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6000 का डस्टबिन 13000 रुपए में, जांच करवाएं मेयर: पार्षद

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Ranchi: रांची नगर निगम ने शहर में कचरा रखने के लिए जो डस्टबिन खरीदा था, उसमें घोटाले की बात सामने आयी है. निगम बोर्ड की गत सोमवार को आयोजित बैठक में विभिन्न पार्षदों ने इस बात को मेयर आशा लकड़ा के समक्ष प्रमुखता से रखा. पार्षदों का कहना है कि रांची में जितने भी डस्टबिन खरीदे गये थे, उनका बाजार मूल्य करीब 6,000 रुपये पड़ता है. जबकि निगम ने इसके बदले करीब 13,000 रुपये का भुगतान किया है. वहीं निगम की सहायक स्वास्थ्य पदाधिकारी किरण कुमारी ने पार्षदों की इस मांग को सिरे से खारिज किया है. उनका कहना है कि स्वच्छता मिशन के तहत 40 लाख रुपये खर्च कर करीब 500 डस्टबिन खरीदे गये थे. इस तरह एक डस्टबिन का मूल्य करीब 8,000 रुपये पड़ा है. हालांकि इस राशि में इंस्टॉलेशन और ट्रांसपोर्ट की राशि भी शामिल है. उन्होंने यह भी कहा कि इस राशि का भुगतान निगम ने नहीं बल्कि रांची एमएसडब्ल्यू ने किया है.

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जांच करवायें मेयर, आखिर क्यों हुआ इतना खर्च ?

बोर्ड की बैठक में वार्ड नंबर 21 के पार्षद एहतेशाम ने निगम की तरफ से अधिक खर्च कर डस्टबिन खरीदे जाने का मुद्दा प्रमुखता से उठाया. उन्होंने कहा कि इस बात की उन्हें पुख्ता जानकारी है कि स्वच्छ भारत मिशन के तहत जितने भी डस्टबिन खरीदे गये, उस पर निगम ने ज्यादा राशि खर्च किया है. डस्टबिन की राशि बाजार में करीब 6000 रुपये है. जबकि निगम ने एक डस्टबिन पर करीब 13,000 रुपये खर्च कर दिया है. आखिर बाकी राशि कहां गयी, यह जांच का विषय है. इस पर मेयर को तुंरत ही जांच करवानी चाहिए. वार्ड नंबर 16 की पार्षद नजिमा रजा ने भी इस बात का समर्थन किया. उन्होंने कहा कि बाजार में उन्होंने इस बात की पड़ताल की है कि निगम ने जो डस्टबिन खरीदा है, उनका मूल्य केवल 6,000 रुपये है.

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क्वालिटी की हुई है उपेक्षा : डिप्टी मेयर

बोर्ड बैठक में ही डिप्टी मेयर संजीव विजयवर्गीय ने भी पार्षदों की मांग का समर्थन किया. उन्होंने कहा कि निगम के तरफ से जो डस्टबिन खरीदे गये थे, उनकी क्वालिटी को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं. इसके बाद भी ई टेंडर के माध्यम से रेट तय कर दिया. उन्होंने कहा कि अब इस पर क्या किया जा सकता है. इसप र वार्ड नंबर 27 के पार्षद ओमप्रकाश ने कहा कि अगर ऐसा ही है तो जब कोई पार्षद टेंडर डालते है, तो हमें बढ़ा कर क्यों नहीं राशि का भुगतान किया जाता है. उन्होंने कहा कि यह एक गंभीर मुद्दा है, इसकी जांच होनी चाहिए.

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पांच पार्षद बनायें कमिटी, करें जांच : मेयर

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मेयर आशा लकड़ा ने भी इस मुद्दे को काफी गंभीर बताया. उन्होंने पार्षदों को कहा कि मामले की जांच के लिए पांच पार्षद आपस में मिल कर एक कमिटी का गठन करें. इन्हीं पांच पार्षद में से एक अध्यक्ष बन, डस्टबिन में हुए घोटाले की जांच करें.

40 लाख में खरीदा 500 डस्टबिन

पूरे मामले पर निगम के सहायक स्वास्थ्य पदाधिकारी किरण कुमारी का कहना है कि करीब 40 लाख रुपये खर्च कर निगम ने करीब 500 डस्टबिन खरीदा था. डस्टबिन खरीदे जाने और शहर में लगाये जाने का जिम्मा रांची एमएसडब्ल्यू कंपनी को दिया गया था. शहर में लगे पूरे डस्टबिन की राशि का भुगतान कंपनी ने किया है, निगम ने नही. इसपर कंपनी के अधिकारी का कहना है कि टेक्निकली जब कंपनी ने शहर में डस्टबिन नहीं लगाया, तब निगम ने इसे लगा दिया. हालांकि जहां तक पार्षदों ने ज्यादा राशि खर्च कर डस्टबिन खरीदने का आरोप लगाया है, तो यह आरोप है. वह बेबुनियाद है.

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तो ई-टेंडर का क्या मतलब : उपनगर आयुक्त

डस्टिबन खरीदे जाने की बात पर निगम के उपनगर आयुक्त संजय कुमार ने बताया कि डस्टबिन खरीदे जाने की पूरी प्रक्रिया ई-टेंडर के माध्यम से की गयी है. ऐसे टेंडर में निगम कोई रेट तय नहीं करता, बल्कि निविदा करने वाले करते है. अगर कोई ऐसे टेंडर पर सवाल खड़ा करता है, तो टेंडर का कोई मतलब नहीं रह जाता है.

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