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स्वैच्छिक न्यायेतर कबूलनामा के आधार पर दोषी ठहराया सकता है: सुप्रीम कोर्ट

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New Delhi: सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि न्यायेतर कबूलनामा ‘‘कमजोर साक्ष्य’’ है और इसके आधार पर किसी व्यक्ति को तभी दोषी ठहराया जा सकता है जब अदालत इससे संतुष्ट है कि यह स्वैच्छिक रूप से किया गया है. जस्टिस आर. भानुमति और जस्टिस इंदिरा बनर्जी की पीठ ने कहा कि न्यायेतर स्वीकारोक्ति के मामलों में अदालतों को सुनिश्चित करना चाहिए कि यह विश्वास बढ़ाता है और अभियोजन के अन्य साक्ष्य इससे मेल खाते हैं.

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘‘अदालत अगर संतुष्ट है कि न्यायेतर कबूलनामा स्वैच्छिक है तो दोष सिद्धि के मामले में इसे संज्ञान में लिया जा सकता है. आरोपी के न्यायेतर कबूलनामा को हर मामले में मिलान किए जाने की जरूरत नहीं है.’’  पीठ ने अपने फैसले में गौर किया कि स्वैच्छिक कबूलनामा के आधार पर दोष सिद्धि हो सकती है लेकिन विवेक के नियम के मुताबिक जहां भी संभव हो इसका स्वतंत्र साक्ष्यों से मिलान किया जाना चाहिए.

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पीठ ने कहा, ‘‘न्यायेतर कबूलनामा कमजोर साक्ष्य है और अदालत को सुनिश्चित करना चाहिए कि यह विश्वास बढ़ाता है और अभियोजन के अन्य साक्ष्यों से मिलता है।’’ इसने कहा, ‘‘न्यायेतर कबूलनामा को स्वीकार करने के लिए इसका स्वैच्छिक होना अनिवार्य है और यह विश्वास से परिपूर्ण हो।’’ सुप्रीम कोर्ट ने बैंक के एक पूर्व कर्मचारी के अपराधों को भ्रष्टाचार निरोधक कानून और भारतीय दंड संहिता की धाराओं के तहत बरकरार रखते हुए यह फैसला दिया.

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याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया था कि मामले में उसे बैंक के अपने दो वरिष्ठ अधिकारियों के समक्ष इकबालिया बयानों के आधार पर दोषी ठहराया गया. उसने दावा किया था कि यह नहीं कहा जा सकता कि उसके इकबालिया बयान स्वैच्छिक थे. पीठ ने पांच वर्ष की जेल की सजा को घटाकर तीन वर्ष कर दी.

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