Opinion

‘बंद’ से हासिल क्या होता है?

Shrinivas

इस सवाल के बजाय पहले इस पर विचार करें कि ‘बंद’ की सफलता का पैमाना क्या है? जिस बंद को सफल बनाने के लिए उसके आयोजकों और समर्थकों को झुंड में, कई बार या अक्सर लाठी-डंडों के साथ सड़कों पर निकलना पड़े, उसे सफल कहना मुनासिब है? आप लोगों से कह रहे हैं कि घर से न निकलें; और खुद ही निकल पड़े! सिर्फ यह देखने निकलते कि बंद की अपील का कितना असर है, तब भी एक बात होती. मगर बंद समर्थकों को मालूम रहता है कि उनकी ‘अपील’ का प्रभाव नहीं पड़ेगा. अंत: वे भीड़ में निकलते हैं. कहने को ‘शांतिपूर्वक’ अपील करने, लेकिन सबको पता है कि उस ‘अपील’ के पीछे अपील न मानने पर ‘देख लेने’ की अघोषित चेतावनी छिपी होती है. बहुतेरे उत्साही समर्थक तो ‘विनम्र’ होने का दिखावा भी नहीं करते. और उनके आसान शिकार वाहन चालक, खास कर ऑटो और रिक्शावाले और छोटे दुकानदार होते हैं.

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कहा जरूर जाता है कि ‘आवश्यक सेवाओं को बंद में छूट रहेगी’, मगर व्यवहार में अक्सर यह छूट बेमानी हो जाती है. बड़े प्रतिष्ठान तो अनिष्ट की आशंका से खुद ही बंद कर देते हैं. अनेक सरकारी-गैर सरकारी संस्थानों के कर्मचारी इंतजार करते हैं कि बंद समर्थकों का झुंड पहुंचे और वे ‘लाचारी में’ संस्थान बंद कर घर जा सकें. मेरा अनुभव और आकलन यह है कि बंद का ‘सफल’ होना (विरल अपवादों को छोड़) बंद समर्थकों की हंगामा और उत्पात करने की क्षमता पर निर्भर करता है.

बेशक जिन राज्यों-शहरों में बंद समर्थक दलों-संगठनों का कुछ प्रभाव या आधार होता है, वहां तुलना में बंद अधिक ‘असरदार’ दिखता है. लेकिन वहां भी वह स्वत:स्फूर्त होता है, यह कहना सही नहीं है.

कोई बंद ऐसा होता है, जिसे समर्थक ‘सफल’ और विरोधी विफल नहीं बताते? ऐसा लगता है, मानो पहले से तैयार ऐसे बयान शाम को जारी कर दिये जाते हैं. एक के अनुसार बंद को जनता का अपार समर्थन मिला होता है; दूसरा कहता है- बंद को जनता ने एकदम नकार दिया. दोनों अधूरा सच बोलते हैं.
आप जिस शहर, जिले और राज्य में हैं, अधिक से अधिक उस जगह बंद के सफल होने का दावा कर सकते हैं. देश भर में बंद सफल हो गया, ऐसा कहने का कोई आधार नहीं है.

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मीडिया कितना भी एकांगी और बेईमान हो गया हो, वहां भी पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में 270सितंबर के बंद की सफलता को दर्ज किया गया है. बाकी जगहों पर आंशिक. मेरे खयाल से यही सच भी होना चाहिए. बिहार में भी असरदार रहा, एक तो शायद इसलिए कि बिहार में जनांदोलन की एक धारा रही है, आन्दोलन की पृष्ठभूमि के लोग अब भी सक्रिय हैं. मगर अधिक इसलिए कि इस बंद में राजद शामिल था, जिसकी हंगामा कर सकने की क्षमता से सभी वाकिफ हैं. केरल में तो स्वाभाविक ही सफल रहा होगा जहाँ भाजपा की कोई हैसियत ही नहीं है. मगर अन्य राज्यों में?

अब सवाल है कि इस तरह के बंद से हासिल क्या होता है? क्या सचमुच बंद के ‘सफल’ होने से यह साबित हो गया कि पूरा देश ‘बंद’ बुलानेवालों के साथ, संबद्ध कृषि कानूनों और सरकार के खिलाफ है? क्या सरकार पर इसका कोई असर भी होता है? क्या इससे जनता की सहानुभूति मिलती है? क्या यह संभव नहीं कि रोज कमाने-खाने वाले, जिनमें अन्यथा सरकार के प्रति नाराजगी हो फिर भी वे बंद को पसंद न करें, क्योंकि इससे उनकी एक दिन की कमाई मार खा जाती है? इस तरह बंद का विपरीत असर भी हो सकता है. आम आदमी जिसे बंद के मुद्दों की कोई समझ नहीं है न किसी दल विशेष का समर्थक या विरोधी है, उसे जब जरूरी काम से निकलने में भी परेशानी उठानी पड़ती है, तो वह बंद को किस हद तक पसंद करेगा?

निश्चय ही शांतिमय आंदोलन में अन्य तरीकों की तरह ‘बंद’ भी एक तरीका/औजार रहा है. मैं खुद अनेक ‘बंद’ के साथ रहा हूं. एक्टिव रहा हूं. अब भी, किंचित असहमति के बावजूद जो मुद्दे सही लगते हैं, उन पर जोर डालने के लिए आहूत बंद का समर्थन करता हूं. लेकिन अब लगने लगा है कि इसकी उपयोगिता पर पुनर्विचार करने की जरूरत है. यदि क्षमता और तैयारी हो, तो संबद्ध सरकार के प्रतिष्ठानों का घेराव कर अधिकतम गिरफ्तारी देना, बंद का एक ज्यादा असरदार विकल्प हो सकता है.

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