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पश्चिमी यूपी : जिसके साथ जाट, उसी की ठाट

17 प्रतिशत जाट मतदाता तय करते हैं पश्चिमी यूपी का भाग्य

Gyan Ranjan

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर सभी दलों के सियासी दांव चरम पर हैं. देखा जाये तो चुनाव को लेकर एजेंडा भले ही सभी दलों के अलग-अलग हों लेकिन जातिगत राजनीति की बिसात सभी दलों के द्वारा फेंकी जा रही है. मुद्दों से इतर कैसे जातिगत समीकरण को अपने पक्ष में किया जाये इसकी जोर आजमाईश चरम पर है. जातिगत समीकरण को देखा जाये तो यूपी में सबसे ज्यादा पिछड़ी जाति के मतदाता हैं, उसके बाद अनुसूचित जाति के. पिछड़ी जाति के मतदाताओं में भी कई टुकड़े हैं जो अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में अपना प्रभाव रखते हैं. आज हम बात कर रहे हैं पश्चिमी यूपी की जहां पहले चरण में मतदान होना है. इस क्षेत्र में जाट मतदाताओं की एक तरह से ठाट है. उत्तर प्रदेश में जाट समुदाय भले ही 3 से 4 फीसदी के बीच है, लेकिन पश्चिमी यूपी की सियासत का बेताज बादशाह यही समुदाय है.

ऐसे में जाट वोटर सूबे के सियासी समीकरण को बनाने और बिगाड़ने की ताकत रखते हैं. विधानसभा चुनाव के शुरुआती दोनों चरणों में जाट वोटर काफी अहम हैं. जिन्हें साधने के लिए सपा-आरएलडी ने गठबंधन कर रखा है तो बीजेपी ने अच्छी खासी संख्या में टिकट देकर उन्हें साधने का दांव चला है.

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पश्चिमी यूपी की सियासत में एक बात कही जाती है कि जिसके जाट, उसी के ठाट. यही वजह है कि पश्चिमी यूपी को जाटलैंड के नाम से जाता है. उत्तर प्रदेश विधानसभा की शुरुआत इसी जाटलैंड इलाके से हो रही है, जहां जाट समुदाय के नेता माने जाने वाले आरएलडी प्रमुख जयंत चौधरी का सियासी भविष्य तय होगा.

किसान आंदोलन के चलते पश्चिमी यूपी के जाट वोटों पर सभी की निगाहें लगी हैं, क्योंकि बीजेपी भी जाट वोटों पर दांव खेल रही है. जयंत चौधरी सपा के साथ हाथ मिला कर उतरे हैं. ऐसे में देखना है कि जाट मतदाता किसके साथ जाता है?

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पश्चिमी यूपी में 17 फीसदी के करीब है जाट मतदाता

उत्तर प्रदेश में भले ही जाटों की आबादी 3 से 4 फीसदी के बीच है, लेकिन पश्चिमी यूपी में 17 फीसदी के करीब है. लोकसभा की एक दर्जन से ज्यादा और विधानसभा सीटों की बात करें तो 120 सीटें ऐसी हैं जहां जाट वोट बैंक असर रखता है. कुछ सीटों पर जाट समाज का प्रभाव इतना ज्यादा है कि हार-जीत तय करने की ताकत रखते हैं. पश्चिमी यूपी में 30 सीटें ऐसी हैं, जिन पर जाट वोटर्स को निर्णायक माना जाता है.

2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने पश्चिमी यूपी की 17 सीटों पर जाट प्रत्याशी उतारे हैं तो आरएलडी ने 9 और सपा ने अपने खाते से तीन जाट प्रत्याशी दिये हैं. वहीं, बसपा ने भी 10 जाट उम्मीदवार को टिकट दिये हैं और माना जा रहा है कि करीब 19 टिकट जाट उम्मीदवारों को दिये जा सकते हैं.

कांग्रेस ने जाट समुदाय पर बहुत बड़ा सियासी दांव नहीं खेला है. यूपी के सहारनपुर, कैराना, मुजफ्फरनगर, मेरठ, बागपत, बिजनौर, गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, मुरादाबाद, संभल, अमरोहा, बुलंदशहर, हाथरस, अलीगढ़, और फिरोजाबाद जिले में जाट वोट बैंक चुनावी नतीजों पर सीधा असर डालता है.

बीजेपी के तीन जाट सांसद हैं और विधानसभा की बात करें तो फिलहाल 14 जाट विधायक हैं. 2017 के चुनाव में सपा, बसपा, कांग्रेस से एक भी जाट विधायक नहीं बन सका था जबकि आरएलडी से जीते एकलौते विधायक ने भी बीजेपी का दामन थाम लिया था.

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यूपी की जाट राजनीति

पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह को जाट समुदाय का मसीहा माना जाता है, जिन्होंने राजनीति की शुरुआत भी कांग्रेस से ही की थी. 1967 में चरण सिंह ने कांग्रेस को अलविदा कह कर अपने समर्थक विधायकों के साथ क्रांति दल नाम से पार्टी का गठन किया था. इसके बाद वो पहले गैर-कांग्रेसी यूपी के मुख्यमंत्री बने और फिर बाद में देश के प्रधानमंत्री बने. चौधरी चरण सिंह और किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत की ठाट ऐसी कि बिना इनके केंद्र में सरकार बन पाना मुश्किल हो जाये.

शुगर बाउल, किसान बेल्ट, जाट लैंड, जाट-मुस्लिम एकता की प्रयोगशाला, ना जाने कितने नामों के पहचान रखने वाले वेस्ट यूपी में हर किसी की नजर चुनाव में जाट समाज के रुख पर रहती है. कहावत है कि ‘जिसका जाट उसके ठाट’.

इसकी एक वजह यह भी है कि चौधराहट करनेवाले जाट समाज के पीछे अन्य जातियों का रुझान भी यहां तय होता रहा है. कभी पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के नाम पर एकजुट रहने वाला जाट समाज 2014 में पूरी तरह से मोदी लहर में बह गया था. नजीता वेस्ट यूपी में हर लोकसभा सीट पर कमल खिला.

हालात ऐसे हो गये थे कि जाट समाज के बल पर सियासत करनेवाले आरएलडी के अध्यक्ष अजित सिंह और जयंत चौधरी के साथ किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के बेटे राकेश टिकैत भी मोदी की सुनामी में बह गये थे.

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कैसे बिगड़े थे समीकरण

2013 में मुजफ्फरनगर दंगे के बाद वेस्ट यूपी का राजनीतिक और सामाजिक ताना बाना ही बदल गया. बीएसपी का दलित-मुस्लिम, आरएलडी का जाट-मुस्लिम और एसपी का मुस्लिम-पिछड़ा समीकरण बिगड़ गया था. बीजेपी ने सवर्ण वोटों के साथ जाट और दूसरे पिछड़ों को साधकर 2014 में कामयाबी हासिल की थी. दंगे के बाद यहां चौधरी चरण सिंह के वक्त तैयार हुआ सियासी ‘अजगर’ यानी अहीर, जाट, गुर्जर और राजपूत और ‘मजगर’ मतलब मुसलमान, जाट, गुर्जर और राजपूत की एकजुटता भी धराशाही हो गयी थी.

यहां तक कि किसानों की लड़ाई लड़नेवाले महेंद्र सिंह टिकैत का परिवार भी इस किसान बिरादरी (जाटों) को बीजेपी के पक्ष में जाने से नहीं रोक पाया था. दंगे के साथ कैराना से पलायन, लव जिहाद जैसे मुद्दों से खाई बढ़ती चली गयी.

दरअसल, चौधरी टिकैत जाटलैंट में चौधरी चरण सिंह की नीति मुसलमान के साथ आगे बढ़ने की रखते थे. वह अपने हर आंदोलन में गुलाम मोहम्मद जोला से ही अध्यक्षता कराते थे.

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विधानसभा चुनाव में क्या रहेगा रुख

मौजूदा विधानसभा चुनाव में वेस्ट का जाट किसका साथ देगा? आरएलडी उनका भरोसा जीतेगा. अजित सिंह और जयंत चौधरी की ‘सद्भाव यात्रा’ और सांप्रदायिक एकता सभाओं से बना माहौल हालात बदलेगा या दंगे के मुकदमे वापसी के दांव चलने वाली बीजेपी संग 2014 की तरह साथ देगा, लेकिन सियासी जानकार मानते है कि माहौल बदल रहा है.

इसके साथ ही केंद्र और प्रदेश की सरकारों की तरफ से किसान हित में उम्मीद के मुताबिक कदम नहीं उठाने की नाराजगी भी हैं. खासकर गन्ना मूल्य भुगतान, बड़ी बिजली दरें, 15 साल पुराने ट्रैक्टर की बंदी, किसान आंदोलन का दमन नाराजगी की वजह हैं. इस बदलाव पर बीजेपी की पैनी नजर है.

इसी के साथ गठबंधन के लिए चुनौती यह होगी कि दंगे के बाद जाट मुस्लिम के बीच पैदा खाई पट जाये और वेस्ट में जाट और जाटव (दलित) अपनी पुरानी अदावत भूलकर साथ आ जाये, तब तस्वीर जुदा होने से इनकार नहीं किया जा सकता.

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खाप भी रखती है सियासत पर असर

वेस्ट यूपी में ज्यादातर दलों के उम्मीदवार खाप चौधरियों की चौखट पर दस्तक देते रहे हैं. हालांकि, खाप चौधरियों ने हमेशा खुद को अराजनीतिक बताया. बालियान खाप के मुखिया चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत ने 1991 के चुनाव में बड़े ही सलीके से बीजेपी की तरफ इशारा कर दिया था. 1996 में भारतीय किसान कामगार पार्टी (वर्तमान राष्ट्रीय लोकदल) के पक्ष में टिकैत ने वोट देने को कह दिया था.

2007 में खतौली विधानसभा क्षेत्र से महेंद्र सिंह टिकैत के पुत्र और भाकियू प्रवक्ता राकेश टिकैत ने सियासी चोला पहनाकर चुनाव लड़ा, लेकिन वह हार गये थे. 2012 में अमरोहा लोकसभा सीट से भी राकेश को हार का मुंह देखना पड़ा था.

कई बार सियासी दलों ने खाप चौधरियों के पसंदीदा को कैंडिडेट बनाया. कलस्यान खाप राजनीति दोनों में भी सक्रिय हैं. चौधरी मुख्तयार सिंह खाप चौधरी रहे और बाबू हुकुम सिंह राजनीति में बड़ा नाम कमाया.

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क्या भाजपा 2017 को रिपीट कर पायेगी

लाख टके का सवाल यह है कि जिस तरह से जाट समुदाय का समर्थन भाजपा को 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव एवं 2017 के विधानसभा चुनाव में मिला था, क्या उसे रिपीट कर पायेगी. यह सवाल इसलिए उठ रहा है कि पहले का समीकरण और अभी के समीकरण में काफी अंतर है. इस बार समाजवादी पार्टी के साथ आरएलडी भी है. आरएलडी की राजनीति तो जाट समुदाय के भरोसे से ही है. वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में पिछड़ी जाति के कई नेताओं ने भाजपा का दामन थामा था और नतीजा यह हुआ था कि यादव को छोड़ कर कई पिछड़ी जाति का समर्थन भाजपा को मिला था. इस बार मामला अलग है.

जिन पिछड़ी जाति के नेताओं ने पिछले चुनाव में भाजपा का दामन थामा था इस बार उनमें से अधिकांश समाजवादी पार्टी के साथ हो लिये हैं. ऐसे में जाटलैंड में अपनी वापसी भाजपा कर पायेगी यह तो चुनाव परिणाम ही बतायेगा.

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