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बेरोजगारी दर 6.1 प्रतिशत, 45 साल में सबसे ज्यादा, वजह बनी नोटबंदी

1972-73 के बाद पहली बार बेरोजगारी दर इस लेवल पर गयी है. 1972-73 से पहले रोजगारी संबंधी आंकड़े जमा करने की व्‍यवस्‍था नहीं थी.

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 NewDelhi : नोटबंदी किये जाने और खामियों वाला जीएसटी लागू किये जाने के कारण देश में 2017-18 बेरोजगारी दर बेतहाशा बढ़ गयी. 2017-18 में यह दर 45 साल में सबसे ज्‍यादा 6.1 प्रतिशत रही. बताया जा रहा है कि 1972-73 के बाद पहली बार बेरोजगारी दर इस लेवल पर गयी है. बता दें कि 1972-73 से पहले रोजगारी संबंधी आंकड़े जमा करने की व्‍यवस्‍था नहीं थी.  बिजनेस स्‍टैण्‍डर्ड ने नेशनल सैम्‍पल सर्वे ऑफिस (NSSO) द्वारा किये गये पेरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) के हवाले से 6.1 प्रतिशत बेरोजगारी दर होने की जानकारी दी है. यह जानकारी ऐसे समय सामने आयी है जब बेरोजगारी के आंकड़े सार्वजनिक करने में देर होने की वजह से राष्‍ट्रीय सांख्‍यिकीय आयोग के दो सदस्‍यों ने इस्‍तीफा दे दिया है. बता दें कि बेरोजगारी को लेकर सामने आया यह किसी सरकारी एजेंसी द्वारा तैयार सबसे ताजा और नोटबंदी के बाद का पहला आंकड़ा है. हालांकि, आधिकारिक रूप से इसे जारी नहीं किया गया है.

प्रधानमंत्री मोदी ने आठ नवंबर, 2016 को नोटबंदी की थी. जानकारों के अनुसार नोटबंदी का रोजगार पर काफी नकारात्‍मक असर हुआ और इससे बेरोजगारी बढ़ी है. बेरोजगारी बढ़ने की एक वजह जीएसटी लागू करने में बरती गयी लापरवाही और खामियां भी रहीं. है.

शहरी इलाकों में बेरोजगारी ज्‍यादा बढ़ी है

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रिपोर्ट की मानें तो शहरी इलाकों में बेरोजगारी ज्‍यादा बढ़ी है.  शहरी इलाकों में इसकी दर 7.8 प्रतिशत बताई गयी है. ग्रामीण इलाकों यह दर 5.3 प्रतिशत है. रिपोर्ट के अनुसार युवा बेरोजगारों की संख्‍या में भी काफी बढ़ोत्‍तरी दर्ज की गयी. युवाओं के बीच बेरोजगारी दर ने 2017-18 में नया रिकॉर्ड बनाया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रामीण इलाकों की पढ़ी-लिखी महिलाओं की बेरोजगारी दर 2017-18 में 17.3 प्रतिशत रही.  2004-05 में यह 9.7 प्रतिशत थी, जो 2011-12 में 15.2 प्रतिशत हो गई थी। ग्रामीण इलाकों के पढ़े-लिखे पुरुषों के मामले में यह आंकड़ा 2017-18 में 10.5 प्रतिशत रहा, जबकि 2004-05 से 2011-12 के दौरान यह 3.5 से 4.4 प्रतिशत के बीच रहा था. एलएफपीआर यानी लेबर फोर्स पार्टिसिपेटिंग (रोजगार में लगे हुए या लगने की इच्‍छा रखने वाले) रेट भी 2017.18 में 36.9 पर पहुंच गया है, जबकि 2011-12 में यह 39.5 फीसदी था. बता दें कि युवाओं को रोजगार देना 2014 में नरेंद्र मोदी के सबसे बड़े चुनावी वादों में से एक था.

अब 2019 चुनाव में कांग्रेस जहां भाजपा की वादाखिलाफी को मुद्दा बना रही है, वहीं खुद उसी वादे के साथ जंग में उतर रही है.  कांग्रेस का कहना है कि वह 2019 से 2024 के दौरान सात करोड़ रोजगार के अवसर पैदा कर सकती है और राजीव गांधी इंस्‍टीट्यूट ऑफ कन्‍टेम्‍पररी स्‍टडीज ने एक रिपोर्ट में इसका खाका भी पेश किया है.

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