न्यूज़ विंग
कल का इंतज़ार क्यों, आज की खबर अभी पढ़ें

स्वैच्छिक न्यायेतर कबूलनामा के आधार पर दोषी ठहराया सकता है: सुप्रीम कोर्ट

125

New Delhi: सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि न्यायेतर कबूलनामा ‘‘कमजोर साक्ष्य’’ है और इसके आधार पर किसी व्यक्ति को तभी दोषी ठहराया जा सकता है जब अदालत इससे संतुष्ट है कि यह स्वैच्छिक रूप से किया गया है. जस्टिस आर. भानुमति और जस्टिस इंदिरा बनर्जी की पीठ ने कहा कि न्यायेतर स्वीकारोक्ति के मामलों में अदालतों को सुनिश्चित करना चाहिए कि यह विश्वास बढ़ाता है और अभियोजन के अन्य साक्ष्य इससे मेल खाते हैं.

इसे भी पढ़ें: झारखंड की सभी सीटों पर चुनाव लड़ेगी जदयू : श्रवण कुमार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘‘अदालत अगर संतुष्ट है कि न्यायेतर कबूलनामा स्वैच्छिक है तो दोष सिद्धि के मामले में इसे संज्ञान में लिया जा सकता है. आरोपी के न्यायेतर कबूलनामा को हर मामले में मिलान किए जाने की जरूरत नहीं है.’’  पीठ ने अपने फैसले में गौर किया कि स्वैच्छिक कबूलनामा के आधार पर दोष सिद्धि हो सकती है लेकिन विवेक के नियम के मुताबिक जहां भी संभव हो इसका स्वतंत्र साक्ष्यों से मिलान किया जाना चाहिए.

इसे भी पढ़ें: बच्चों की देखरेख के नाम पर अनुदान राशि का मनचाहा उपयोग कर रहे एनजीओ, जांच में हुआ खुलासा

पीठ ने कहा, ‘‘न्यायेतर कबूलनामा कमजोर साक्ष्य है और अदालत को सुनिश्चित करना चाहिए कि यह विश्वास बढ़ाता है और अभियोजन के अन्य साक्ष्यों से मिलता है।’’ इसने कहा, ‘‘न्यायेतर कबूलनामा को स्वीकार करने के लिए इसका स्वैच्छिक होना अनिवार्य है और यह विश्वास से परिपूर्ण हो।’’ सुप्रीम कोर्ट ने बैंक के एक पूर्व कर्मचारी के अपराधों को भ्रष्टाचार निरोधक कानून और भारतीय दंड संहिता की धाराओं के तहत बरकरार रखते हुए यह फैसला दिया.

इसे भी पढ़ें: इंडोनेशिया के भूकंप और सुनामी प्रभावित क्षेत्र से पांच हजार लोग लापता

याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया था कि मामले में उसे बैंक के अपने दो वरिष्ठ अधिकारियों के समक्ष इकबालिया बयानों के आधार पर दोषी ठहराया गया. उसने दावा किया था कि यह नहीं कहा जा सकता कि उसके इकबालिया बयान स्वैच्छिक थे. पीठ ने पांच वर्ष की जेल की सजा को घटाकर तीन वर्ष कर दी.

हमें सपोर्ट करें, ताकि हम करते रहें स्वतंत्र और जनपक्षधर पत्रकारिता...

Comments are closed.

%d bloggers like this: