न्यूज़ विंग
कल का इंतज़ार क्यों, आज की खबर अभी पढ़ें

चुनावी मुद्दों के चयन को लेकर विपक्ष में उलझन

111

Faisal Anurag

लोकसभा चुनाव के निकट आते ही विभिन्न तरह के भ्रष्टाचार के मामलों के सामने आने से भाजपा के लिए हालात मुश्किल होते जा रहे हैं. भाजपा इन सवालों का तार्किक जवाब नहीं दे पा रही है. राहुल गांधी और कांग्रेस के आक्रामक आरापों के बीच सवालों को दरकिनार कर बहस की दिशा बदलने का प्रयास भाजपा के थिेकटैक कर रहे हैं. प्रधानमंत्री खुद अपने भाषणों में कुछ ऐसी बातें कर रहे हैं, जिसे लेकर इतिहास संबंधी तथ्यह को सुलझाने का प्रयास किया जा रहा हैं. यहां तक की इतिहास की जानकारियों को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है. भारतीय जनता पार्टी की पूरी कोशिश बैंक घोटालों और रफाल घोटाले से ध्याान भटकाना है.

इसे भी पढ़ेंःबकोरिया कांडः डीजीपी के कारण गृहमंत्री की हैसियत से मुख्यमंत्री रघुवर दास भी आ सकते हैं जांच के…

राहुल गांधी ने वित्ती मंत्री जेटली की बेटी और दामाद के फर्म और मेहुल चौकसी के संबंधों को जिस आक्रमता से उजागर किया है. उससे भी मोदी सरकार की परेशानी बढ़ी है. सीबीआई के विशेष निदेशक राकेश अस्थााना, जो गुजरात कैडर के अफसर हैं और जिन्होंोने गोधरा मामले की जांच के लिए गठित एसआईटी के सदस्यं के रूप में मोदी को क्लीेन चिट दी थी; तीन करोड़ के रिश्ती में सीबीआई के ही जांच दायरे में आ गए हैं. सीबीआई ने उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की है और उनकी टीम के एक अफसर को गिरफ्तार भी कर लिया है. यह प्रधानमंत्री के लिए एक गंभीर सवाल है क्यों कि उनका अब तक का ‘न खाने दूंगा और न खाउंगा’ का नारा तार-तार हो गया है. एक और मामले में मुख्यी सूचना आयुक्ता ने यह फैसला देकर सनसनी पैदा कर दी है कि प्रधानमंत्री की यात्राओं में गए लोगों की सूची सार्वजनिक की जानी चाहिए.

अब तक प्रधानमंत्री की यात्राओं के इस पहलू को गोपनीय रखा जा रहा था. जबकि विपक्ष आरोप लगाता रहा है कि प्रधानमंत्री अपनी हर यात्रा में केवल अपने व्यालवसायिक दोस्तोंा को साथ ले जाते रहे हैं और उन्हें फायदा पहुंचाते रहे हैं. भाजपा इन आरापों को खारिज करती रही है. चुनाव के पहले इस तरह के फैसले के बाद सूचना प्राप्ता कर विपक्ष प्रधानमंत्री को कठघरे में खड़ा कर सकता है.

इसे भी पढ़ेंःप्रधानमंत्री की नाक के नीचे सीबीआइ के आला अफ़सरों में खुली जंग

सरकार की परेशानी रफाल मामले में लगातार बढ़ती जा रही है. केंद्रीय मंत्रियों की सफाई ने इस मामले को और ज्यारदा उलझा दिया है. जबकि फ्रेंच मीडिया अनेक ऐसे तथ्योंक को उजागर कर चुका है, जिसमें अंबानी के फेवर की बात पुष्टय होती है. अब तक केंद्र कहता रहा है कि मोदी सरकार के खिलाफ भ्रष्टाफचार के एक मामले भी सामने नहीं आए हैं, क्यों कि सरकार पाकसाफ है. लेकिन इन तथ्यों ने सरकार की छवि को प्रभावित करना शुरू किया है और यह संदेह पुख्ताय हो रहा है कि सरकार भ्रष्टाचार के मामले में सेलेक्टिव है तथा वह कोशिश कर रही है कि कोई मामला मीडिया में न छाए. पनामा पेपर्र्स का भूत भी मंडराता नजर आ रहा है. जिसमें भाजपा के कई नेताओं के पुत्रों की मिली भगत है और प्रधानमंत्री के नजदीक के कुछ पूंजीपतियों के नाम भी हैं.

palamu_12

राजीव गांधी के जमाने में बोफोर्स के सवाल ने पूरी राजनीति और चुनाव को प्रभावित किया और राजीव गांधी को भारी पराजय का सामना करना पड़ा. यही नहीं राजीव गांधी के बाद नेहरू गांधी परिवार का कोई व्य क्ति प्रधानमंत्री या मंत्री भी नहीं बन पाया. रक्षा मामलों से जुड़ें सौदों के भ्रष्टा चार के मामलों ने भारतीय राजनीति को हमेशा प्रभावित किया है और कई राजनीतिक नेताओं के राजनीतिक करियर के अवसान का कारण बना है. इसमें कारगिल के बाद के कफन घोटाला भी शामिल है. तो क्यान रफाल 2019 के चुनाव के पहले एक प्रभावी चुनावी मुद्दा बन सकेगा. यह अहम सवाल है. विपक्ष में केवल राहुल गांधी ने इस सवाल पर आक्रामक रूख अपनाया है. लेकिन अन्य विपक्षी दल इस सवाल पर पूरी तरह आक्रामक नहीं हो रहे हैं. इसे लेकर विपक्ष पर ही अनेक तरह के सवाल पूछे जा रहे है. क्यास विपक्ष के कुछ बडे नेताओं को सीबीआई का भय है या उन्हेंर किसी अन्यय तरीकों से मैनेज किया जा रहा है. विपक्ष के गठबंधन के लिए इस सवाल की बड़ी भूमिका है.

इसे भी पढ़ेंः10-12 साल के बच्चों को मार कर पुलिस ने कुख्यात नक्सली बता दिया था, सीआइडी जांच को भी किया मैनेज, अब…

यदि विपक्ष के कुछ नेता भय के साए में रहेंगे तो गठबंधन की जो बात की जा रही है, वह संभव नहीं होगा और भाजपा के लिए चुनावी हालात आसान होंगे. लेकिन राजनीतिक बहस में जिस तरह फिर से राम मंदिर और सांप्रदायिक रूझान पैदा करने का प्रयास किया जा रहा है, क्याे उसे रफाल जैसे गंभीर मुद्दों से काउंटर किया जा सकता है. विपक्ष के लिए यह एक बड़ी चुनौती है. विपक्ष के सामने सभी सहमना दलों को एकजुट करने के साथ माहोल को सांप्रदायिक विभाजन से रोकने की भी चुनौती है. भाजपा के लिए सांप्रदायिक भावनात्मरक मुद्दे राजनीतिक रूप से अनुकूल रहे हैं. इन चुनावों में मीडिया की भूमिका भी विपक्ष के लिए चुनौती है, क्योंदकि मीडिया का बड़ा हिस्सा सरकार के पक्ष में माहौल बना रहा है और विपक्ष को बदनाम और हतोत्साचहित करने का प्रयास कर रहा है. रायपुर के अपने ताजा भाषण में राहुल गांधी ने मीडिया में व्यासप्त भय का हवाला देकर सरकार और मीडिया संस्थानों को लेकर गंभीर सवाल उठाया है. इस संदर्भ में महत्व पूर्ण है कि अगले महीनों में विपक्ष मुददों को खड़ा करने और भाजपा के मुददों का मुकाबला करने में कितना कारगर होता है. इससे ही तय होगा कि अगले चुनाव में विपक्ष के मुददे क्याो होंगे.

(लेखक न्यूज विंग के वरिष्ठ संपादक हैं और ये उनके निजी विचार हैं)

इसे भी पढ़ेंःसीबीआई : एन इनसाइड स्टोरी

न्यूज विंग एंड्रॉएड ऐप डाउनलोड करने के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पेज लाइक कर फॉलो भी कर सकते हैं.

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

%d bloggers like this: