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निजीकरण के मामले में राज्यों के सुझावों की अनदेखी कर केंद्र क्या साबित कर रहा है?

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Faisal anurag

हेमंत सोरेन का यह कहना कि केंद्र सरकार गैर-भाजपा सरकारों को अस्थिर कर रही है मामूली बात नहीं है. राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी माह भर पहले इसी तरह की बात कही थी. और कांग्रेस के विधायकों को होटल में शिफ्ट कराया गया था. महाराष्ट्र में भी शिवसेना-एनसीपी- कांग्रेस सरकार को गिराने की बातें सरकार के गठन के बाद से ही की जा रही हैं. कर्नाटक और मध्यप्रदेश में तो गैर भाजपा सरकारों को गिराने में भाजपा और केंद्र सरकार कामयाब साबित हो चुकी है.

गुजरात के विपक्षी विधायकों के खरदफरोख्त की खबरें तो आती ही रहती हैं. सवाल उठता है कि प्रधानमंत्री मोदी अपने भाषणों में सहयोगात्मक संघवाद को- आपरेटिव फेडरलिज्म: की बात करते हैं, उसके बावजूद विपक्ष की सरकारों को यह कहना पड़ता है कि उन्हें अस्थिर करने का खेल किया जा रहा है. झारखंड में भी दिसंबर 19 के विधानसभा चुनावों की पराजय को भाजपा स्वीकार नहीं कर पा रही है. दलबदल कराने का जो करामात पिछले छह सालों में किया गया है, उससे बहुमत की चुनी सरकारों को खतरा महसूस होना लाजिमी ही है.

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हेमंत सोरेन ने तो  नई विद्युत नीति को ले कर गहरा असंतोष प्रकट किया. और उसे भारतीय संघात्मक शासकीय ढांचे पर प्रहार जैसा माना है. नई विद्युत नीति को ले कर केवल हेमंत सोरेन ही असंतुष्ट नहीं हैं बल्कि छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों में भी बेचैनी है. नई विद्युत नीति को निजी कंपनियों के लिए स्वर्ग बताया जा रहा है. जिससे राज्यों के अधिकार न केवल व्यवाहारिक रूप से सीमित होंगे बल्कि गरीब और मध्यवर्ग के उपभोक्ताओं की भी परेशानी बढेगी.

हेमंत सोरेन का यह भी कहना है कि केंद्र सरकार की  कथनी और करनी में फर्क है. रेलवे की लिए वह एक तरफ कुछ घोषणाएं करती हैं, वहीं दूसरी ओर उसका निजीकरण भी कर रही है. इस बीच कोयला और रेलवे के श्रमिक संगठनों ने एक साथ निजीकरण के खिलाफ  संघर्ष करने का एलान कर दिया है. इस संघर्ष में अन्य सेक्टरों के मजदूरों के संगठनों के शामिल होने की संभावना है.

चीन और कारोना संकट के बीच केंद्र के निजीकरण अभियानों को ले कर यह अंदेशा बलवती है कि सहयोगात्मक संघात्मकता की भारतीय अवधारणा को एकात्मकता में न बदल दिया जाए. हेमंत सोरेन इस बात से भी चिंतित हैं कि डीवीसी बार-बार राज्य सरकार के बकाए को लेकर बिजली काटने की बात करता है.  विद्युत के नए कानून से राज्यों की शक्तियों का हनन होने की संभावा प्रबंल है. हालांकि केंद्रीय ऊर्जा मंत्री ने यह आश्वासन दिया है कि राज्यों के सुझावो पर केंद्र गौर करेगा.

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बावजूद इसके जिस गति से कानून को अंतिम रूप दने की प्रक्रिया चल रही है, उसमें छोटे राज्यों के सुझावों के शामिल होने की शंका है. छोटे राज्यों की छटपटाहट का एक बड़ा कारण तो यह भी है उनके सुझावों को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है. कोरोना काल में झारखंड के मुख्यमंत्री को पीएम वीडियो कांफेंसिंग में बोलने का कम ही अवसर दिया गया. जानकारों के अनुसार नया कानून बिजली रेट भारत के आम लोगों के लिए परेशानी का सबब बन सकता है. हालांकि तमाम सुधार उपभोक्ताओं को लाभ पहुंचाने के नाम पर किए जाते हैं.

हेमंत सोरेन के इन बयानों के बाद राजनीतिक माहौल का गर्म होना तय है. झारखंड भाजपा ने सरकार बनने के महीने भर के अंदर ही नई सरकार के खिलाफ मोरचा खोल दिया था और अब उसे धार देने में लगी हुई है. झारखंड सरकार कोयला खदान की नीलामी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गयी है, और भाजपा के ताम बड़े नेता नीलामी को फायदेमंद बताने के अभियान में लग गए हैं. केद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा ने एक लेख लिख कर राज्य सरकार के आरोप के खिलाफ मोर्चा खोला. कोल सेक्टर के श्रमिक पिछले तीन दिनों से हड़ताल पर हैं. मजूदरों का विरोध तीखा है. आम झारखंडी संसाधनों को निजी क्षेत्रों के हवाले करने का विरोधी है. पिछले चार दशकों के दौरान कई बड़े जन प्रतिरोध आंदोलन ने प्राकृतिक संसाधन की हिफाजत के लिए संघर्ष किया है.

झारखंड मुक्ति मोर्चा भी जल,जंगल जमीन से जुड़ी लोगों की भावनाओं के साथ होने की बात करता रहा है. हेमंत सोरेन अपने वर्तमान कार्यकाल में इस सवाल को ले कर मुखर हैं. और झारखंडियों की संवेदना और भावनाओं को ही व्यक्त कर रहे हैं. हालांकि भाजपा इसे नहीं मानती. और खुद को ही आदिवासियों का पैरोकार मानती है. हालांकि 2019 के विधानसभा चुनावों में उसे आदिवासी बहुल इलाकों में बुरी पराजय का समाना करना पड़ा.

झारखंड की राजनीति में प्राकृतिक संसाधनों के सवाल को नजरअंदाज करना सहज नहीं है. विधानसभा आमचुनावों में झारखंड की सभाओं में मोदी ने कहा था कि उनके रहते संसाधनों की लूट संभव नहीं है. लेकिन निजीकरण के पुराने अनुभव बताते हैं कि राष्ट्रीयकरण के पहले किस तरह निजी कंपनियों ने कोयला क्षेत्र में जमीन और जंगल को बर्बाद किया है. यह इतना गहरा दर्द है कि निजीकरण का नाम सुनते ही तकलीफ देने लगता है.

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