Opinion

सिलेबस कम करने के लिए कुछ खास चैप्टर्स ही क्यों हटा रही है मोदी सरकार?

विज्ञापन
Advertisement

Faisal Anurag

कहा तो गया है कि यह बदलाव सिर्फ एक साल के लिए ही किया गया है. लेकिन पिछले छह सालों में मोदी सरकार जिन नीतियों को अंजाम देने में लगी हुई है उससे तो नयी बहस उठ खड़ी हुई है. सीबीएसई की कक्षा 11 और 12वीं के पाठ्यक्रम का बोझ कम करने के लिए उसमें 30 प्रतिशत कटौती करते हुए उन्हीं अध्यायों को डिलीट किया है जिन पर मोदी सरकार के इरादे को लेकर पहले से ही चर्चा और विरोध का माहौल बना हुआ है.

पाठ्यक्रम में राजनीति शास्त्र की पाठ्य पुस्तक से नेशनलिज्म (राष्ट्रवाद), सिटीजनशिप (नागरिकता), फ़ेडरलिज्म (संघवाद), समकालीन विश्व में सुरक्षा, पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन, क्षेत्रीय आकांक्षाएं, जन आंदोलन का उदय जैसे अध्याय को पूरी तरह ‘डिलीट’ किया गया है या कर दिया जायेगा. वहीं नियोजित विकास की राजनीति, स्थानीय शासन, भारत के विदेश संबंध जैसे चैप्टर के कुछ हिस्सों को हटाया जायेगा. शिक्षा सचिव ने कहा है कि यह बदलाव एक साल के लिए किया गया है और इससे छात्रों पर दबाव कम होगा. उन्होंने यह भी कहा है कि चूंकि पहले की कक्षाओं में इन विषयों को पढाया गया है, इससे छात्रों के ज्ञान अर्जन पर प्रभाव नहीं पड़ेगा.

advt

यदि मोदी सरकार के शिक्षा नीति विषयक इरादों को ध्यान में रख कर ‘डिलीट’ पर गौर किया जाये तो अनेक सवाल पैदा होते हैं. नागरिकता जैसे सवाल पर सरकार का जो नजरिया, नागरिकता कानून और जनगणना के साथ एनआरसी कराने का मामला पिछले साल से ही काफी प्रतिरोध और दमन का विषय बना हुआ है.

कोविड-19 महामारी के आतंक के बीच भी उन आंदोलनकारियों की गिरफ्तारियां की गयीं जो इस प्रतिरोध आंदोलन से जुडे रहे हैं. यह प्रतिरोध आंदालन ज्यादातर शैक्षणिक संस्थानों से उभरा और देश भर में फैला. नागरिकता के संवैधानिक पहलू के जानकारों ने इसका एकमत विरोध किया. हालांकि प्रतिरोध और सिलेबस दो अलग-अल्रग मामले हैं. बावजूद दोनों के बीच एक बारीक सूत्र जुड़ा हुआ है.

दुनिया भर के शासकों का इरादा होता है कि वह अपने अनुकूल नागरिकों का निर्माण करे और शिक्षा का इसमें भरपूर इस्तेमाल करे. प्राचीन और मध्यकाल में भी  शिक्षा केंद्रों  पर हमले हुए और नेस्तानाबूद तक कर दिये गये. यह केवल भारत में ही नहीं हुआ. दुनिया के अनेक हिस्सों में इस तरह के बर्बर हमले किये गये.

नालंदा पर हुए हमले का दंश तो आज तक मजबूत है. सत्ता नियंत्रित करने की यह प्रवृति आज तक क्रियाशील है. यही कारण हे कि शिक्षा को अपने अनुकूल बनाने के लिए पाठ्यक्रमों का चुनाव किया जाता है. केंद्र सरकार की नयी शिक्षा नीति में भी यह इरादा स्पष्ट झलकता है. जनसंघ के जामने से आरएसएस और भाजपा  के निशाने पर शिक्षा रही है. बाजपेयी सरकार के समय भी शिक्षा नीति को बदलने का प्रयास हुआ था जिसे एनडीए के ही कुछ घटकों के विरोध का सामना करना पड़ा था.

लेकिन 2014 के बाद का परिदृश्य बदल गया है. अब केंद्र पर एक ऐसी सरकार है जो अपनी तमाम नीतियों को खुल का लागू कर रही हे. सरकार का मुख्य फोकस आर्थिक क्षेत्र के सुधार के साथ शिक्षा भी है.

इसे भी पढ़ें – राज्य के 216 नर्सिंग होम और अस्पताल ने नहीं ली प्रदूषण बोर्ड से संचालन की मंजूरी, भेजा गया नोटिस

शिखा के क्षेत्र के निजीकरण के लिए मोदी सरकार पर दबाव भी बढ रहा है. अनेक लेख लिख कर सुझाव दिया जा रहा है कि इनोवेटिव एडुकेशन के लिए सरकार को शिखा क्षेत्र से बाहर आ जाना चाहिए. भारत जैसे देश में शिखा के निरंतर महंगे होते जाने के कारण हालात यह हे कि यह आमजन की पहुंच से बाहर होती जा रही है.

चूंकि मोदी सरकार ने आपदा में अवसर का इस्तेमाल करते हुए आर्थिक सुधारों की गति को तेज कर दिया है इसलिए यह संदेह लाजिमी है कि उन उन सवालों पर केंद्र अपना नजरिया ही छात्रों तक पहुचाना चाहता है जो अब तक भारत के संविधान,आजादी की लडाई और ज्ञानोदय  के मूल्यों से उभरे है. एक अतीतोन्मुखी भारत का नजरिया पुराना है और उसका उन तमाम प्रवृतियों, विचारों और ज्ञान के स्रोतों से विरोध है जो प्रकृति, इतिहास, विज्ञान की एक नयी सांस्कृतिक समझ का निर्माण करते हैं.

एनसीआरटी पर भी जिस तरह का दबाव पिछले सालों में देखा गया है, 2014 में सत्ता में आने के बाद से शिक्षा में बदलाव की बात बहुत खुलकर लेकिन सावधानी के साथ ऐलान किया जाने लगा है. नरेंद्र मोदी के शपथ के बाद दीनानाथ बत्रा का चर्चित बयान आया था, ‘नरेंद्र मोदी जी से भेंट करने जा रहा हूं. हमने पहले से ही अपनी मांगें उन तक पहुंचा दी हैं, राजनीतिक बदलाव आ चुका है और अब शिक्षा में पूर्ण सुधार होना चाहिए.’

परिवार के दीनानाथ बत्रा संघ परिवार के शिक्षा विशेषज्ञ माने जाते हैं और बाजपेयी काल से ही शिक्षा का पश्चिमीकरण से मुक्त करने का अभियान चलाते रहे हैं. 2014 से अभी तक देखा गया हे कि नीतियों में बदलाव और शिक्षा मनोविज्ञान को अपने अनुकूल करने की प्रक्रिया जारी है.

2014 में ही उज्जैन में आयोजित हुए अंतरराष्ट्रीय विराट गुरुकुल सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में बोलते हुए तत्कालीन केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा था कि शिक्षा को और सार्थक बनाये जाने के प्रयास किये जा रहे हैं. गुरुकुलों एवं आधुनिक शिक्षा के बीच समन्वय करने के प्रयास किए जायेंगे. गुरुकुल शिक्षा पद्धति को उचित स्थान दिया जायेगा.

इस मौके पर उन्होंने बताया कि उनकी सरकार 11वीं और 12वीं कक्षा के छात्रों के लिए ‘भारत बोध’ पर एक विषय शुरू करने की योजना बना रही है जिसका मक़सद छात्रों को प्राचीन भारत के एस्ट्रोनॉमी, विज्ञान और एरोनॉटिक्स आदि में योगदान के बारे में बताना है.

हो सकता है कि आनलाइन शिक्षा के इस दौर में पाठ्क्रमो को कम करने की जरूरत हो लेकिन इसके लिए किन अध्ययनों को कम या खत्म करने की जरूरत है यह सार्वजनिक बहस का विषय है लेकिन  सुहास पलीसकर जैसे शिक्षाविद कह रहे हैं कि  सरकार का ताजा फैसला बताता है कि वह इस आपदा असर को अपने नजरिये से इस्तेमाल कर रही है. विपक्ष के अनेक नेताओं जिसमें मामता बनर्जी भी शामिल हैं इस विरोध का हिस्सा बन चुकी हैं.

इसे भी पढ़ें – बढ़ते कोरोना संकट में दो ट्रेनों की झारखंड में नो इंट्री, राज्य सरकार ने किया था रेलवे से आग्रह

advt
Advertisement

Related Articles

Back to top button
Close
%d bloggers like this: