Opinion

साध्वी की आंखों से निकले आंसू के क्या हैं सियासी मायने

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Priyanka

साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर इन दिनों सुर्खियों में हैं. फिर चाहे अपने बयानों को लेकर हो या फिर अपने आंसू को. सोमवार को बीजेपी की दो नेत्रियों की मुलाकात हुई. दो साध्वी, दो भगवा धारी कुछ ऐसी मिलीं कि सियासी चर्चा के साथ-साथ जज्बातों का सैलाब उमड़ पड़ा. इन आंसू के आखिर सियासी मायने क्या है.

उमा भारती के तल्ख बयान के बाद साध्वी प्रज्ञा उनसे मिलने उनके घर पहुंचीं. खुद से 11 साल छोटी साध्वी ठाकुर को सन्यासिनी उमाभारती ने पांव छूकर प्रणाम किया.

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इस दौरान मालेगांव ब्लास्ट की आरोपी प्रज्ञा अपनी भावनाओं को काबू में नहीं रख पायी और गले लगकर रोने लगीं. उमाभारती ने उनके आंसू पोंछे, संभाला. जाहिर है, मुलाकात की बीच उमड़े भावनाओं ने बहुत कुछ साध दिया.

पहले तो उन अटकलों को जिसमें उमाभारती और साध्वी प्रज्ञा के बीच तल्खी की बात हो रही थी. क्योंकि इस मुलाकात से एक दिन पहले ही केंद्रीय मंत्री ने तंज भरे लहजे में कहा था कि साध्वी प्रज्ञा तो बहुत बड़ी संत हैं, मैं तो उनके सामने मूर्ख इंसान हो.

विवाद पर सियासत गरमाती इससे पहले ही साध्वी, उमाभारती से मिलने पहुंच गयीं. फिर उनके आंसू ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. और फिर भावनाओं, आंसूओं की पहुंच राजनीति में कितनी है, ये तो किसी से छिपा नहीं है.

ये पहला मौका नहीं था, जब साध्वी अपने आंसू को रोक न सकी हो. इससे पहले भी साध्वी प्रज्ञा रोते नजर आयी थीं, उस वक्त मालेगांव ब्लास्ट मामले में जेल में बंद होने पर मिलनेवाली यातनाओं का जिक्र करते हुए उनके आंसू निकले थे.

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भले ही उन्होंने कहा कि वो सहानुभूति के लिए ये बातें नहीं बता रहीं, बस अपना दर्द बयां कर रही हैं. दर्द में छलके इन आंसू ने साध्वी की छवि साफ करने की कोशिश जरूर की. आतंक की आरोपी की आंखों से निकले आंसू ने एक पीड़िता की छवि बनाने में मदद की.

शायद आम दिनों में साध्वी रोतीं तो वैसा असर नहीं होता. लेकिन फिलवक्त तो मौका काफी खास है. धर्म के नाम पर हमारे देश में भावनाएं किस कदर उफान मारती हैं, ये किसी से छिपा नहीं है. फिर अभी तो चुनावी सरगर्मी है. ऐसे माहौल में एक भगवाधारी, ऊपर से महामंडलेश्वरी की उपाधि प्राप्त साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के आंसू जाया जायेंगे- इसकी उम्मीद कम ही है.

भोपाल से बीजेपी उम्मीदवार बनने के साथ ही वो चर्चा में हैं. उनके विवादित बयानों ने बदनाम होंगे तो क्या नाम होगा की तर्ज पर असर डाला है. फिर चाहे वो हेमंत करकरे को लेकर अमर्यादित बात हो. या बावरी मस्जिद को लेकर किया गया बड़-बोलापन.

एक सवाल ये भी है कि क्या इन विवादित बयानों को भी इन आंसू की धार से धोने की कोशिश की गयी है. पीड़ा, संवेदना और भावुकता के नाम पर बहे ये आंसू क्या सियासी लक्ष्य भेद पायेंगे.

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