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14 वर्षों की गहन रिसर्च के बाद आवारा शरतचंद्र को मसीहा बनाने वाले विष्णु प्रभाकर

जयंती पर विशेष

Naveen Sharma

Ranchi :  बांग्ला भाषा के साहित्यकारों में शरतचंद्र चट्टोपाध्याय हिन्दी भाषी लोगों में सबसे अधिक लोकप्रिय हैं तो उसका काफी हद तक श्रेय उनकी जीवनी लिखनेवाले विष्णु प्रभाकर को भी जाता है. खुद मैंने भी सीधे शरत की कोई रचना पढ़ने से पहले विष्णु प्रभाकर द्वारा लिखी गई शरतचंद्र की जीवनी आवारा मसीहा पढ़ी थी. ये बहुत ही कमाल की किताब है. इसने बंगाली भद्रलोक में उपेक्षित और तिरस्कार की नजरों से देखे जाने वाले शरत को हिंदी भाषी लोगों में बांग्ला भाषा के सबसे अधिक पढ़े जाने वाले लेखकों में शुमार कराने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है.

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बर्मा, बंगाल और बिहार के कई शहरों की खाक छानी

आवारा मसीहा में विष्णु प्रभाकर ने बहुत अधिक मेहनत की है. इस एक किताब को लिखने में उन्होंने अपने जीवन के 14 महत्वपूर्ण वर्ष खर्च किए थे. उन्होंने बर्मा, बंगाल और बिहार के कई शहरों की खाक कई वर्षों तक छानी. जहां जहां पर शरत रहे उन स्थानों पर जाकर शरत को जानने वाले लोगों से मुलाकात कर शरत के बारे में फर्स्ट हैंड जानकारी जुटाई. इस दौरान उन्हें काफी परेशानियों का भी सामना करना पड़ा. शरत को जानने वालों में से कुछ ने ताने मारते हुए यहां तक कहा कि दो चार आवारा लोगों के बारे में जानकारी जुटा लिजिए शरत की जीवनी तैयार हो जाएगी.

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‘विष्णु दयाल’ भी था नाम

विष्णु प्रभाकर का जन्म मीरपुर मुज़फ़्फ़रनगर (उत्तर प्रदेश) में हुआ था. इन्हें इनके एक अन्य नाम ‘विष्णु दयाल’ से भी जाना जाता है. इनके पिता का नाम दुर्गा प्रसाद था, जो धार्मिक विचारधारा वाले व्यक्तित्व के धनी थे. प्रभाकर जी की माता महादेवी पढ़ी-लिखी महिला थीं, जिन्होंने अपने समय में पर्दा प्रथा का घोर विरोध किया था. प्रभाकर जी की पत्नी का नाम सुशीला था.

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पंजाब विश्वविद्यालय से किया बी.ए

विष्णु प्रभाकर की आरंभिक शिक्षा मीरपुर में हुई थी. उन्होंने सन् 1929 में चंदूलाल एंग्लो-वैदिक हाई स्कूल, हिसार से मैट्रिक की परीक्षा पास की. इसके बाद नौकरी करते हुए पंजाब विश्वविद्यालय से ‘भूषण’, ‘प्राज्ञ’, ‘विशारद’ और ‘प्रभाकर’ आदि की हिंदी-संस्कृत परीक्षाएँ भी उत्तीर्ण कीं. उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से ही बी.ए. की डिग्री भी प्राप्त की थी.

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महज 18 रुपये प्रतिमाह की नौकरी की

प्रभाकर की घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी. यही कारण था कि उन्हें काफ़ी कठिनाइयों और समस्याओं का सामना करना पड़ा था. वे अपनी शिक्षा भली प्रकार से प्राप्त नहीं कर पाये थे. अपनी घर की परेशानियों और ज़िम्मेदारियों के बोझ से उन्होंने स्वयं को मज़बूत बना लिया. उन्होंने चतुर्थ श्रेणी की एक सरकारी नौकरी प्राप्त की. इस नौकरी के जरिए पारिश्रमिक रूप में उन्हें मात्र 18 रुपये प्रतिमाह का वेतन प्राप्त होता था. विष्णु प्रभाकर जी ने जो डिग्रियाँ और उच्च शिक्षा प्राप्त की, तथा अपने घर-परिवार की ज़िम्मेदारियों को पूरी तरह निभाया, वह उनके अथक प्रयासों का ही परिणाम था.

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मुख्य कृतियां

उपन्यास : ढलती रात, स्वप्नमयी, अर्धनारीश्वर, निशिकांत, तट के बंधन, दर्पण का व्यक्ति, परछाई, कोई तो

कहानी संग्रह : संघर्ष के बाद, धरती अब भी घूम रही है, मेरा वतन, खिलौने, आदि और अन्त , एक कहानी का जन्म, रहमान का बेटा, जिंदगी के थपेड़े, सफर के साथी, खंडित पूजा, साँचे और कला, पुल टूटने से पहले, आपकी कृपा, एक और कुंती, जिंदगी एक रिहर्सल

नाटक : हत्या के बाद, नव प्रभात, डॉक्टर, प्रकाश और परछाइयाँ, बारह एकांकी, अशोक, अब और नहीं, टूटते परिवेश, कुहासा और किरन, बंदिनी, सत्ता के आर-पार, केरल का क्रांतिकारी, सीमा रेखा, श्वेत कमल, युग-युग क्रांति, समाधि

कविता संग्रह : चलता चला जाऊँगा

जीवनी : आवारा मसीहा, अमर शहीद भगत सिंह, सरदार वल्लभभाई पटेल, काका कालेलकर

संस्मरण : जाने-अनजाने, कुछ शब्द : कुछ रेखाएँ, यादों की तीर्थयात्रा, मेरे अग्रज : मेरे मीत, समांतर रेखाएँ, मेरे हमसफर, राह चलते-चलते

निबंध : जन-समाज और संस्कृति : एक समग्र दृष्टि, क्या खोया क्या पाया

बाल साहित्य : मोटेलाल, कुंती के बेटे, रामू की होली, दादा की कचहरी, जब दीदी भूत बनी, जीवन पराग, बंकिमचंद्र, अभिनव एकांकी, स्वराज की कहानी, हड़ताल, जादू की गाय, घमंड का फल, नूतन बाल एकांकी, हीरे की पहचान, मोतियों की खेती, पाप का घड़ा, गुड़िया खो गई, ऐसे-ऐसे, तपोवन की कहानियाँ, खोया हुआ रतन, बापू की बातें, हजरत उमर, बद्रीनाथ, कस्तूरबा गांधी, ऐसे थे सरदार, हमारे पड़ोसी, मन के जीते जीत, कुम्हार की बेटी, शंकराचार्य, यमुना की कहानी, रवींद्रनाथ ठाकुर, मैं अछूत हूँ, एक देश एक हृदय, मानव अधिकार, नागरिकता की ओर.

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