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विनेश फोगाट बनी भारत की गोल्डन गर्ल

Lalit Garg भारत की खेल प्रतिभाएं अब दृढ़ संकल्प से आगे बढ़ने की ठान चुकी है और विश्व के खेल शिखरों पर पहुंच बनाकर देश के गौरव को बढ़ा रही है. भारत की नई ‘गोल्डन गर्ल’ 23 वर्षीय हरियाणा की विनेश फोगाट ने अनूठा एवं विलक्षण करके दिखाया है. उसने अपनी शानदार उपलब्धि से भारतीय महिला कुश्ती में एक स्वर्णिम इतिहास को रच दिया है. जब इस गोल्डन जीत की खबर मीडिया में छायी तो सम्पूर्ण भारतवासी गौरवान्वित महसूस करने लगे. 18वें एशियन गेम्स में उसने 50 किलोग्राम वर्ग के फाइनल मुकाबले में अपनी जापानी प्रतिद्वंद्वी युकी इरी को 6.2 से पटकनी देकर गोल्ड मेडल जीता है. यह इन खेलों में भारत को मिला दूसरा गोल्ड है. इसके साथ ही भारत के खाते में दो गोल्ड, दो सिल्वर और एक ब्रॉन्ज मेडल आ चुका है. भारत को पहला गोल्ड हरियाणा के ही बजरंग पूनिया 65 किलोग्राम वर्ग फ्री स्टाइल कुश्ती में दिलाया था. खेलों के माध्यम से आती यह रोशनी अनेक संभावनाओं के द्वार उद्घाटित कर रही है, जो भारत के उज्ज्वल भविष्य की द्योतक हैं. देश में हर दिन राजनीति की उठापटक की खबरों, राष्ट्रीय अस्मिता पर नित-नये लगने वाले दागों एवं छाई विपरीत स्थितियों की धुंध को चीरते विनेश के जज्बे ने ऐसे उजाले को फैलाया है कि हर भारतीय का सिर गर्व से ऊंचा हो गया है. उसने एक ऐसी रोशनी को अवतरित किया है जिससे देशवासियों में नये विश्वास एवं गौरव का संचार हो रहा है। इंडोनेशिया के जकार्ता में उसने भारत का गौरव बढ़ाया है. इसे भी पढ़ें – गिरिडीह लोकसभा सीट : बीते पांच साल में बंद हुए चार बड़े कोल प्रोजेक्ट, नहीं शुरू हो सकी डीसी लाइन विनेश एशियाई खेलों में गोल्ड मेडल जीतनेवाली पहली भारतीय पहलवान हैं. इस शानदार उपलब्धि पर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें बधाई दी है. विनेश की यह उपलब्धि आने वाले समय में देश के अन्य पहलवानों को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करेगी. इस जीत ने अनेक मिथकों एवं धारणाओं को तोड़ा है. अब हम कह सकते हैं कि भारतीयों में भी वह मादा एवं क्षमता है कि वे विश्वस्तरीय कुश्ती में अपना परचम फहरा सकते हैं. अब तक तो हम ओलिंपिक हो या ऐसी ही अन्य विश्वस्तरीय खेल प्रतियोगिताओं में अंतिम दौर में पहुंचकर ही खुशी मनाते रहे हैं। लेकिन अब जीत का सेहरा भी हम अपने सिर पर बांधने में सक्षम हो गये हैं, और इसके लिये विनेश को सलाम। विनेश ने दो साल पहले रियो ओलंपिक में दिल तोड़ने वाली हार को पीछे छोड़ते हुए अपनी चीनी प्रतिद्वंद्वी यनान सुन को हराकर अपने विजयी अभियान की शुरुआत की. यनान वही खिलाड़ी हैं जिनसे विनेश ओलंपिक में पैर में चोट लगने की वजह से हार गई थीं. सपना अधूरा रह गया था. जब सपने अधूरे रह जाते हैं तो सुकून नहीं देते हैं. सपना टूटता है तो बहुत तकलीफ होती है लेकिन विनेश हिम्मत नहीं हारी और इस बार उन्होंने अपना हिसाब चुकता कर लिया. इस बार विनेश ने यनान को 8-2 से हराकर सेमीफाइनल में प्रवेश किया. इसके बाद उन्होंने अपनी कोरियाई प्रतिद्वंद्वी हजुंगजू किम को तकनीकी श्रेष्ठता के आधार पर हरा दिया. इसे भी पढ़ें – राजधानी की 5 एकड़ 26 डिसमिल आदिवासी जमीन को बना दिया गया सीएनटी फ्री लैंड हरियाणा में भिवानी का बलाली गांव देश का ऐसा चर्चित गांव है जिसने कई खेल प्रतिभाएं पैदा की. कुश्ती के कोच महावीर फोगाट का इसमें प्रमुख योगदान है. उन्होंने न सिर्फ लड़कियों को घर से बाहर निकला बल्कि अखाड़ों में लड़कों के साथ उनकी कुश्ती लड़वाई. राष्ट्रीय स्तर के पहलवान महावीर फोगाट की चार बेटियां हैं-गीता, बबीता, विनेश और रितु, जो खुद अपने पिता महावीर फोगाट की तरह शानदार पहलवान हैं और देश के लिए कई मेडल जीत चुकी हैं. इसके अलावा महावीर ने अपने भाई की भी दो बेटियों विनेश और प्रियंका फोगाट को पहलवानी की शिक्षा दी है. विनेश जब छोटी थी तभी उसके पिता की हत्या हो गई थी. महावीर ने इस कमी को पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. इसके बाद विनेश उस परिवार का ही एक हिस्सा बनकर रहने लगी. वह कुश्ती में काफी अच्छी थी लेकिन उसे इसका कोई शौक नहीं था. लेकिन अपने ताऊजी के कठोर अनुशासन, लगन एवं प्रशिक्षण से वह गोल्ड मेडल जीत कर विश्व में भारत का गौरव बढ़ाने में कामयाब हुई है. महावीर फोगाट और उनकी पत्नी दया कौर ने ठान लिया था कि वे गीता को पहलवान बनाएंगे, लेकिन हरियाणा की एक लड़की मर्दों के साथ कुश्ती करे, ये सोचना भी शायद उस वक्त चुनौतीपूर्ण था, जाहिर है मुश्किलें तो आनी ही थी. लेकिन महावीर और दया फैसले से टस से मस नहीं हुए. उनके मुताबिक जब गीता और बबिता को अखाड़े में लाना शुरू किया तो गांव के लोगों ने विरोध किया. वे लोग भी आलोचना करने लगे जो साथ उठते-बैठते थे. लेकिन महावीर के प्रयत्नों का ही परिणाम है कि आज हरियाणा में महिला कुश्ती के कम से कम 50 अखाड़े चल रहे हैं. जरूरत है बेटियों को मौका देने की, क्योंकि वे आसमान छू सकती हैं और ऐसा विनेश ने करके दिखाया है. इससे पहले भी परिवार की लड़कियों ने देश के मस्तक को ऊंचा किया है. वर्ष 2020 में टोक्यो ओलंपिक में उम्मीद है कि इस परिवार की बेटियां अवश्य ही ओलंपिक मेडल ले आएंगी। महावीरजी ने सही कहा है कि मैंने अपनी जिंदगी में यही सीखा है कि डटे रहो, लड़ते रहो और आलोचनाओं को अनसुना करते रहो. इसी मंत्र से मुझे और मेरी बेटियों को सफलता मिली है. दूर दृष्टि, पक्का इरादा रखिए और कड़ी मेहनत करिए तो मुकाम हासिल हो जाता है. इसे भी पढ़ें – गिरिडीह : तीन दिनों बाद भी नहीं मिला जुबैदा और उसके तीन बच्चों के हत्यारों का सुराग दो साल पहले आमिर खान ने कुश्ती खिलाड़ी गीता फोगाट और बबीता फोगाट की कहानी पर्दे पर लेकर आए. ‘दंगल’ में इन दो बहनों के संघर्ष की कहानी ने बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचा दिया था. ‘दंगल’ ने जो कमाल किया था, उस रिकॉर्ड को तोड़ने के लिए अभी तक अन्य फिल्में कोशिश ही कर रही हैं, लेकिन इस बीच इस फिल्म की नायिका गीता और बबीता फोगाट के घर में ही उसकी चचेरी बहन ने एक और करनामा कर दिखाया है, जिस पर ‘दंगल’ का अगला हिस्सा बन सकता है. विनेश को जैसे ही यह गोल्ड मिला तो याद आया कि गीता फोगाट ने 2010 में हुए कॉमनवेल्थ खेलों में गोल्ड जीता था. जबकि वहीं उनकी छोटी बहन बबीता फोगाट ने 2014 में हुए कॉमनवेल्थ खेलों में कुश्ती में भारत को गोल्ड दिलाया था. लेकिन यह दोनों बहनें कभी एशियन खेलों में यह कारनामा नहीं दिखा पाई, जो अब उनकी चचेरी बहन ने कर दिखाया है. एशियन खेलों में भारतीय महिला पहलवान के हाथों में तिरंगा और चेहरे पर विजयी मुस्कान, इस तस्वीर का इंतजार लंबे वक्त से हर हिंदुस्तानी कर रहा था. विनेश ने यह अनिर्वचनीय खुशी दी है. इस खुशी के लिये विनेश के ताऊ महावीर फोगाट भी बधाई के पात्र हैं. क्योंकि उनको ही विनेश की इस सफलता का श्रेय जाता है. हमारे देश में कुश्ती को लेकर कभी भी उत्साहपूर्ण वातावरण नहीं बन पाया. प्रतिभावान खिलाड़ियों को औसत दर्जे की ट्रेनिंग के साथ शुरुआत करनी पड़ी. खेल संघ को मिलनेवाली राशि का सही इस्तेमाल भी नहीं होता था. खेलों के साथ हो रही इन विडंबनापूर्ण स्थितियों से हमें जल्दी उबरना होगा और इसकी पहली आजमाइश 2020 के टोक्यो ओलिंपिक में फोगाट परिवार की लड़कियों के साथ ही करनी होगी. क्योंकि उन्होंनेे अपनी प्रतिभा एवं क्षमता का लोहा मनवाया है, उन्होंने कठोर श्रम किया, बहुत कड़वे घूट पीये हैं तभी वे सफलता की सिरमौर बनी हैं. वरना यहां तक पहुंचते-पहुंचते कईयों के घुटने घिस जाते हैं. एक बूंद अमृत पीने के लिए समुद्र पीना पड़ता है. पदक बहुतों को मिलते हैं पर सही खिलाड़ी को सही पदक मिलना खुशी देता है. यह देखने में कोरा एक पदक है पर इसकी नींव में लंबा संघर्ष और दृढ़ संकल्प का मजबूत आधार छिपा है. इसे भी पढ़ें – बोकारो : रांची भेजे गये बंधक बने मकान मालिक भाई-बहन, क्लिनिक संचालक की पत्नी व बेटे को पुलिस ने भेजा जेल राष्ट्रीयता की भावना एवं अपने देश के लिये कुछ अनूठा और विलक्षण करने के भाव ने ही एशियन खेलों में भारत की साख को बढ़ाया है. कुश्ती की यह उपलब्धि दरअसल विनेश की उपलब्धि है, युवाओं की आंखों में तैर रहे भारत को अव्वल बनाने के सपने की जीत है. विनेश ने विपरीत परिस्थितियों में संघर्ष करके अपना रास्ता बनाया. दरअसल समाज में खेल को लेकर धारणा बदल रही है. सरकार भी जागरूक हुई है. कई नई अकादमियां खुलीं हैं जिनका युवाओं को फायदा मिल रहा है. खेलों को प्रोत्साहन देने के प्रयासों में और गति लाने की जरूरत है. खेलों के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर देशभर में फैलाना होगा. नौकरशाही संबंधी बाधाएं दूर करनी होंगी, वास्तविक खिलाड़ियों के साथ होने वाले भेदभाव को रोकना होगा, खेल में राजनीति की घुसपैठ पर भी काबू पाना होगा, तभी एशियाई खेलों और ओलिंपिक में भी हमें झोली भरकर मेडल मिल सकेंगे. खेलों में ही वह सामथ्र्य है कि वह देश के सोये स्वाभिमान को जगा देता है, क्योंकि जब भी कोई अर्जुन धनुष उठाता है, निशाना बांधता है तो करोड़ों के मन में एक संकल्प, एक एकाग्रता का भाव जाग उठता है और कई अर्जुन पैदा होते हैं. इंडोनेशिया के जकार्ता शहर में अनूठा प्रदर्शन करने वाली विनेश भी आज माप बन गयी हैं और जो माप बन जाता है वह मनुष्य के उत्थान और प्रगति की श्रेष्ठ स्थिति है। यह अनुकरणीय है. न्यूज विंग एंड्रॉएड ऐप डाउनलोड करने के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं.आप हमेंफ़ेसबुकऔर ट्विटरपेज लाइक कर फॉलो भी कर सकते हैं.

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