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रेप मामले में SC की महिला पीठ का नजरिया, किसी का लूज कैरेक्टर आपको दुष्कर्म करने का हक नहीं देता

महिला खंडपीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा सामूहिक दुष्कर्म मामले में दिये गये चार आरोपियों को छोड़े जाने के फैसले को उलट दिया और ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गयी सजा को बहाल कर दिया.

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NewDelhi : सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति आर बानुमथी और न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी की खंडपीठ ने रेप के मामलों से निपटने के दौरान पुरुष न्यायाधीशों के रूढ़िवादी विचारों से अलग रुख अपनाया. यह बात उनके फैसले से सामने आयी है. मंगलवार को दिल्ली बनाम पंकज चौधरी और अन्य के मामले में दिये गये एक ऐतिहासिक फैसले के तहत इस महिला खंडपीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा सामूहिक रेप मामले में दिये गये चार आरोपियों को छोड़े जाने के फैसले को उलट दिया और ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गयी सजा को बहाल कर दिया. बता दें कि एक झुग्गी वासी के साथ रेप मामले में मेडिकल रिपोर्ट, फोरेंसिक रिपोर्ट और अन्य सबूतों के आधार पर ट्रायल कोर्ट ने चारों अभियुक्तों को दोषी ठहराया था, जिसमें से प्रत्येक को दस-दस साल का सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी. लेकिन दिल्ली हाई कोर्ट ने दुष्कर्म के आरोपियों की अपील दायर करने की अनुमति दी और इस आधार पर आरोपियों की सजा रद़द कर दी कि दुष्कर्म की शिकार वेश्यावृत्ति के आरोप में पुलिस हिरासत में रही थी.

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हाई कोर्ट दुष्कर्म के साक्ष्य की विवेचना करने में असफल रहा

साथ ही हाई कोर्ट ने आरोपियों के खिलाफ झूठे सबूत बनाने के लिए पुलिस अधिकारियों के खिलाफ मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की महिला खंडपीठ ने पाया कि हाई कोर्ट दुष्कर्म के साक्ष्य की विवेचना करने में असफल रहा, जो मेडिकल रिपोर्ट, फोरेंसिक रिपोर्ट में मौजूद थे. साथ ही दुष्कर्म की शिकार की मां की गवाही को भी नजरअंदाज किया गया, जिन्होंने आरोपियों को दुष्कर्म के बाद वहां से जाते देखा था और उनमें से दो को सुनवाई के दौरान के अदालत में पहचाना गया. बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी पर अनैतिक चरित्र का होने का आरोप आरोपियों को दुष्कर्म करने का कोई अधिकार नहीं देता. बेंच ने महाराष्ट्र राज्य और एक अन्य वी मधुकर नारायण मार्डिकार (1 99 1) केस के फैसले पर  भरोसा किया, जिसे पहले सुप्रीम कोर्ट ने दिया था. माना कि एक महिला भी गोपनीयता की हकदार है और किसी भी व्यक्ति को उसका उल्लंघन करने की छूट नहीं है. महिला भी कानून की सुरक्षा पाने के लिए पुरुषों की तरह समान रूप से हकदार है. बेंच ने कहा कि कोई अगर सेक्सुअल इंटरकोर्स की आदी है या लूज करेक़्टर होने का आरोप है तो इसका मतलब यह नहीं कि कोई भी उसका रेप करे.

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