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वेब सिरीज ‘ग्रहण’ की सफलता के बाद झारखंड की कहानियों का स्कोप बढ़ेगाः सत्य व्यास

पढ़िए क्या कहते हैं वेब सीरीज ‘ग्रहण’ की मूल कहानी के लेखक

Samir Sinha

Ranchi: नयी वाली हिंदी के चर्चित हस्ताक्षर सत्य व्यास यूं तो किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं, लेकिन अब उनकी उपलब्धियों में एक नया आयाम जुड़ गया है. उनकी लोकप्रिय व बेस्टसेलर रचना ‘चौरासी’ पर वेब सीरीज ‘ग्रहण’ बनकर तैयार है. दंगे की त्रासदी के बीच उपजी प्रेम कहानी पर बनी इस वेब सीरीज को लेकर हमने सत्य व्यास के साथ खास बातचीत की है.

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पढ़िए उसके प्रमुख अंश…

NewsWing: नयी वाली हिन्दी के लेखकों में आप संभवतः पहले हैं जिनकी लेखनी को पर्दे पर फिल्माया गया. इस उपलब्धि पर नयी वाली हिंदी के पोस्टर बॉय सत्य व्यास क्या सोचते हैं?

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सत्य व्यास: देखिए, पोस्टर बॉय वाली इमेज तो खैर अब मेरी रही नहीं है, लेकिन मैं चाहूंगा कि आप में से अब कोई निकले और पोस्टर बॉय बने. हां, मैं भाग्यशाली हूं कि नयी वाली हिन्दी का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मुझे मिला. मेरी किताब 84 पर वेब सीरीज बनी यह एक लेखक के तौर पर मेरे लिए खुशी की बात है. मैं पूरी टीम को धन्यवाद देना चाहता हूं.

NewsWing: ग्रहण से ही हमारा दूसरा प्रश्न है. वेबसीरीज की कहानी बोकारो में हुए 1984 के सिख दंगों के इर्दगिर्द बुनी गई है. जब किसी पुस्तक पर फिल्म या वेब सीरीज बनती है तो ये देखना दिलचस्प होता है कि पन्ने से निकलकर पर्दे पर पहुंची कहानी कैसी लगती है. 84 के लेखक के तौर पर जब आप ग्रहण को कैसे देखते हैं?

सत्य व्यास: सिर्फ एक लेखक के तौर पर नहीं, मैं फिल्मों का भी बहुत शौकीन रहा हूं. इस लिहाज से कह सकता हूं कि ग्रहण दर्शकों की उम्मीदों पर एकदम खरी उतरती है. सीरीज में रोल प्ले किए गए हैं वो कमाल के हैं. एक वेब सीरीज के रूप में ग्रहण कंप्लीट पैकेज है.

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NewsWing: कहानी को पटकथा में बदलते समय की राजनीति, सस्पेंस और थ्रिल के दृश्य डाले गए हैं. झारखंड की राजनीति को समझने वाले कह रहे हैं कि इसके कुछ पात्र झारखंड की रियल राजनीति के पात्रों से मेल खाते हैं. यह सिर्फ एक संयोग मात्र है या प्रयोग है?

सत्य व्यास: नहीं, ऐसा नहीं है. आज के लोग आम तौर पर वेब सीरीज को इसलिए पसंद करते हैं क्योंकि वो सच्चाई के करीब होती है. इसलिए कहानी को भी इस तरह से उठाया जाता है जिससे लोग जुड़ाव महसूस करें. अगर इसकी कहानी कहीं से मिलती है तो वह एक संयोग मात्र है.

NewsWing: ग्रहण को एक समुदाय विशेष की तरफ से ट्विटर पर बैन करने की मांग उठी थी. क्या इन चीजों से कुछ फर्क पड़ता है?

सत्य व्यास: नहीं, जब आप जख्मों को कुरेदेंगे तो दर्द होना लाजमी है. लेकिन हमें पूरी उम्मीद थी कि एक बार पूरी सीरीज देखने के बाद लोगों के जो भी गिले-शिकवे हैं वो दूर हो जायेंगे. और ऐसा ही हुआ. टीम की मेहनत को दर्शकों की तरफ से बहुत सराहना मिली.

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NewsWing: चौरासी अगर ए क्लास नॉवेल थी तो ग्रहण की स्क्रिप्ट ए प्लस है. इसमें कोई संशय की बात नहीं है. क्या ऐसा नहीं लगता कि वेब सीरीज में राजनीति-सस्पेंस जैसी चीजें थोड़ी हावी हो गयी हैं, जो सीरीज के लिहाज से अच्छी भी हो सकती हैं, लेकिन ऋषि और मनु की कहानी को थोड़ा और स्पेस दिया जा सकता था?

सत्य व्यास: जी हां, बेशक एक लेखक के रूप में भी मुझे लगा कि स्क्रीन प्ले लिखते वक्त अगर इस बात पे और ध्यान दिया जाता तो और बेहतर तरीके से इसे बनाया जा सकता था. लेकिन मैं एक बात और कहना चाहूंगा कि किताब लेखन और स्क्रीन प्ले के लेखन में अंतर होता है तो जो वहां के लोग हैं वो इन चीजों हो हमसे बेहतर समझते हैं.

NewsWing: क्या आपको लगता है कि ग्रहण के साथ झारखंड की कहानियों के कैनवास को विस्तार मिलेगा?
जी हां, बिल्कुल मेरी भी एक किताब आ रही है. संभवत: वो लातेहार के नाम से आये. झारखंड में कहानियों की संभावना है.

इससे पहले भी जामताड़ा आ चुकी है. वासेपुर की भी बहुत प्रशंसा हुई है. आने वाले समय में झारखंड से अधिक कहानियां आयें, हम इसकी उम्मीद बेशक कर सकते हैं.

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