Opinion

हम शर्मिंदा हैं, हमारे प्रधानमंत्री और गृहमंत्री भी ले रहे हैं झूठ का सहारा

Faisal Anurag

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ओर गृहमंत्री झूठ का सहारा क्यों ले रहे हैं?  देश के अनेक हिस्सों में हो रहे भारी विरोध के बीच जिस तरह की आशंकाएं पैदा हो गयी हैं, उसे दूर करने के बजाय नरेंद्र मोदी और अमित शाह की बातों से हवा ही मिल रही है.

सीएए, एनपीआर और एनआरसी को ले कर भ्रम बढ़ा ही है. सीएए के बाद तुरंत एनआरपी की घोषणा ने देशभर की बेचैनी को बढा दिया है. पीपुल्स रजिस्टर और सीटीजन रजिस्टर को ले कर लोग गुमराह हैं. केंद्रीय कैबिनेट ने नेशनल पीपुल्स रजिस्टर में नये प्रवधानों की व्यवस्था जिस हड़बड़ी में की है, उससे सिटिजन रजिस्टर की दिशा में बढ़ने के संकेत मिलते हैं.

हालांकि गृहमंत्री अमित शाह ने दोनों के बीच किसी तरह के संबंध होने की बात को नकारा है. लेकिन मोदी सरकार कई बार दोनों के बीच के संबंधों की बात भी समय समय पर करती रही है.

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नरेंद्र मोदी ने दिल्ली के रामलीला मैदान से बोलते हुए जिस अंदाज एनआरसी के संबंध में बातें कहीं, वह उनकी ही सरकार के उन तथ्यों के उलट है, जो सरकार और संसद के दस्तावेजों में दर्ज हैं. डिटेंसन सेंटर को ले कर भी प्रधानमंत्री ने जो अनभिज्ञता जाहिर की वह झूठ है.

वास्तविकता को उनकी ही सरकार संसद में स्वीकार कर चुकी हैं. नवंबर में ही गृह राज्यमंत्री ने राज्यसभा में एक सवाल के जवाब मे सूचना दी है कि असम में छह डिटेंसन सेंटर हैं. और विभिन्न कारणों से इस सेंटर में अब तक 28 लोगों की मौत हो चुकी है.

गृहमंत्री ने भी इस संदर्भ में देश को गुमराह किया है. असम के ग्वालपाडा में तो सातवां डिटेंसन सेंटर निर्माण की प्रक्रिया में है. और कनार्टक में भी एक सेंटर बन रहा है, और एक बनकर तैयार है. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने कहा है कि महाराष्ट्र में कहीं भी डिटेंसन सेंटर नहीं बनाया जायेगा. इस तरह, वास्तविकता को सार्वजनिक रूप से नकारने के कारण लोगों के बीच आशंकाओं का प्रबल होना लाजिमी ही है.

प्रधानमंत्री मोदी ने तो इन दोनों सवालों पर जिस तरह झूठ का सहारा लिया है, उसका राजनीतिक मकसद स्पष्ट नहीं है. भाजपा के चुनावी घोषणापत्र में जब एनआरसी का वायदा किया गया है, तो फिर प्रधानमंत्री ने यह क्यों कहा कि 2.14 के बाद से उनकी सरकार में एनआरसी की बात नहीं हुइ्र है.

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जबकि उनकी ही सरकार ने अपने कार्यकाल में नेशनल रजिस्टर फार इंडियन सीटीजन का नोटिफिकेशन किया है. 2003 में अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार ने नागरिकता कानून में संशोधन किया. जिसमें एनआरसी का उल्लेख है. 2003 के इस संशोधन को तत्कालीन गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने प्रस्तुत किया था.

यह संशोधन भारत के 1955 के संशोधन में एक बड़ा बदलाव था. हालांकि इसके पहले भी कई संशोधन हुए. लेकिन बाजपेयी सरकार ने उसमें गैरकानूनी माइग्रेंट शब्द को जोड़ा. इसका गहरा अभिप्राय था. और इस संशोधन ने ही पिपुल्स रजिस्टर की बात की. इस संशोधन में कहा गया है कि पीपुल्स रजिस्टर की जांच कर एनआरसी तैयार किया जायेगा. और उसमें घुसपैंठ करने वालों की पहचान कर डिटेंसन सेंटर में भेजा जायेगा.

इस संशोधन के आधार पर ही 2010 में डा मनमोहन सिंह की सरकार ने पहली बार एनपीआर को शुरू किया. जिसके लिए कहा गया कि दो मतगणना के बीच में आंकडों के लिए सूचनाएं अपडेट करने के लिए इसकी शुरूआत की जा रही है. 2010 के एनपीआर और मोदी सराकर के एनपीआर में एक बडा फर्क है. मोदी सरकार ने सूचना हासिल करने का दायरा बढा दिया है.

जैसा कि अमित शाह ने ही लोकसभा में कहा था, क्रोनोलॉजी समझ लीजिए, पहले सीएए है, इसके बाद एनआरसी आयेगा, जो पूरे देश में लागू होगा. एनपीआर के बदलाव को वे संसद भी छुपा ले गये. कानूनी प्रावधान के हिसाब से सरकार के एक सामान्य नोटिफिकेशन से ही एनसीआर की प्रक्रिया शुरू की जायेगी.

और एनपीआर की सूचनाओं की जांच के बाद लोगों से दस्तावेज मांगे जायेंगे. एनपीआर भी अब एक जटिल प्रक्रिया हो गयी है. हालांकि तत्काल इसमें कोई दस्तावेज नहीं देना है, लेकिन एनसीआर में उसे मांगा जायेगा. दोनों के बीच मामूली फर्क है. एनपीआर लोगों के दस्तावेजीकरण की प्रक्रिया है. जबकि एनआरसी नरागरिकों की पहचान की प्रक्रिया है.

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21 अप्रील 2015 को लोकसभा में तत्कालीन गुह राज्यमंत्री पी चैधरी ने एनपीआर और एनसीआर की बाबत जानकारी दी है. गृह मंत्रालय के 2018-19 की रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि एनपीआर एनसीआर की दिशा  में पहला कदम है. अमित शाह अब कह रहे हैं कि दोनों के बीच को कोई संबंध नहीं है.

लेकिन यह बात उन्होने एक न्यूज एजेंसी से बात करते हुए कही है, जो कि संसद में कही गयी बात के उलट है. 31 जुलाई 2019 की मोदी सरकार के एक नेाटिकिेशन में एनसीआर का उल्लेख है. 2003 के नागरिकता कानून के संशोधन के अनुसार इसके सेक्सन 31ए में जो कुछ कहा गया है, वह मोदी और शाह की बातों के खंडन के झूठ को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है.

संसद में नौ बार ऐसे अवसर आये हैं, जब कि मोदी सरकार ने एनपीआर और एनआरसी का लिंक जोड़ा है. 8 जुलाई 2014 को किरण रिजूजू ने बतौर गृह राज्यमंत्री कहा था कि एनपीआर एनआरसी की दिशा में पहला कदम है.

इतने पुख्ता प्रमाणों के रहते हुए भी मोदी ने जिस तरह सार्वजिनक तौर पर अनभिज्ञता का प्रदर्शन किया है, उससे अनेक सवाल उठ खड़े हुए हैं. पूछा जा रहा है कि तथ्यों पर पर्दा डालने के खेल में मोदी और शाह दोनों क्यो लगे हुए हैं. जबकि उनकी सरकार के दस्तावेज ही उनकी बातों को गलत साबित कर रहे हैं.

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