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जल, जंगल, जमीन प्राकृतिक धरोहर है न कि व्यक्तिगत संपत्ति

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Ranchi: संवाद एवं एक्शन एड के संयुक्त तत्वावधान में ”भूमि अधिग्रहण कानून 2013 एवं 2017” पर एचआरडीसी, रांची में राज्यस्तरीय विमर्श का आयोजन किया गया. इस विमर्श में राज्य के समाजकर्मी, बुद्धिजीवि, शामिल हुए. कार्यक्रम को संबोधित करते हुए शशि बारला ने कहा कि इस हम सभी को कानूनी जानकारी के साथ-साथ वैचारिक रूप से भी परिपक्व होना होगा, तभी हम अपने जल, जंगल, जमीन को बचा सकते हैं. जमीन के बिना आदिवासी अस्तित्व की कल्पना करना बेमानी है. इसलिए हम सभी को जमीन की रक्षा करना जरूरी है. इसके बाद पलामू से आये जीतेन्द्र एवं पोटका से आये हरिश भूमिज ने वर्तमान समय में भूमि संबंधी झारखंड के परिदृश्य को रखते हुए कहा कि अभी औने-पौने दामों पर भूमि अधिग्रहण जारी है, लोग इसके खिलाफ आंदोलन भी कर रहे हैं. विनोद कुमार ने झारखंड के पारंपरिक भू-व्यवस्था के बारे में बताते हुए कहा कि झारखंड की भूमि व्यवस्था अन्य राज्यों से अलग रही है. खूंटकट्टीदार भूमि व्यवस्था में भूमि समाज की होती है. खूंटकट्टीदार किसी को टैक्स नहीं देता है. वह मानता है कि जमीन पूर्वजों की देन है. जब से पब्लिक सेक्टर के तहत बड़े-बड़े कारखाने आदिवासी इलाके में बैठाये गये तब से प्राकृतिक संसाधनों का दोहन हुआ. आदिवासियों को उजाड़ा गया. वे विस्थापित होकर दर-दर की ठोकरें खाने पर विवश हुए. आज टकराव की स्थिति इसी कारण बनी हुई है और लोग संघर्ष कर रहे हैं. यदि दुनिया को बचाना है तो आदिवासी दर्शन ही दुनिया को बचा सकती है.

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आदिवासियों ने जंगल काट कर जमीन बनायी

पड़हा राजा उमल मुंडा ने अपने वक्तव्य में कहा कि आदिवासियों ने जंगल काट कर जमीन बनायी. पर आज जमीन उनसे छीनी जा रही है. हमें अपनी जमीन बचाने को लेकर संघर्ष करना होगा. अनिता गाड़ी ने अपनी बातों को रखते हुए कहा कि झारखंड में असंभव चीजें हो रही हैं. मोमेंटम झारखंड में हाथी को उड़ाया जा रहा है, क्या यह संभव है? इसके पीछे सबसे बड़ा कारण आदिवासियों की जमीन लूटने की है. आज ग्राम सभा को कमजोर करने की साजिश चल रही है.

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संघर्ष से बना कानून

दयामनी बारला ने संबोधित करते हुए कहा कि जमीन अधिग्रहण कानून 1894 को सब काला कानून कहते थे. जिसकी भी जमीन सरकार चाहती थी उसकी जमीन ले लेती थी और यह टेबल में काम करके ही हो जाता था. जब जमीन पर हक लेने जाते थे तब जमीन मालिक को मालूम पड़ता था. इसको लेकर अनेकों संघर्ष हुए तब जाकर भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्व्यवस्थापन कानून 2013 आया. दोनों कानूनों के कुछ मौलिक अंतर भी हैं. 2013 कानून के तहत सामाजिक प्रभाव आकलन अनिवार्य बनाया गया एवं हर स्तर पर उचित सूचनायएं देना जरूरी माना गया. भूमि लेने के पहले 70 प्रतिशत रैयतों की सहमति आवश्यक मानी गयी तथा पुनर्वास एवं पुनर्व्यस्थापन में गड़बड़ी करने वाले अफसरों पर कानूनी कार्रवाई की बात कही गयी थी. परंतु वर्तमान सरकार ने इसमें कुछ संशोधन किये इससे आदिवासी अस्तित्व पर संकट आन पड़ा. अब जो 2017 में संशोधन किये गये इसके तहत इस संशोधन के लागू होने से परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण से पहले सामाजिक प्रभाव का आकलन नहीं किया जाएगा तथा कृषि भूमि का अधिग्रहण किया जायेगा.

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हमें सामूहिक संपत्ति के बारे में सोचना चाहिएः घनश्याम

पत्रकार हेमंत ने ग्राम सभा के संवैधानिक अधिकारों के मान्यता पर बल दिया तथा कहा कि जब तक ग्राम सभाएं सशक्त नहीं होंगी तब तक आदिवासियों की जमीन इस तरह लुटती रहेंगी. घनश्याम ने व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणाओं को खत्म करने पर बल देते हुए कहा कि हमें सामूहिक संपत्ति की बात सोचनी चाहिए. जल, जल, जमीन प्राकृतिक धरोहर है न कि संपत्ति. व्यक्तिगत संपत्ति की चाहत ब्रिटिश उपनिवेश की देन है. हमें लड़ाई को वहां ले जाना होगा जहां से तिलका माँझी ने लड़ाई की शुरुआत की थी. जमीन सिंगबोंगा की देन है इसपर कोई कैसे टैक्स ले सकता है. आदिवासी समाज डेमोक्रेटिक रिपब्लिक है. हम सबों को भी झारखंड लोकतंत्रात्मक गणराज्य बने इसकी आवाज उठानी चाहिए. आज के विमर्श का संचालन एवं धन्यवाद ज्ञापन श्रावणी ने किया. इस विमर्श को सफल बनाने में शेखर, खालिद जमील अख्तर, राकेश कुमार राउत, डेविड, सैफ, जाकिर की मुख्य भूमिका रही.

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