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देशभर में NRC लागू करने की बात के पीछे आखिर क्या है असली वजह

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Girish Malviya

गृहमंत्री अमित शाह ने एक बार फिर कहा है कि नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटीजन यानी NRC को पूरे देश में लागू करने के लिए सरकार प्रतिबद्ध है.

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अच्छा आप ये बताइये कि मोदी राज से पहले कभी आपने यह सुना था कि NRC सरीखे एक रजिस्टर होता है. जिसमें नागरिकों की राष्ट्रीय सूची दर्ज होती है, उस सूची में भारत के निवासियों का नाम दर्ज होता है और जिन लोगों का नाम इस रजिस्टर में नहीं रहता वो भारत के नागरिक नहीं होते?

दरअसल यह NRC के पीछे एक बड़ा इतिहास रहा है, यह मूल रूप से पूर्वोत्तर में बढ़ रहे शरणार्थियों की समस्या से संबंधित है.
हमेशा से असम में अवैध रूप से रहने वाले बांग्लादेशियों का मामला बहुत बड़ा मुद्दा रहा है. इस मुद्दे पर कई बड़े और हिंसक आंदोलन भी हुए है.

असम के मूल नागरिकों ने तर्क दिया कि अवैध रूप से आकर यहां रह रहे ये लोग उनका हक मार रहे हैं. 80 के दशक में इसे लेकर एक बड़ा स्टूडेंट मूवमेंट हुआ था, जिसके बाद असम गण परिषद और तत्कालीन राजीव गांधी सरकार के बीच समझौता हुआ कि 1971 तक जो भी बांग्लोदशी असम में घुसे उन्हें नागरिकता दी जाएगी और बाकी को निर्वासित किया जायेगा.

असम की एनआरसी असल में साल 1951 में बनी एनआरसी को अपडेट करने की ही कवायद है. इसमें उन सभी लोगों को शामिल किया जा रहा है जिनका नाम 1971 से पहले की मतदाता सूची या 1951 के एनआरसी में शामिल है.

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अब यह कहा जा रहा है कि असम एनआरसी के मामले में पहल करने वाला पहला राज्य है और अब बाकी राज्यों में भी एनआरसी लाने की मांग की जा रही है. लेकिन आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि देश के सभी राज्यों में पहले ही एनआरसी तैयार हो चुका है.

दरअसल देश के बंटवारे के बाद यह जानना जरूरी था कि देश में कितने लोग वैध या अवैध तरीके से रहे हैं. इसलिए आजादी के बाद साल 1951 में ही देश भर में एक नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन्स तैयार किया गया था. जी हां, पूरे देश भर में.

यह सभी राज्यों में तैयार किया गया था यानी अभी जो असम में जो एनआरसी तैयार किया जा रहा है वह नया नहीं है. साल 1951 में देश भर में जनगणना हुई थी, जिसमें हर गांव में सभी मकानों के क्रमवार ऑर्डर के मुताबिक जानकारी और उसमें कितने लोग रहते हैं, यह जानकारी हासिल हुई थी.

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इसके बाद इस जनगणना की सहायता से ही नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस तैयार किया गया. इस रजिस्टर को तैयार करने के बाद इसे केंद्र सरकार के निर्देश पर सभी इलाकों के डिप्टी कमिश्नर और एसडीएम के दफ्तरों में रखा गया.

बाद में 1960 के दशक में ये रजिस्टर पुलिस विभाग को सौंप दिए गए. असल में सभी राज्यों में 1951 में जो एनआरसी तैयार की गई थी, वह जनगणना पर आधारित थी. इसमें लोगों का समुचित वेरिफिकेशन नहीं किया गया था.

इस तरह असम में एनआरसी का अपडेशन, वह भी सिटीजनशिप के वेरिफिकेशन के साथ करने की इतनी बड़ी कवायद किसी राज्य में पहली बार हुई है.

अब इस वेरिफिकेशन की प्रक्रिया को देश भर में लागू किये जाने की बात की जा रही है. लेकिन सच तो यह है कि देश भर में NRC लागू करने की बात के पीछे एक छिपा हुआ एजेंडा है. और एनआरसी के नाम पर देश में एक समुदाय को डराने और उन्हें घुसपैठिया साबित करने की कोशिश की जा रही है.

इसके लिए संभवतः सदन के अगले सत्र में नागरिकता संशोधन विधेयक पेश किया जाएगा. इस विधेयक द्वारा अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से 31 दिसंबर, 2014 से पहले आने वाले 6 धर्मों के शरणार्थियों को भारत की नागरिकता प्रदान करने का रास्ता खोल दिया जाना है, ये धर्म हैं– हिंदू, बौद्ध, जैन, सिख, पारसी और ईसाई.

गौरतलब है कि इस्लाम मानने वालों को इसमें शामिल नहीं किया जायेगा. यही बार-बार NRC के लागू किये जाने की बात का असली कारण है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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