Opinion

अब हम क्या करें?     

Ileka Priya

आज इन सड़कों का असली महत्व पता चल रहा था, जो दिल्ली को झारखंड से जोड़ रही थी. महाराष्ट्र को बिहार से जोड़ रही थी. क्योंकि इनपर ही चलकर हजारों मजदूर घर लौट रहे थे. लॉकडाउन के बाद मालिकों ने पैसे नहीं दिये थे,  मकान मालिक ने घर से निकलने पर मजबूर कर दिया था.

“ये लोग फैक्ट्रियों मे जाते हैं, जाने कितने लोगों से मिलते हैं. फिर यहां भी तो झुंड में रहते हैं.  कहीं किसी को बीमारी ने पकड़ा होगा,  तो खामख्वाह हमारे घर में फैल जाएगा”  मकान मालिक ने यही सोचकर उन्हें तत्काल कमरा छोड़ने को कह दिया.

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पहले तो वे हटना नहीं चाहे. पर कब तक यह जिल्लत, यह अपमान सहते, जो हर रोज मकान मालिक देता था. वैसे भी जेब में पैसे बचे नहीं थे. सरकारी कागज में  प्रवासी मजदूर जो थे, इसलिए एक भी सुविधाएं उनके हाथ न लगी. अब तो राशन भी खत्म हो गया था और सरकारी गोदामों से अनाज मिल रहा था या नहीं पर सरकारी व्यवस्था की मिल रही जिल्लते, जहां एक मजदूर की भीख मांगते भिखारी से ज्यादा कोई महत्व न था, झेलनी पड़ रही थी. इस अपमान और जिल्लत से अच्छा है, घर चले जाएं उन्होंने सोचा और अंततः उन्होंने रूम छोड़ दिया.

“अपनों के पास रहेंगे, भूखे रहेंगे चाहे जैसे भी, इन जिल्लतो से छूटकारा तो मिलेगा.”

अभी वे हाईवे पर जा रहे थे. मजदूरों का एक जत्था बस स्टैंड  पर गया था,  पर बसों में पैसे की वसूली देखकर वापस आ गया.  वैसे उसमें भी मजदूर ही जा रहे थे, जिनके पास इतने पैसे थे कि गाड़ी का भाड़ा दे सके. जब उन्होंने  बस और ट्रेनों  की  व्यवस्था की खबर सुनी, तो कुछ  राहत महसूस किया. सरकार का ऐलान था भाड़े का 85% भाग केंद्र सरकार और 15% भाग राज्य सरकार देगी. लेकिन यहां बेहाल और तंगहाल मजदूरों  की बची खुची राशी भी निचोड़ी जा रही थी.  मजदूरों  ने जब घर लौटने का फैसला कर लिया हो, तो उनके जेब में बचे चंद पैसे को उनकी इस मजबूरी को भूनाकर निचोड़ डालने का शायद यह सबसे आसान व्यवस्था थी और जिनके पास इतने भी पैसे नहीं बचे थे, उनके लिए पैदल चलने के सिवाय और कोई  रास्ता  न था.

अब सारी भीड़ हाइवे पर चल रही थी, उसी हाईवे पर जिसपर दो दिन पहले रात को सोए लोगों   पर गाड़ी चढ़ गयी थी. चार लोग मर गये थे.

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सर पर चिलचिलाती धूप था, रौशन ने दामोदर भाई से पूछा- क्या लगता है दामोदर भाई, इस धूप में हम चल पाएंगे.

दामोदर ने कहा- “जब फैक्टरी में हम तपती गर्मी में काम कर सकते हैं,  तो इस धूप में भी चल लेंगे रौशन भाई,   अगर रस्ते में दुर्घटना में न मरे तो.”

वे 60 किलोमीटर चल चुके थे. किसी ने सर पर गमछा बांध रखा था, कोई बैग सर पर रखे हुए था. मुंह पर किसी ने रूमाल बांधा था और किसी ने मास्क! जिन्होंने पहली बार ही काम के लिए इतना दूर का शहर चुना था, उसके लिए मजदूर होने का यह दर्द ज्यादा कष्टकारी मालूम पड़ रहा था. चलते-चलते उनके पैर थरथरा रहे थे, गर्मी सर पर चढ़ रही थी, प्यास ज्यादा लग रही थी और पूरे जत्थे को दस मिनट रूक जाने को मजबूर कर रहे थे.

“अगर इतना रूकेंगे, तो महीनों बीत जाएंगे भइया! काका को देखो इन्हें दम्मा है फिर भी चल रहे है.”

“हां भइया हम मजदूर है! इतना कमजोर होंगे तो नहीं चलेगा.”- बीच बीच में कोई कुछ-कुछ कहता रहता.

अभी वे 65 किलोमीटर चले ही थे कि कुछ लोग सड़कों पर जमा नजर आए. उस भीड़ को देखकर मन संशय से भर उठा, किसी आशंका की भय सता रही थी. किसी महिला के आवेश में भरी आवाज आ रही थी. उनका शक सही था.

रास्ता पुलिस वालों ने रोक रखा था. एक औरत जिसके गोद में दो-तीन साल का बच्चा था,  बौखलाई हुई बोल रही थी”- कहां जाए साहब ! आप ही बताइए ! 800  किलोमीटर चल चुके हैं. गोद में  बच्चा है, खाना नहीं  खाए हैं, साहब चलते- चलते चप्पल घीस गया है. रोते-रोते बच्चा सो गया. आप कहते हैं कि आगे नहीं जाने देंगे. क्यों  नहीं  जाने देंगे?  हम यहां  धूप में कहां जाए? ”

“जहाँ  जाना है वहां जाइए,  पर आगे हम नहीं जाने देंगे पहले राज्य में सीमा प्रवेश का परमिशन लेकर आइए.”- एक पुलिस आफिसर ने गरज कर कहा.

“हम अभी कहां से लेकर आए. हूजूर ! हम क्या करें?”- बूढ़े शतीश ने रूंधी आवाज में पूछा.

“जहाँ  से आए हैं, वहां वापस जाइए.  किसने कहा था बिना जानकारी के चल देने को. देश में लॉकडाउन है और आपलोग तमाशा कर रहे हो?  जाना है तो बस से जाओ, ट्रेन से जाओ”- दूसरे पुलिस वाले ने रौब दिखाया.

“हमारे पास पैसे नहीं है सर भाड़ा देने का ! किड़े-मकौड़े नहीं है न हम. हम भी तो इंसान है !”- मनोज ने कहा.

“जो करना है करो. हम नहीं  जाने दे सकते हम अपनी ड्यूटी कर रहें  है.”- पुलिस  वाले ने कन्नी काटी.

“लोगो को सड़क पर मरने पर मजबूर करना आपकी ड्यूटी है”- उस महिला ने आवेश में कहा. वह बार-बार उस चादर को ठीक कर रही थी, जिसे उसने गोद मे सोए बच्चे को धूप से बचाने के लिए ओढ़ा रखा था.

“एक तो कानून तोड़ते हो, उपर से बहस लगाते हो. चल जल्दी से सड़क खाली कर, वरना खदेड़-खदेड़  कर पीटेंगे, सब होश ठिकाने आ जाएगा.”- एक पुलिस आफिसर डंडा भांजते हुए आगे बढ़ा जैसे अपने कला का कौशल दिखा रहा हो. भीड़ पीछे हटी.

” सर अभी हम क्या करें ? “-  दामोदर ने आगे बढ़कर कहा.

“अरे हम नहीं जानते हैं, जल्दी से सड़क खाली करो. पैदल चलने हम नहीं दे सकते, गाड़ी में जाओ ,नहीं  रोकेंगे. सरकार का एलान है एक भी व्यक्ति पैदल नहीं  चलना चाहिए. जाओ बस स्टैंड जाओ!- उस ऑफिसर ने राय देते हुए कहा.

“जेब में पैसे नहीं है साहब! जाने दीजिये.”

“देखता क्या है चलाओ डंडा इनलोग पर, तो मालूम चलेगा.”

पुलिस ने डंडा चलाना शुरू किया. किसी के पैर पर मारा, किसी की पीठ पर मारा. भगदड़ से गोद में सोया बच्चा भी जाग गया और वह दृश्य देखकर रोने लगा.

“पैर में फफोले उठ आए है, गर्मी से जान जा रही है बाप ?   ये जाने नहीं दे रहे?” – कोई रूंधती आवाज में  बोला. कोई सर पीटने लगा. जिन आंखों ने रोना नहीं सिखा था वह भी दहाड़ मारकर रो पड़ा था,  सड़कों को रोना आ रहा था, लाठियां चलते-चलते कांप उठी थी, बच्चे के रोने की आवाज ने हर निर्जीव को सजीव कर दिया था. पुलिस  वाले अंधाधुंध लाठी चला रहे थे.  कुछ देर बाद थक जाने के कारण वे रूके, सर से बहता पसीना हटाया और बुदबुदाए”- दिमाग गर्म कर देते हैं साले!”

अब कोई रास्ता न था. चोट खाई भीड़ सड़क के किनारे उस गर्म जमीन पर बैठ गई.

एक घंटे में जगह खाली करो वरना….”- पुलिस वाले धमकाकर अपने कैंप में चले गये. दो नये सिपाही निगरानी के लिए तैनात हो गये.

सड़कों के किनारे भी कोई  ठहरने की जगह न थी. अगर होती भी तो क्या होता?  सारा दिन वहीं बैठे तो नहीं गुजारा जा सकता था. वे घर के लिए निकले थे अपने घर के लिए,  जो राज्यों की सीमा फांदकर बिल्कुल ही नहीं जाती थी.

“दामोदर भइया क्या किया जाएगा?  दो दिन पहले भी यहां से लोगों को खदेड़ा गया था. पता नहीँ बेचारे कहां गये होंगे?”- रौशन ने कहा. वह महिला वहीं बैठकर अपने बच्चे को शांत कर रही थी जो भय से अब तक रो रहा था.

जितने लोग घर से चले थे, अब कहीं ज्यादा हो गये थे, क्योंकि सुबह से ही जिन लोगों को जाने नहीं दिया गया था,  वे सभी यहां जमा थे. मजबूरों की एक भीड़ यहां रो रही थी, बिलख रही थी. अब क्या करें?

दूर सड़क पर कुछ और लोग भी आते नजर आए. दस पंद्रह लोग जो आकर फिर इस भीड़ में शामिल हो गये. धूप अब एकदम सर पर था, सबसे तीखा रूप धारण किये. रौशन ने चादर निकालकर टेम्परेरी छांवनी  बनाने की कोशिश की पहले तो पुलिस वाले ने रोका फिर अपनी ड्यूटी पर तैनात हो गये.

पर इस छांवनी को भी घंटे भर में हटाना था, सवाल वही था अब क्या करें?

उसी क्षण दामोदर उठा और पुलिस कांस्टेबल से बोला – हम पानी लेने जा रहे है. प्यास लगी है सभी को ?”

कांस्टेबल ने उसकी ओर देखा फिर कैंप की ओर झांका और जल्दी  से जाने का इशारा कर दिया.

दामोदर भाई ने फिर भीड़ को संबोधित करते हुए कहा- आपलोग कहीं न जाइएगा. हम अभी आते हैं.

वे और मनोज दोनो चले गये. कुछ देर में वे वापस आए.

हाथ में पानी का भरा बोतल था सभी को पानी देते हुए दामोदर भाई बोले-” यहां बहुत शख्ती है भइया, हम आगे नहीं  जा सकते. क्या करें कुछ समझ नहीं आ रहा. ऐसा लगता है हम मजदूर न होकर कोई किड़े मकौड़े हैं, जहां जा रहें,  वहां जिल्लत और अपमान सहना पड़ रहा है. हमारी हालत ऐसी है कि जिंदा घर पहुंचेंगे या मुर्दा पता नहीं. पर चलना भी जरूरी था न चलते तो करते क्या?”

” हमारे लिए तो यहीं  आप्शन थे कहां मरे मुंबई,  दिल्ली के कमरों  में  भूख से, सड़कों पर चलकर,  कुचलकर, थककर या पुलिस की मार खाकर? और मकान मालिक  भी तो खदेड़  रहा था. अभी कोई  हमसे यह नहीं पूछ रहा इतनी गर्मी में कैसे जाओगे?  इतनी दूर चलकर पैर दर्द से फट नहीं रहे, पैर में फफोले नहीं  उठ रहे? आपके साथ ये बच्चे कैसे जा रहे हैं?  इनका बचपन दर्दनाक न हो जाएगा?  भर पेट खाना खाया, पानी पिया?  इतना इतना दूरी पैदल चलना कोई मजाक नहीं है, पर इनके लिए हम मजाक हैं?  इंसानियत  से बढ़कर इनके लिए  नियम है, ऐसे नियम जो इन्होंने बनाए है, अपनी सहूलियत के लिए हमारी बदहाली के लिए.”

“इनके पास खिलाने के लिए खाना नहीं डंडा है. तो दोस्तों! हम खाएंगे डंडे, ठीक से खाएंगे. मगर इन्हें भी एहसास दिलाकर खाएंगे कि हम कीड़े-मकोड़े नहीं है.”

“हम अभी देखकर आए हैं,  डीसी ऑॅफिस. हम वहीं जाकर धरना देंगे.  जवाब मांगेंगे कि हम क्या करें?”- मनोज ने कहा.

“अब क्या करें” का कोई जवाब न था. सारे सरकारी अधिकारी नियम बनाने और उसे चलाने में व्यस्त थे. किसी मजदूर संगठन को भी मदद करने पर कड़ाई थी. भीड़ ने अनिश्चित ही सही पर रास्ता ढुंढ निकाला था.  मनोज जैसे नौजवानों ने अपनी योजना मोबाइल  पर अपलोड  भी कर दी थी. यह भीड़ मजदूरों की भीड़  किसी एक जगह से नहीं आई थी.

न ही सभी एक-दूसरे को जानते ही थे,  शायद कहीं और होते तो घर बार जाति-धर्म  पूछकर अपने बीच की दूरी को आंकते पर अब सभी संगठित थे. जैसे सभी उपेक्षित कर खड़े किये गये थे एक ही कतार में,  अब उसी कतार में वे संगठीत थे. रोते बिलखते नहीं, दंभ भरते. अब  भी डंडे पड़ेगे पर रोते बिलखते नहीं. अब डंडे का उन्हें गम न था. अब जो होगा देखा जाएगा कम से कम सड़क पर खड़े  होकर यह तो नहीं  सोचना पड़ेगा अब हम क्या करें?

डिस्क्लेमर: ये लेखिका ने निजी विचार हैं.

 

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