स्वभाव से आजाद आदिवासियों को अपने पक्ष में करने के उद्देश्य से उन्होंने इस इलाके में परंपरागत रूप से चली आ रही मुंडा-मानकी स्वशासन व्यवस्था लागू कर दी. इसे ही ‘विल्किंसन रुल’ कहा जाता है.  ‘विल्किंसन रुल’  के तहत सिविल मामलों के निष्पादन का अधिकार मुंडाओं को मिल गया, जबकि मानकी को आपराधिक मामलों के निष्पादन के लिए अधिकृत कर दिया गया.

कोल्हान के इलाके में क्यों प्रभावी है विल्किंसन रूल?

कोल्हान का इलाका मुगलों के वक्त से ही पोड़ाहाट के राजा की रियासत थी. लेकिन आजादी के बाद जब देसी रियासतों का भारत में विलय हो रहा था, उस वक्त कोल्हान इलाके में कोई रियासत प्रभावी नहीं थी. विल्किंसन रूल लागू होने के बाद कोल्हान एस्टेट बन गया और सारे अधिकार मुंडाओं के हाथों में आ गये. यानी, पोड़ाहाट के राजा अस्तित्व में ही नहीं थे. इस वजह से भारतीय संघ में कोल्हान इलाके के विलय का कोई मजबूत दस्तावेज नहीं बन सका. इस कारण देश की आज़ादी के बाद भी यहां विल्किंसन रूल प्रभावी बना रहा. इसी बात को को आधार बनाकर गाहे-बगाहे अलग कोल्हान देश की मांग की जाती रही है.

रामो बिरुवा ने साल 2017 में की थी अपना झंडा उठाने की घोषणा

पश्चिमी सिंहभूम के मंझारी निवासी रामो बिरुवा ने 18 दिसंबर 2017 में खुद को ‘कोल्हान गर्वनमेंट इस्टेट’ का ‘खेवटदार (मालिक) नंबर-1’ घोषित करते हुए खूंटपानी प्रखंड के बिंदीबासा में अलग कोल्हान का झंडा फहराने की घोषणा कर दी. उन्होंने 1995 में ब्रिटेन की महारानी के साथ हुए अपने पत्राचार का हवाला देते हुए दावा किया कि वह इस इलाके के खेवटदार नंबर-1, अर्थात प्रशासक हैं. इसलिए, उन्हें झंडा फहराने का अधिकार प्राप्त है. उन्होंने इस दन को ‘बीसवां रक्तहीन वापसी दिवस’  की संज्ञा दी.  इस घोषणा के बाद चाईबासा पुलिस ने रामो बिरुवा समेत 45 लोगों के खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा दर्ज कर लिया. भारी पुलिस बंदोबस्त के कारण रामो बिरुवा खुद तो बिंदीबासा में झंडा नहीं फहरा सके, लेकिन कुछ लोगों ने उसी दिन जमशेदपुर के पास अपना झंडा फहरा दिया. इसको लेकर जमशेदपुर के बागबेड़ा थाने में भी राजद्रोह का एक मुकदमा दर्ज है. 23 जनवरी 2022 को चाईबासा में हो रहे कोल्हान इस्टेट पुलिस बहाली में पुलिस ने जिस विजय हाईबुरु को गिरफ्तार किया है, वह बागबेड़ा का ही रहनेवाला है.

रामो बिरुवा की फरारी, गिरफ्तारी और हिरासत में मौत

87 साल के रामो बिरुवा तब फरार हो गये थे. बिहार सरकार में महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर रहे रामो बिरुवा को आखिरकार चाईबासा के मिशन कंपाउंड से 1 जून 2018 को चाईबासा पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था. न्यायिक हिरासत में रहते उनकी तबीयत बिगड़ गयी और 21 जून को सदर अस्पताल पहुंचने के पहले उन्होंने दम तोड़ दिया. तब से अलग कोल्हान का आंदोलन बंद सा हो गया था, लेकिन 4 साल के बाद फिर एक बार फिर यह आंदोलन उभर कर सामने आया और 23 जनवरी 2022 को चाईबासा के मुफ्फसिल थाना परिसर में देखने को मिला.

संयुक्त राष्ट्र तक पहुंची थी अलग कोल्हान देश की मांग

बीबीसी हिन्दी की एक रिपोर्ट में पत्रकार अनुज कुमार सिन्हा के हवाले से कहा गया है कि वर्ष 1981 में कोल्हान रक्षा संघ से जुड़े नारायण जोंको, आनंद टोपनो और अश्विनी सवैयां इस मामले को लेकर लंदन और जिनेवा भी गये थे. लंदन में इन लोगों ने राष्ट्रमंडल के सदस्य देशों के प्रतिनिधियों को अपने तर्कों से संबंधित दस्तावेज सौंपते हुए विल्किंसन रूल के तहत कोल्हान को अलग देश का दर्जा देने की मांग की. यही नहीं, इन लोगों ने राष्ट्रमंडल देशों के प्रतिनिधियों से 2 दिसंबर 1981 को चाईबासा पहुंचने की अपील की, ताकि वे विधिवत रूप से अलग कोल्हान देश की घोषणा कर सकें. खबर मिलते ही तत्कालीन भारत सरकार सक्रिय हुई और नवंबर 1981 में लंदन से लौटते ही आनंद टोपनो और अश्विनी सवैयां को गिरफ्तार कर चाईबासा जेल में डाल दिया. नारायण जोंको और केसी हेंब्रम गिरफ्तार नहीं हुए. पुलिस ने सभी के खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा दर्ज किया. 30 जुलाई 1984 को तत्कालीन केंद्रीय गृह राज्यमंत्री रामदुलारी सिन्हा ने लोकसभा में माना कि बिहार के चाईबासा इलाके में कोल्हानिस्तान नाम से एक अलगाववादी आंदोलन को हवा दी जा रही है. अनुज सिन्हा कहते हैं कि इसके बाद कई गोलीकांड हुए और कोल्हान रक्षा संघ और भारत सरकार के अधिकारियों के बीच परस्पर पत्राचार भी हुआ. तब नारायण जोंको ने कोल्हान विश्विद्यालय को आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से संबद्धता दिलाने की बात प्रचारित की. लेकिन, बाद के दिनों में यह आंदोलन कुंद पड़ गया. इसके बाद कभी-कभी रामो बिरुआ और आनंद चातर जैसे लोग इस मुद्दे को उठाते हैं और कोल्हान देश की चर्चा होने लगती है.

क्या है कोल्हान गवर्नमेंट ईस्टेट का ताजा मामला 

जानकारी के अनुसार पिछले कुछ महीनों से कोल्हान गवर्नमेंट ईस्टेट की ओर से कोल्हान पुलिस, मुंडा-मानकी व हो भाषा शिक्षकों की बहाली की प्रक्रिया चलायी जा रही थी. खुद को कोल्हान का पहला खेवटदार बोलने वाले आनंद चातर अपने कई सहयोगियों के साथ यह प्रक्रिया चला रहे थे. इसका केंद्र था मुफस्सिल थाना अंतर्गत सदर प्रखंड का लादुराबासा गांव का स्कूल परिसर और बगल का मैदान. गांव में कई युवा तीर-धनुष व लाठी लिए अभ्यर्थियों की भीड़ को नियंत्रित करते हुए दिखाई देतेथे. भर्ती स्थल पर जाने के रास्तों और गांव के चौक पर भी दिशा-निर्देश के लिए युवाओं को तैनात किया गया था.

लादुराबासा गांव में विधिवत चल रही थी नियुक्ति की प्रक्रिया

लादुराबासा गांव का स्कूल परिसर में आवेदन फॉर्म व नियुक्ति पत्र संबंधित अलग-अलग काउंटर बने हुए थे. सैकड़ों पुरुष व महिला अभ्यर्थी अपने दस्तावेजों को लेकर आते थे. रोजोना सुबह 7 बजे से ही कोल्हान के विभिन्न गांवों आनेवाले युवा कतार में लग जाते थे. दोपहर साढ़े तीन बजे तक बहाली चलती थी. बहाली स्थल का फोटो व वीडियो लेना सख्त मना था. हजारों युवक व युवतियों ने 50-60 रु में नियुक्ति फॉर्म खरीदा था. वहीं बिचौलिये इस फार्म का 100 रुपये तक वसूल रहे थे.

अभ्यर्थियों का फिटनेस टेस्ट लेकर और नियुक्ति पत्र दिये गये

कोल्हान पुलिस के लिए अभ्यर्थियों का फिटनेस टेस्ट लेने के बाद ईस्टेट की ओर से बाकायदा नियुक्ति पत्र भी दिया गया. नियुक्ति पत्र देने के समय बीमा व अन्य के नाम पर 500 रु भी लिये जा रहे थे, लेकिन इसकी कोई रसीद नहीं दी जा रही थी. अभ्यर्थियों से आधार कार्ड,  बैंक पासबुक व मार्कशीट की छाया प्रति भी ली जा रही थी. इसी तरह विभिन्न गावों के लिए मुंडा व पीड़ के लिए मानकी की नियुक्ति की गयी थी. रविवार को कोल्हान इस्टेट पुलिस के लिए फर्जी तरीके से शिक्षकों व पुलिस की बहाली की सूचना मिलने के बाद चाईबासा मुफस्सिल थाना की पुलिस लादुराबासा गांव पहुंची और फर्जी बहाली के आरोप में चार लोगों पकड़ कर थाना ले आयी. इसके बाद कोल्हान देश के कथित समर्थक पुलिस से उलझ गये और पुलिस के साथ उनकी हिंसक झड़प हुई.

(इनपुट और फोटो  : बीबीसी हिन्दी में 30 मार्च 2018 को प्रकाशित रविप्रकाश की रिपोर्ट – क्यों उठ रहा है अलग कोल्हान देश का मुद्दा?)

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